जी हां दोस्तो वैसे उत्तराखंड की सियासत में बड़े-बड़े प्रयोग होते रहे हैं, लेकिन क्या इस बार बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है, किया है तो किया फिर क्यों करना पड़ा। उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव दिख भी रहा है। बीजेपी ने अपनी रणनीति साफ कर दी है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अब नए रिकॉर्ड की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। कैसे धामी ‘धाकड़’ से ‘धुरंधर’ बन गए धामी? क्या उनके फैसले और काम उन्हें उत्तराखंड का दूसरा सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्री बना देंगे? बड़ी रैलियां, मजबूत संगठन और बढ़ता जनसमर्थन—इशारा साफ है कि 2027 की राह अभी से तैयार हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड ने हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। राज्य में स्टार्टअप संस्कृति तेजी से विकसित हो रही है, और युवा अब नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बन रहे हैं, जिससे नवाचार व उद्यमिता को गति मिल रही है। कांग्रेस, जब-जब चुनाव हारती है, तब-तब देश के संस्थानों पर हमला शुरू कर देती है। कभी ये लोग EVM को दोष देते हैं, कभी चुनाव आयोग को दोष देते हैं, लेकिन अपने गिरेबान में नहीं झाँकते हैं। दरअसल दोस्तो ये सब बाते इस ओर इशारा कर रही हैं कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी।
उत्तराखंड की सियासत के आजादशत्रु बनने जा रहे हैं। दोस्तो उत्तराखंड राज्य के गठन के 25 वर्षों का राजनीतिक इतिहास एक ऐसे दौर की कहानी है, जहां सत्ता की निरंतरता से ज्यादा नेतृत्व परिवर्तन हावी रहा है। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड में कई मुख्यमंत्री बने, लेकिन नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री अबतक अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। 2017 में चुनी गई बीजेपी सरकार में त्रिवेंद्र सिंह इस उपबल्धि को छूते, उससे पहले ही 2021 में उनके कार्यकाल को चार साल पूरे होने से पहले ही नेतृत्व परिवर्तन हो गया। हालांकि, अब उम्मीद बढ़ गई है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां तो इसी तरफ इशारा कर रही हैं कि एनडी तिवारी के बाद पुष्कर सिंह धामी ही ऐसे दूसरे नेता होंगे, जो अपना मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा करेंगे। दोस्तो वैसे देखा जाए तो पूर्व सीएम दिवंगत एनडी तिवारी के बाद प्रदेश में किसी मुख्यमंत्री का अगर सबसे लंबा कार्यकाल अगर रहा है तो वो सीएम पुष्कर सिंह धामी का ही है। उत्तराखंड के राजनीति इतिहास के पन्नों को अगर खंगाल कर देखा जाए तो अधिकतर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल को पूरा ही नहीं कर पाए। दोस्तो यदि किसी एक नेता का कार्यकाल स्थिरता और पूर्णता का प्रतीक बनकर सामने आता है तो वह हैं नारायण दत्त तिवारी। नारायण दत्त तिवारी ने 2 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007 तक 5 साल 5 दिन का कार्यकाल पूरा किया।
दोस्तो यह न केवल उत्तराखंड के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि राज्य में स्थिर शासन संभव है फिलहाल की राजनीतिक परिस्थितियां इसी तरफ इशारा कर रही हैं कि नारायण दत्त तिवारी के बाद मौजूद सीएम धामी पुष्कर सिंह धामी का कार्यकाल सबसे लंबा होगा। वर्तमान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का दोनों सरकारों का कार्यकाल मिलाकर 04 साल 08 महीने 17 दिन का हुआ है। दोस्तो राज्य गठन के बाद प्रदेश में पहली अंतरिम सरकार बीजेपी की बनी। बीजेपी ने नित्यानंद स्वामी को प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री बनाया हालांकि, वो भी पार्टी की अंदरूनी राजनीति का शिकार हो गए और बीजेपी ने उन्हें 11 महीने 20 दिन बाद ही पद से हटा दिया। इसके बाद बीजेपी ने भगत सिंह कोश्यारी को सीएम बनाया। भगत सिंह कोश्यारी का भी अंतरिम सरकार में कार्यकाल मात्र चार महीने का ही रहा। इसके बाद दोस्तो साल 2002 में प्रदेश में पहली बार चुनाव हुए और कांग्रेस सत्ता में आई। कांग्रेस ने एनडी तिवारी को सीएम बनाया। एनडी तिवारी उत्तराखंड के अबतक के एकमात्र मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने उत्तराखंड में अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। ऐसा नहीं है कि एनडी तिवारी को भी पार्टी की अंदरूनी राजनीति या बगावत का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन उनके अनुभव के सामने कोई टिक नहीं पाया और यही कारण था कि वो अपनी सरकार को पांच साल तक चलाने में कामयाब रहे।
