उत्तराखंड के चमोली जिले की उर्गम घाटी में निर्माणाधीन उर्गम पल्ला जखोला मोटर मार्ग पर हुए हादसे में अब तक 12 लोगों की मौत हो गई। खाई इतनी गहरी थी कि इसमें गिरते ही वाहन के परखच्चे उड़ गए और हाहाकार चीत्कार मच गया। बताया जा रहा है कि 10 सीटर वाहन में 17 लोग सवार थे। जान बचाने के लिए खाई की ओर सरकते वाहन से कूदे तीन लोग घायल हो गए। वहीं वाहन को रोकने के लिए टायर में पत्थर लगाने उतरे दो लोग बाल-बाल बच गए।
कैसे हुआ हादसा
सवारियों से खचाखच भरी मैक्स सामान्य गति से पल्ला- जखोला जा रही थी। कुछ लोग छत पर बैठे थे और कुछ पीछे लटके हुए थे। चढ़ाई पर ड्राइवर ने गियर बदल कर इंजन की शक्ति बढ़ाई तो सामने अचानक खच्चर आ गया। इस कारण उसे ब्रेक लगानी पड़ी। खच्चर से बचकर आगे बढ़ने के लिए उसने एक्सीलरेटर पर दबाव बढ़ाया तो वाहन आगे ही नहीं बढ़ा।” यह आपबीती सुनाई हादसे का शिकार हुई मैक्स में सवार अजीत यादव की, जो जखोला गांव जा रहे थे।
उन्होंने बताया कि इंजन बंद तो नहीं हुआ लेकिन वाहन पीछे सरकने लगा। यह देख ड्राइवर सुबोध सिंह ने सवारियों से उत्तर कर गाड़ी रोकने के लिए पत्थर लगाने को कहा। मेरे साथ एक और सवारी उतरी और जल्दी से एक पत्थर पिछले टायर के नीचे लगा दिया। बावजूद इसके वाहन नहीं रुका और पत्थर पार कर तेजी से खाई की ओर बढ़ने लगा। यह देख तीन लोग मैक्स से कूद पड़े। उनके कूदते ही गाड़ी खाई में गिर गई।
गाड़ी गिरने की तेज आवाज के साथ सवार लोगों की चीख से सभी दहल गए। अजीत ने ही पुलिस को सूचना दी। पुलिस के साथ ही एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जवान पहुंचे और बचाव अभियान शुरू हो गया। तब तक ग्रामीण भी पहुंच गए थे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन ओवरलोडेड वाहनों पर दुर्घटना से पहले एक्शन क्यों नहीं हो पाता है? किसकी मिलीभगत और लापरवाही से जोखिम भरी सड़कों पर ओवरलोडेड वाहन दौड़ रहे होते हैं? आखिर परिवहन महकमे के वो कौन अफसरान हैं जो वाहनों के दुर्घटना होने का इंतजार करते हैं, उससे पहले अपनी ड्यूटी से कौताही बरत लोगों की जान से खिलवाड़ होने देते हैं?