बड़ी परेशानी का कैसे निकलेगा समाधान? | Uttarakhand News

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उत्तराखंड के पहाड़, जहां कभी जीवन की रौनक बसती थी, आज वहां एक गहरा संकट मंडरा रहा है। क्या खाली होते गांव आने वाले कल की सबसे बड़ी चेतावनी हैं? रोज़गार की कमी, पलायन की मार और बुनियादी सुविधाओं का अभाव—आखिर क्यों मुश्किल होता जा रहा है पहाड़ में जीना? क्या है इस संकट की असली वजह और सबसे बड़ा सवाल—इसका समाधान क्या है? इन तमाम सवालों की पड़ताल मेरी इस रिपोर्ट में है। दोस्तो त्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में तेजी से घटती जनसंख्या अब एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। खासतौर पर पर्वतीय जिलों में गांव लगातार खाली हो रहे हैं. रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के चलते लोग बेहतर भविष्य की तलाश में मैदानी शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसका सीधा असर पहाड़ों के विकास और सामाजिक ढांचे पर देखने को मिल रहा है। दोस्तो ग्रामीण क्षेत्रों में अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि कई गांव पूरी तरह सूने पड़ गए हैं। घरों पर ताले लटक रहे हैं और खेत बंजर होते जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि युवा पीढ़ी के पलायन के कारण गांवों में केवल बुजुर्ग ही रह गए हैं, जिससे पारंपरिक खेती, पशुपालन और छोटे व्यवसाय लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं. इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था भी कमजोर होती जा रही है।

दोस्तो परेशानी इतनी भर नहीं है। आगे देखिए इससे भी ज्यादा भयंकर चुनौतियों से कैसे निपटेगा बल उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र, दोस्तो थोड़ा गौर कीजिएगा। दोस्तो मुद्दे पर “अपनी गणना, अपना गांव” अभियान के मुख्य संयोजक जोत सिंह बिष्ट ने गंभीर चिंता जाहिर कर रहे हैं। उनकी चिंता यूं ही नहीं, क्योंकि दोस्तो आने वाली जनगणना के आंकड़े पहाड़ों की वास्तविक स्थिति को और साफ करेंगे, जो चिंताजनक हो सकती है। जोत सिंह बिष्ट ने बताया कि राज्य निर्माण के बाद जनसंख्या के आधार पर विधानसभा सीटों का बंटवारा किया गया था। 1971 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के 13 जिलों में 70 विधानसभा सीटें तय हुई थीं, जिनमें 9 पर्वतीय जिलों को 40 और 4 मैदानी जिलों को 30 सीटें मिली थीं. लेकिन 2001 की जनगणना के बाद यह संतुलन बदल गया और पर्वतीय जिलों की सीटें घटकर 34 रह गईं, जबकि मैदानी क्षेत्रों की संख्या भी प्रभावित हुई। दोस्तो इससे पहले जो 2011 की जनगणना के अनुसार, टिहरी जिले की जनसंख्या में करीब 5 प्रतिशत और पौड़ी में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वहीं दूसरी ओर मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या लगभग 18 प्रतिशत तक बढ़ रही है। यह असंतुलन आने वाले समय में संसाधनों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी असर डाल सकता है। अब मै आपको आगे बताता हूं कैसे पहाड़ों के विकास में असर दिखेगा दोस्तो अगर इसी तरह पलायन जारी रहा तो भविष्य में।