दोस्तो उत्तराखंड से बड़ी खबर सामने आ रही है! सांसद अजय भट्ट ने सीधे देश के राक्षामंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा है, उनके पत्र में उठाई गई चिंता ये है कि हिमालयी क्षेत्रों में स्थापित रक्षा और कृषि अनुसंधान प्रयोगशालाओं का भविष्य खतरे में है। सांसद ने सरकार से साफ-साफ आग्रह किया है कि इन प्रयोगशालाओं को बंद करने की अफवाहों को रोका जाए और क्षेत्र के किसानों, युवाओं और शोधकर्ताओं के हितों की सुरक्षा की जाए। क्या वास्तव में उत्तराखंड की रक्षा प्रयोगशालाओं का अस्तित्व संकट में है? दोस्तो उत्तराखंड की नैनीताल-ऊधम सिंह नगर लोकसभा सीट के सांसद अजय भट्ट ने हाल ही में एक पत्र सौंपा है। पत्र में उन्होंने अपनी चिंता जताई है कि केंद्र सरकार हल्द्वानी में स्थित रक्षा जैव ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (डीआईबीईआर) और भारत-चीन सीमा के भीतरी क्षेत्रों में स्थापित इससे जुड़ी डीएआरएल (रक्षा अनुसंधान कृषि प्रयोगशालाएं) को धीरे-धीरे बंद करने जा रही है। दोस्तो अजय भट्ट के मुताबिक इन प्रयोगशालाओं में फिलहाल बहुत ही कम कर्मचारी बचे हैं और इनका संचालन सीमित हो चुका है। उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताह रक्षा मंत्री के हल्द्वानी दौरे के दौरान उन्होंने उन्हें सीधे पत्र सौंपा, जिसमें ये आग्रह किया गया कि प्रयोगशालाओं को बंद करने या उन्हें दिल्ली के तिमारपुर स्थित डीआईपीएएस से जोड़े जाने की योजनाओं पर फिर से विचार किया जाए। दोस्तो इधर सांसद अजय भट्ट ने चेताया कि अगर यह प्रयोगशालाएं बंद हो गईं, तो इसका सीधा असर हिमालयी क्षेत्र के किसानों, स्थानीय बेरोजगार युवाओं और व्यापारियों पर पड़ेगा। साथ ही, क्षेत्र की शिक्षित प्रतिभाओं के लिए उपलब्ध इंटर्नशिप, जूनियर और सीनियर रिसर्च फैलोशिप जैसी शैक्षणिक अवसरों पर भी असर पड़ेगा।
दोस्तो यहां मै आपको बता दूं कि, DARAL और DIBER के वैज्ञानिक सीधे किसानों को कृषि सलाह देते हैं, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों में अनाज और सब्जियों की पैदावार बढ़ती है। दोस्तो सांसद ये कहना कि अगर ये प्रयोगशालाएं बंद हो गईं, तो किसानों को ये बहुमूल्य तकनीकी और वैज्ञानिक सलाह नहीं मिल पाएगी। इससे क्षेत्र की कृषि और खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा। दोस्तो ऐसतिहासिक बात करूं तो ये प्रयोगशालाएं 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद स्थापित की गई थीं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने हिमालयी क्षेत्रों में उच्च-ऊंचाई वाले कृषि, बागवानी, पेयजल शोधन और जैविक खतरे के प्रबंधन के लिए इन प्रयोगशालाओं की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों के लिए खाद्य उत्पादन बढ़ाना और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना था। दोस्तो उत्तराखंड में DARL की प्रयोगशालाएं अल्मोड़ा, हल्द्वानी, पिथौरागढ़, औली और हर्षिल में स्थित हैं।
और ये प्रयोगशालाएं स्थानीय भूभाग में अधिक पैदावार प्राप्त करने के तरीकों पर लगातार शोध कार्य कर रही हैं। दोस्तो अजय भट्ट ने पत्र में यह सुझाव दिया कि दिल्ली के तिमारपुर डीआईपीएएस को उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की बजाय इन हिमालयी प्रयोगशालाओं को बनाए रखा जाए। इस तरह सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों की शरीर क्रिया, कृषि और शोध पर काम करने की क्षमता बनी रहेगी। अब दोस्तो आपको बताता हूं क्या है ये दोनो यानि की DIBER- DARL थोड़ा गौर कीजिएगा। दोस्त पहले बात अगर डीआईबीईआर करू तो DIBER, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक प्रमुख प्रयोगशाला है। यह भारतीय सेना के लिए जैव-ऊर्जा और जैव-ईंधन के क्षेत्रों में तकनीक और उत्पादों के विकास में काम करती है।
वहीं दोस्तो बात अगर डीएआरएल की करूं तो डीएआरएल, DRDO की कृषि अनुसंधान प्रयोगशाला है, जो मुख्य रूप से कठिन भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों वाले हिमालयी क्षेत्रों में कार्यरत सैनिकों के लिए कृषि, बागवानी, जल शोधन और जैविक खतरे के प्रबंधन के क्षेत्रों में शोध करती है। दोस्तो सांसद अजय भट्ट का ये कदम क्षेत्र के विकास, किसानों की सुरक्षा और स्थानीय युवाओं के लिए शैक्षणिक अवसरों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट आग्रह किया है कि हिमालयी क्षेत्र में स्थित इन प्रयोगशालाओं को बंद करने की किसी भी योजना से पहले स्थानीय हितों को सुनिश्चित किया जाए तो यह थी उत्तराखंड की रक्षा और कृषि अनुसंधान प्रयोगशालाओं से जुड़ी अहम खबर। सांसद अजय भट्ट ने सीधे रक्षा मंत्री को पत्र सौंपकर क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। देखना होगा कि केंद्र सरकार इस पर क्या फैसला लेती है। हम आपको इस मामले में आने वाले हर अपडेट से अवगत कराते रहेंगे।