उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए मजबूत कदम, एसडीआरएफ और फायर डिपार्टमेंट को मिलेगा आधुनिक तकनीकी समर्थन लेकिन ऐसे कदम उठाने में देरी क्यों की गई। Uttarakhand Disaster Management जब तबाही का मंजर हमारे सामने है, जब चिंड़िया चुग गई खेत। दगडि़यों आपदा प्रबंधन को लेकर कई सवाल होते रहे हैं। जब-जब प्रदेश में आपदा आती है, तब-तब प्रबंधन को लेकर सवाल उठते हैं। क्या हमारी तकनीक में कमीयां है? क्या हम अपडेड नहीं है? आधुनिक चीजों की कमी है लेकिन अब एक खबर निकल कर आई है कि कि आपदा प्रबंधन विभाग कंजूसी को खत्म करने जा रह है। ये विभाग जो अब दगड़ियों पैसे खर्च करने की बात कर रह है। ये पूरी खबर बहुत महत्वपूर्ण है, संवेदशील है क्योंकि पहाड़ पर आफत आई है। इसलिए आप से गुजारिश ये की आप अंत तक मेंरे साथ बने रहें, ताकि मै आपको बता पाउं कि एसी आपदाओं से निपटने वाला हमारा विभाग आपदा प्रबंधन विभाग कितना कंजूस है पैसे खर्च करने के मामले में साथ ही आपको बताउंगा कि अब जो पैसा खर्च करने की बात कही जा रही है उससे क्या-क्या होगा।
दगड़ियो उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियाँ और मानसून सीजन के दौरान लगातार होने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारण राज्य को भारी नुकसान उठाना पड़ता है, ये तो हम सभी जानता हैं। बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना जैसे घटनाएँ न केवल जान-माल का नुकसान करती हैं, बल्कि जीवन को भी अस्त-व्यस्त कर देती हैं। हर साल इन घटनाओं से निपटने के लिए उत्तराखंड सरकार को विशेष प्रयासों की आवश्यकता महसूस होती है। इस स्थिति को देखते हुए, राज्य सरकार ने अब आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाने की योजना बनाई है। दगड़ियों आपदा प्रबंधन विभाग ने प्राकृतिक आपदाओं के कारणों और उनके प्रभावों का गहराई से अध्ययन करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस अध्ययन से यह उद्देश्य है कि भविष्य में आपदाओं के संकेत मिल सकें, ताकि समय रहते उचित उपाय किए जा सकें और नुकसान को कम किया जा सके। विभाग का यह भी मानना है कि प्राकृतिक घटनाओं को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
दगड़ियों राहत-बचाव कार्यों में तेजी लाने और उनका असरदार बनाने के लिए सरकार एसडीआरएफ (State Disaster Response Force) और फायर डिपार्टमेंट को आधुनिक उपकरणों से लैस करने पर जोर दे रही है। इसके लिए आपदा प्रबंधन विभाग ने विश्व बैंक की “यू प्रिपेयर” परियोजना के तहत इन विभागों को अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत एसडीआरएफ और फायर डिपार्टमेंट के लिए 127 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। दी हां दगड़ियों हाधा पहाड़ अभी घायल अवस्था में है। तब ये खबर आ रही हैं कि एसडीआरएफ के लिए 27 करोड़ रुपये के उपकरण खरीदे जाएंगे। इनमें रेस्क्यू और राहत कार्यों के लिए आवश्यक सभी चीजें जैसे स्पेशल रेस्क्यू गियर, वाहन, और अन्य तकनीकी उपकरण शामिल होंगे। इसके अलावा, फायर डिपार्टमेंट के लिए 100 करोड़ रुपये की योजना बनाई गई है, जिसमें उपकरण खरीदने के साथ-साथ एक फायर ट्रेनिंग सेंटर बनाने और पुराने फायर स्टेशनों को सुधारने का भी कार्य शामिल है।
दोस्तो ये सब बताने के लिए काफी है कि इसका मतलब जरूरत पहले से थी विभाग ने पैसा खर्च नहीं किया। आज जब सैलाब पहाड़ के गले -गले आ गया तब आधुनिकता एडवांस तकनीक की याद आ रही है। खैर दोस्तो देर आए आए तो सही आगे से कुछ सहायता तो मिलेगी आपदा से निपटने के लिए। दगड़ियो राहत-बचाव कार्यों के दौरान समय की महत्ता को समझते हुए, एसडीआरएफ और फायर डिपार्टमेंट के रिस्पांस टाइम को कम करने पर भी जोर दिया जा रहा है। पहले जहां औसतन रिस्पांस टाइम लगभग 30 मिनट था, वहीं अब इसे घटाकर 11 से 12 मिनट कर दिया गया है। सरकार अब इस रिस्पांस टाइम को और बेहतर करने के लिए कदम उठा रही है, ताकि भविष्य में आपदाओं के दौरान त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की जा सके इसके साथ ही दोस्तो आपदा प्रबंधन विभाग में विशेषज्ञों की कमी को दूर करने के लिए नई भर्ती की जा रही है। साथ ही, विभाग के कर्मचारियों और स्थानीय समुदाय के लिए नियमित प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।
इसके साथ ही आम जनता को आपदा से निपटने के उपायों के बारे में जागरूक करने के लिए “आपदा मित्र” और “आपदा सखी” जैसी योजनाओं को लागू किया गया है। दगड़ियों अपने उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे के बीच, राज्य सरकार ने राहत और बचाव कार्यों को मजबूत करने की दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं उन ये वाला कदम मील का पत्थर साबित होगा। एसडीआरएफ और फायर डिपार्टमेंट को अत्याधुनिक उपकरणों से लैस करने और रिस्पांस टाइम को बेहतर बनाने के साथ-साथ, विभाग में विशेषज्ञों की भर्ती और स्थानीय समुदाय को प्रशिक्षित करने का भी काम किया जा रहा है। इस प्रकार, उत्तराखंड सरकार अपनी आपदा प्रबंधन क्षमता को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है, ताकि भविष्य में आपदाओं का सामना करते समय मानवीय नुकसान को कम किया जा सके।