दोस्तो अभी तो धामी सरकार के चार साल को लेकर बेमिशाल बताया ही जा रहा था लेकिन उससे अलग एक तस्वीर ऐसी भी है जहां देवभूमि उत्तराखंड में विकास के दावे बड़े-बड़े, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। कागजों में दौड़ती योजनाएं, पास होता बजट लेकिन गांवों में आज भी लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। क्या ये विकास सिर्फ फाइलों तक सीमित है? और आखिर कब बदलेगी गांवों की तस्वीर? बताउंगा आपको पूरी इस अधूरे विकास की पूरी कहानी अपनी इस रिपोर्ट के जरिए। दोस्तो एक के बाद एक कई सवाल बुनियादी सुविधायों को लेकर हो रहे हैं आप जनता कर रही है, लेकिन फिर सरकारी फाइलों में विकास का रंग बेहद गुलाबी दिखाया जा रहा है। क्यों ऐसा किया जा रहा है क्योंकि जो खबर मै आपको दिखाने जा रहा हूं। वो सिर्फ आपको हैरान ही नहीं करने वाली है बल्की आपको ये सोचने पर मजबूर कर देगी कि जिस प्रदेश में जल जंगल की कोई कमी नहीं वहां लोगों की जिंदगी असुविधाओं की भरमार है। दोस्तो वैसे तो गांव-गाव की तमाम सुविधाएं पहुंची हैं बल तो फिर बागेश्वर की गोमती घाटी के लोग आज क्यों परेशान हैं। दोसत्यो इस गोमती घाटी की आज एक कड़वी सच्चाई सामने आ रही है जहां कागजों में विकास दौड़ रहा है लेकिन जमीन पर आज भी गांव इंतजार कर रहे हैं।
दोस्तो गरुड़ तहसील के सीमावर्ती गांव पिंगलों न्याय पंचायत का क्षेत्र दोस्तो यहां के लोग पूछ रहे हैं कई सवाल आखिर विकास पहुंचा कहां है? अग्यारी महादेव से लेकर गरुड़ तक गोमती घाटी के किनारे बसे गांवों में हालात बद से बदतर हैं। दिखने में ये इलाका बेहद खूबसूरत है लेकिन इस खूबसूरती के पीछे सिस्टम की अंदेकी साफ दिखाई देती है और दोस्तो ग्रामीणों का साफ आरोप लगाते हैं काम उसी का हो रहा है। जिसकी पहुंच ऊपर तक है। दोस्तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों को बार-बार ज्ञापन दिए गए , लेकिन नतीजा आश्वासन तक ही सीमित रहा उससे आगे बढा ही नहीं बल। सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं छत्यानी और मजकोट गांव जहां सरकार की जल जीवन मिशन योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। बजट पास योजनाएं पास लेकिन गांव तक पानी नहीं बरसात में गंदा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण और सिस्टम खामोश हालात इतने खराब कि लोग खुद चंदा इकट्ठा कर कामचलाऊ पानी की लाइन चला रहे हैं।
अब दोस्तो जरा सरकार के दावों पर भी नजर डालिए मनरेगा में 15 दिन में भुगतान का वादा लेकिन यहां 3 से 4 महीने तक मजदूरी अटकी पड़ी है तो सवाल सीधा है दोस्तो क्या सिस्टम विभाग सरकार, सरकारी लोग, कर्मचारी, अधिकारी, मंत्री-संत्री सब पहाड़ी जिलों को गुमराह कर रहे हैं वो रिवर्स पलायन को लेकर तमाम तरह की कोशिशो और योजनाओं के बाद पलायन क्यों हो रहा है? जवाब भी साफ है। न रोजगार न आय न उद्योग और दोस्तो हैरानी की बात ये कि स्थानीय कामों में भी बाहरी लोगों से काम कराया जा रहा है हालांकि तस्वीर का एक पहलू ये भी है दोस्तो कुछ लोग वापस गांव लौट रहे हैं। अपने टूटे घरों को फिर से बसाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है। क्या सिस्टम जागेगा? क्या गोमती घाटी तक असली विकास पहुंचेगा? या फिर ये गांव यूं ही इंतजार करते रहेंगे? वैसी कई घाटियां हैं आज उत्तराखंड की जो ये बहुत से सवाल कर रही हैं। दोस्तों, गोमती घाटी की ये तस्वीर सिर्फ एक इलाके की नहीं बल्कि उन तमाम गांवों की कहानी है, जहां विकास अब भी कागजों में सिमटा हुआ है। क्या सिस्टम इन आवाजों को सुनेगा या फिर ये गांव यूं ही इंतजार करते रहेंगे? फिलहाल जरूरत है जमीनी हकीकत को बदलने की, ना कि सिर्फ फाइलों को भरने की जनता की जिंदगी मिसाल बनेगी तो सरकार सिस्मट का हर साल बेमिसाल होगा।