दोस्तो उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में पूर्व सीएम दिवंगत एनडी तिवारी का कार्यकाल एक मानक के रूप में देखा जाता है। वहीं 2007 के चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और बीजेपी सत्ता में आई। दोस्तो इस बार बीजेपी ने भुवन चंद्र खंडूड़ी को सीएम बनाया, लेकिन दो साल के भीतर ही भुवन चंद्र खंडूड़ी भी पार्टी की अंदरूनी राजनीति का शिकार गए। आखिर में बीजेपी हाईकमान ने भुवन चंद्र खंडूड़ी से सीएम की कुर्सी छीन ली और रमेश पोखरियाल निशंक को सीएम बनाया। इस तरह भुवन चंद्र खंडूड़ी सिर्फ दो साल 108 दिन ही सीएम बन पाए। दोस्तो खंडूड़ी को हटाकर सीएम की कुर्सी पर बैठे रमेश पोखरियाल निशंक भी ज्यादा दिनों तक सत्ता का सुख नहीं भोग पाए। निशंक 2 साल 75 दिन के अंदर ही बीजेपी ने निशंक से भी सीएम की कुर्सी वापस ले ली और फिर से प्रदेश की जिम्मेदारी भुवन चंद्र खंडूड़ी को दी। भुवन चंद्र खंडूड़ी के नेतृत्व में ही बीजेपी ने 2012 का चुनाव लड़ा। भुवन चंद्र खंडूड़ी का दूसरी कार्यकाल मात्र 6 महीने का रहा है। दोस्तो इसके बाद साल 2012 का जब विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच जमकर टक्कर हुई। किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। वहीं भुवन चंद्र खंडूड़ी खुद भी कोटद्वार से चुनाव हार गए थे। बाद में गठबंधन का गठजोड़ करने में कांग्रेस सफल रही है. प्रदेश में कांग्रेस की दूसरी बार सरकार बनी थी। कांग्रेस ने इस बार विजय बहुगुणा को प्रदेश की कमान सौंपी थी। विजय बहुगुणा का कार्यकाल भी सही चल रहा था।
इसी बीच जून 2013 में केदारनाथ आपदा आई। केदारनाथ आपदा की लहर में विजय बहुगुणा की कुर्सी भी टिक नहीं पाई. विजय बहुगुणा पर कई गंभीर आरोप लगे. इसी वजह से पार्टी के अंदर विजय बहुगुणा को सीएम के पद से हटाने की मांग हुई। कांग्रेस हाईकमान ने भी पार्टी के अदरुनी माहौल को देखते हुए विजय बहुगुणा की जगह हरीश रावत को प्रदेश का नया मुख्यमंत्री बनाया। यानी विजय बहुगुणा सिर्फ एक साल 324 महीने ही सीएम बन रहे। दोस्तो विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत करीब 3 साल 45 दिन तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। हालांकि, उन्हें भी अपने ही पार्टी के विधायकों के बागवती तेवर का सामना भी करना है। कई कांग्रेस के कई विधायक बागवत कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. इसी बीच उत्तराखंड में कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन भी लगा था, लेकिन हरीश रावत अपनी सरकार को बचाने में कामयाब हो गए थे। तब तक आ जाता है साल 2017 में चौथी बार प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए. इस बार बीजेपी सत्ता पर काबिज हुई और त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने। पहले तीन साल त्रिवेंद्र सिंह रावत कार्यकाल के काफी अच्छे गए। तब माना जा रहा था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत एनडी तिवारी के बाद दूसरे मुख्यमंत्री होंगे, जो पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे, लेकिन चार साल पूरा होने से करीब 9 दिन पहले ही हाईकमान के आदेश पर त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा।
दोस्तो त्रिवेंद्र सिंह रावत भी 3 साल 356 दिन ही सीएम बने रहे. बताया जाता है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री रहते हुए कुछ फसलों और विधायकों की नाराजगी के कारण हाईकमान को इस तरह का फैसला लेना पड़ा। त्रिवेंद्र सिंह रावत के बाद बीजेपी ने तत्कालीन पौड़ी गढ़वाल से सांसद तीरथ सिंह रावत को सीएम बनाया, लेकिन तीरथ सिंह रावत से भी पार्टी ने 115 दिनों में इस्तीफा ले लिया। दोस्तो उस समय संवैधानिक बाध्यताओं और राजनीतिक परिस्थितियों ने एक बार फिर यह दिखाया कि उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पद पर बने रहना आसान नहीं है। इसके बाद बीजेपी ने दो बार के विधायक पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया, जो अभी तक बरकार है। दोस्तो 2017 बीजेपी सरकार का तीसरी चार्ज पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया गया। वो तब केवल खटीमा से बीजेपी विधायक थे। सीएम धामी का ये पहला कार्यकाल 262 दिन का रहा है। इसके बाद 2022 में प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। बीजेपी ने 2022 में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा और बीजेपी को जीत भी मिली। हालांकि, दोस्तो सीएम रहते हुए भी पुष्कर सिंह धामी खुद खटीमा से चुनाव हार गए थे लेकिन हाईकमान का भरोसा उन पर कायम था और 2022 में फिर से पुष्कर सिंह धामी को ही मुख्यमंत्री बनाया गया। यह कदम बीजेपी की रणनीति में बदलाव का संकेत था, जिसमें पार्टी ने बार-बार नेतृत्व बदलने की परंपरा से हटकर स्थिरता और निरंतरता को प्राथमिकता दी। हालांकि, उपचुनाव में धामी को चंपावत सीट से जीत मिली। प्रदेश के इतिहास में पहली बार हुआ था, जब कोई सरकार रिपीट हुई हो। वरना राज्य गठन के बाद से उत्तराखंड में यही ट्रेंड देखने को मिल रहा था कि एक बार बीजेपी और एक बार कांग्रेस, लेकिन 2017 के बाद 2022 में बीजेपी के लगातार दो बार अपनी जीत दर्ज कराई तब से अब तक तो ठीक ही चल रहा है बल धामी जी का अब तो कौई ऐसी खबर भी नहीं, सब बढिया दिखाई देता है।