जी हां दोस्तो प्रदेश में बेरोगार युवाओं के लिए रोजगार बड़ा मसला रहा है, युवाओँ की भर्ती को लेकर सवाल होता रहा है, लेकिन जब इधर एक तरफ युवा ताक रहे हैं सरकारी नौकरी तो उधर युवआओँ के भविष्य से खिलवाड़ पर कोर्ट ने लगाई है इस बार दबरदस्त फटकार और पूछ लिया वो वाला सवाल जो ना जाने मै और आप कब से पूछ रहे हैं होगे। प्रदेश के पढ़े लिखे युवाओं पूछ रहे हैं, वो ये कि स्वीकृत पद खाली भर्ती क्यों नहीं करा रही सरकार और कैसे हाईकोर्ट की लगी फटकार। जी हां दोस्तो उत्तराखंड के युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ ने अब कोर्ट की नजर भी खींच ली है, लंबे समय से खाली पड़े पदों पर भर्ती नहीं होने से बेरोज़गारी और असंतोष बढ़ता जा रहा है, और अब हाईकोर्ट ने सरकार पर कड़ी फटकार लगाते हुए जवाब मांगा है। आखिर क्यों इतने वर्षों तक युवाओं की मेहनत और आशाओं को ठेंगा दिखाया जा रहा है? इस घातक चुप्पी के पीछे की सच्चाई। दोस्तो उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों में स्वीकृत पड़े खाली पदों पर नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू न करने पर सरकार के विरुद्ध कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रदेश के युवा एक तरफ सरकारी नौकरी के इंतजार में है जिसके चलते वह ओवर ऐज हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर सरकार नियमित पदों को भरने के बजाय आउटसोर्स और अस्थाई माध्यमों से काम चला रही है जिसे कोर्ट ने पूरी तरह से तर्कहीन करार दिया है।
दोस्तो यहां मै आपको बता दूं कि नैनीताल हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने सरकारी विभागों में खाली पड़े स्वीकृत पदों पर नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू ना करने पर नाराजगी जताई है। पीठ ने टिप्पणी की कि स्वीकृत और रिक्त पदों पर ठेके या आउटसोर्सिंग के जरिए नियुक्ति ना करना सिर्फ युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही नहीं बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 16 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन भी है जिसे कोर्ट ने राज्य की निष्क्रियता माना है। दोस्तो सुनवाई के दौरान अदालत ने चतुर्थ श्रेणी पदों को ड्राइंग कैडर मे समाप्त होने वाला संवर्ग घोषित किए जाने पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने संज्ञान लिया कि उत्तर प्रदेश की जिस नीति को आधार बनाकर उत्तराखंड में इन पदों को खत्म किया जा रहा है उसे इलाहाबाद हाई कोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है। ऐसे में प्रदेश में इन पदों को समाप्त करना युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों को बंद करने जैसा है। न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव को सख्त निर्देश दिए हैं कि वो सभी विभागों के सचिवों से रिक्त पदों का पूरा डाटा एकत्र करें और एक विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करें। यही नहीं बल्कि सरकार को ये बताना होगा कि जब पत्र स्वीकृत है तो उन पर नियमित भर्ती क्यों नहीं की जा रही है और क्यों इन पदों को आउटसोर्स या दैनिक वेतन भोगियों के माध्यम से भरा जा रहा है। इस महत्वपूर्ण मामले पर अगली सुनवाई 16 फरवरी 2026 को होना तय हुआ है।
इससे इतर दोस्तो उत्तराखंड में कई विभाग ऐसे हैं जो आउटसोर्स ठेका और संविदा कर्मचारियों के भरोसे चल रहे हैं, हालांकि वर्तमान में राज्य में स्थाई पदों पर आउटसोर्स के माध्यम से भर्तियो पर रोक है। सरकारी विभाग में चतुर्थ श्रेणी के पदों पर भर्ती नहीं हो रही है चतुर्थ श्रेणी के पदों को सातवें वेतनमान में मृत घोषित कर दिया गया है जिसे कर्मचारी संगठन लगातार चतुर्थ श्रेणी पदों को पुनर्जीवित करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा आउटसोर्स संविधान नियुक्तियों पर मुख्य सचिव आनंद वर्धन ने 26 अप्रैल 2025 को रोक लगा दी थी। इससे पहले 2003 में कार्मिक विभाग ने यह रोक लगाई थी। अब कोर्ट की ताजा आदेश के अनुसार आउटसोर्स नियुक्तियों पर नए सिरे से भर्ती की तैयारी की जा रही है। प्रदेश में 22,000 ऑप्शनल कर्मचारियों समेत पीआरडी ठेका स्वयं सहायता समूह के जरिए 40,000 से अधिक अस्थाई कर्मचारी विभिन्न विभागों और नियमों में सेवाएं दे रहे हैं जिन्हें महंगाई भत्ते समेत वेतनमान और अन्य सुविधाएं मिल रही है। उत्तराखंड के युवाओं की उम्मीदें और उनकी मेहनत अब सिर्फ सवालों के घेरे में नहीं रह सकती। हाईकोर्ट की फटकार ने सरकार को याद दिला दिया है कि खाली पड़े पदों और लटके भर्ती मामलों को अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। अब नजरें इस बात पर हैं कि प्रशासन कब और कैसे युवाओं के भविष्य के साथ हुए इस खिलवाड़ का समाधान करता है।