जब हक़ नहीं मिलता तो आवाज़ सड़कों पर उतरती है और आज बात बिंदुखत्ता की, जहां राजस्व ग्राम का दर्जा देने की मांग ने आंदोलन का रूप ले लिया है। लालकुआं की सड़कों पर हजारों लोग उतर आए हाथों में तख्तियां, जुबां पर नारे और सरकार को सीधी चेतावनी—अब और इंतज़ार नहीं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वर्षों से बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने का आश्वासन मिलता रहा, लेकिन ज़मीन पर कोई ठोस फैसला नहीं हुआ। क्या सरकार इस जनसैलाब की आवाज़ सुनेगी? या फिर ये आंदोलन और उग्र होगा? आज इसी मुद्दे पर करेंगे विस्तार से बात। लंबे समय से लालकुआं के बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने की मांग की जा रही है. लेकिन सरकार की तरफ से इस मसले पर कोई फैसला नहीं लिया गया। इसीलिए अब लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। अपनी आवाज तो सरकार तक पहुंचाने के लिए बिंदुखत्ता की जनता सड़कों पर उतरी और आज बुधवार 18 फरवरी को करीब 12 हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन कर बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने की मांग की। बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने की मांग को लेकर हजारों की संख्या में लोग एकत्र हुए है। इसके बाद सभी जुलूस निकालते हुए लालकुआं तहसील पहुंचे, जहां उन्होंने जिलाधिकारी को ज्ञापन प्रस्तुत किया। बिंदुखत्ता संघर्ष समिति की तरफ से साफ किया है कि अगर उनकी मांगे जल्द पूरी नहीं होती तो आंदोलन को और तेज़ किया जाएगा। दोस्तो लालकुआं के बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित किए जाने की मांग अब जनआंदोलन का रूप लेती जा रही है। बिंदुखत्ता राजस्व गांव संघर्ष समिति के तत्वावधान में जड़ सेक्टर स्थित जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परिसर में हजारों की संख्या में क्षेत्रवासी एकत्र हुए। जनसभा में लोगों ने सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी करते हुए शीघ्र राजस्व गांव की अधिसूचना जारी करने की मांग की। सभा में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी पहुंचे और आंदोलन को समर्थन दिया। वक्ताओं ने कहा कि बिंदुखत्ता के लोगों की यह वर्षों पुरानी मांग है और इसे अब और अधिक टाला नहीं जाना चाहिए।
इतना ही नहीं दोस्तो उन्होंने राज्य सरकार से अविलंब क्षेत्र को राजस्व गांव घोषित करने की अधिसूचना जारी करने की मांग की। जनसभा के बाद हजारों की संख्या में लोग जुलूस के रूप में शहीद स्मारक से होते हुए मुख्य चौराहे तक पहुंचे और वहां से तहसील की ओर कूच किया। विशाल जनसैलाब को देखने के लिए मार्गों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। प्रदर्शनकारियों ने तहसील पहुंचकर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा और दो माह के भीतर बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित करने की मांग दोहराई। दोस्तो इधर संघर्ष समिति के पदाधिकारी अर्जुन गोस्वामी ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समयावधि में मांग पूरी नहीं की गई तो उग्र आंदोलन शुरू किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर जिलाधिकारी कार्यालय का घेराव और मुख्यमंत्री आवास तक कूच भी किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी। इसके अलावा दोस्तो कुछ वक्ताओं ने आरोप लगाया कि आंदोलन को कमजोर करने के प्रयास किए गए, लेकिन क्षेत्रवासियों की एकजुटता ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। लोगों ने साफ कहा कि जब तक बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा नहीं मिलता, उनका संघर्ष जारी रहेगा. बता दें कि बिंदुखत्ता में करीब एक लाख की आबादी निवास करती है।
दरअसल दोस्तो बिंदुखत्ता के राजस्व गांव बनाने की मांग कोई आज की नहीं है. बल्कि कई साल पुरानी है. बिंदुखत्ता के राजस्व गांव बनाने की पहली घोषणा साल 2009 में हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने अपने कार्यकाल में बिंदुखत्ता के राजस्व गांव की बात कही थी। इसके बाद साल 2011 में रमेश पोखरियाल निशंक प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, उन्होंने भी बिंदुखत्ता के राजस्व गांव घोषित करने की ऐलान किया है लेकिन शासन स्तर पर उस घोषणा पर भी कोई काम नहीं हुआ। तीसरी बार 20 फरवरी 2024 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी बिंदुखत्ता के राजस्व गांव बनाने की घोषणा की, लेकिन पर अभी तक अमल नहीं हुआ है। इसीलिए बिंदुखत्ता की जनता का गुस्सा बढ़ता जा रहा है क्योंकि बार उनकी उम्मीद टूट रही है। दरअसल, साल 1966 में गौला और लालकुआं (वर्तमान बिंदुखत्ता क्षेत्र) को वन विभाग ने बिना बंदोबस्ती की प्रक्रिया पूरी किए आरक्षित वन घोषित कर दिया। जबकि भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा चार से बीस के तहत नियम ये कहता है कि स्थानीय बसासत और लोगों के अधिकार तय करना आवश्यक था। साल 1993 में बंदोबस्ती शुरू की थी, लेकिन तब भी विभागीय लापरवाही के कारण प्रकिया अधूरी रह गई, जिसका खामियाजा बिंदुखत्ता की जनता अभी तक उठा रही है. अब लोगों की मांग है कि सरकार आरक्षित वन की अधिसूचना रद कर बंदोबस्ती प्रक्रिया पूरी करे, जिससे कि लोगों को वैध राजस्व अधिकार मिल सकें। तो दोस्तो, बिंदुखत्ता की यह लड़ाई सिर्फ एक प्रशासनिक दर्जे की नही बल्कि हक, पहचान और अधिकारों की लड़ाई बन चुकी है।करीब एक लाख की आबादी वाला क्षेत्र, जहां दशकों से लोग रह रहे हैं, आज भी राजस्व अधिकारों से वंचित है। 2009 से लेकर 2024 तक कई घोषणाएं हुईं। अलग-अलग मुख्यमंत्रियों ने आश्वासन दिए लेकिन ज़मीनी हकीकत अब भी अधूरी है।अब जब 12 हजार से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर आए हैं और दो महीने की समयसीमा दे दी गई है, तो सवाल सीधा है—क्या इस बार सरकार ठोस फैसला लेगी? या फिर एक और घोषणा उम्मीद बनकर रह जाएगी?संघर्ष समिति ने साफ कर दिया है—अगर मांग पूरी नहीं हुई तो आंदोलन और उग्र होगा। ऐसे में बिंदुखत्ता का मुद्दा आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है।फिलहाल नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं और हम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपडेट देते रहेंगे