उत्तराखंड के पहाड़ों में होली का ऐतिहासिक उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। हर गांव और घाटी में होल्यार झूम रहे हैं, पारंपरिक गीत और नृत्य से वातावरण रंगीन और जीवंत हो गया है। दोस्तों, इस पर्व की खूबसूरती और संस्कृति से भरी हर झलक, सिर्फ उत्तराखंड में! दोस्तो होली महज रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है। भारतीय परंपरा में पर्व-त्योहार जीवन में आशा, आकांक्षा, उत्साह व उमंग का ही संचार नहीं करते, मनोरंजन, उल्लास व आनंद देकर जीवन को सरस भी बनाते हैं। देशभर में होली का खुमार चढ़ने लगा है। इसी कड़ी में उत्तराखंड के अलग अलग जिलों से होली मिलन कार्यक्रम की अलग अलग तस्वीरें आ रही हैं। पहाड़ी इलाकों में खड़ी होली, बैठकी होली की धूम है। होली मिलन कार्यक्रम में पुरुष, महिलाएं जमकर झूम रहे हैं। होल्यार होली के रंगों से सराबोर हैं, काली कुमाऊं की होली का अपना समृद्ध इतिहास है। पूरे प्रदेश में कुमाऊं के चंपावत में खेली जाने वाली होली अपनी अलग पहचान रखती है। लोहाघाट में होली महोत्सव का आयोजन खड़ी होली के उस खूबसूरत रूप एवम परंपरा को प्रस्तुत करता है जो कुमाऊं की काली कुमाऊं की होली परंपरा की सांस्कृतिक विरासत का सजीव उदाहरण है।
दोस्तो होली महोत्सव के माध्यम से लोहाघाट के बुजुर्ग,महिलाए युवा एवं बच्चे अपनी सांस्कृतिक होली आयोजन की विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बड़ाने का काम कर रहे हैं। लोहाघाट रामलीला मैदान में हर वर्ष आयोजित होने वाला होली महोत्सव पूरे जिले में आयोजित होने वाले होली आयोजन में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। इस वर्ष भी इसका शुभारंभ भव्यता और उत्साह के साथ हुआ। रामलीला मंच परिसर में आयोजित दो दिवसीय महोत्सव में नगर व ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिला होलियारों का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। रामनगर में भी इन दिनों होली का उल्लास चरम पर है। गलियों से लेकर सामुदायिक सभागारों तक, हर ओर रंग, संगीत और पारंपरिक स्वरों की गूंज सुनाई दे रही है। खास बात यह है कि इस बार महिलाओं की भागीदारी ने होली के उत्सव को और भी जीवंत बना दिया है। महिलाएं घरों की जिम्मेदारियां निभाने के बाद टोली बनाकर होली गायन कार्यक्रमों में पहुंच रही हैं। खड़ी होली व बैठकी होली के जरिए परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। रामनगर में महिला होल्यारों ने पारंपरिक परिधानों में सजे-धजे मंच संभाला तो पूरा वातावरण भक्तिमय और उत्साहपूर्ण हो उठा।
रामनगर में खड़ी होली और बैठकी होली की परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है। खड़ी होली में महिलाएं गोल घेरा बनाकर खड़े होकर सामूहिक गायन करती हैं, जबकि बैठकी होली में शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत बैठकर गाए जाते हैं। दोस्तो तबला हारमोनियम और मृदंग की संगत में जब सुर छेड़े जाते हैं, तो पूरा माहौल आध्यात्मिक रंग में रंग जाता है. यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि संगीत, भक्ति और लोकसंस्कृति का संगम है. कुमाऊं मंडल के अन्य जिलों—अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत—में भी होली का यही रंग देखने को मिल रहा है। यहां की होली उत्तर भारत की सामान्य रंगोत्सव परंपरा से अलग मानी जाती है। इसमें संगीत और शास्त्रीय रागों का विशेष महत्व है। दोस्तो इतिहासकारों के अनुसार कुमाऊं की होली की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है. इसकी जड़ें चंद्रवंशी राजाओं के शासनकाल से जुड़ी मानी जाती हैं। बाद में मुगलकालीन दरबारी संगीत और भक्ति आंदोलन का भी इस पर प्रभाव पड़ा. विशेष रूप से कृष्ण भक्ति की छाप कुमाऊंनी होली के गीतों में स्पष्ट दिखाई देती है। यही कारण है कि यहां की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का अवसर भी बन जाती है। दोस्तों, उत्तराखंड में होली का उत्सव सिर्फ रंगों और संगीत का मेल नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और लोकपरंपरा का जीवंत प्रतिबिंब भी है। कुमाऊं और गढ़वाल की होली में शास्त्रीय रागों, पारंपरिक गीतों और भक्ति भाव का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। लोहाघाट, रामनगर और काली कुमाऊं के गांवों में बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे मिलकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। महिला होलियारों की सक्रिय भागीदारी ने इस पर्व को और भी उत्साहपूर्ण और जीवंत बना दिया है तो दोस्तों, होली केवल खेल या मनोरंजन नहीं, बल्कि संगीत, भक्ति और पहाड़ी संस्कृति का उत्सव है। यही वजह है कि उत्तराखंड की होली हर किसी के लिए यादगार और खास बन जाती है।