दोस्तो, क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड की पहचान और शान रहा एक ऐसा नाम, जिसे कभी हर हाथ में देखा जाता था? जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ एचएमटी घड़ी की, जो सिर्फ समय नहीं बताती थी, बल्कि एक स्टेटस सिंबल भी हुआ करती थी। लेकिन आज, ये घड़ियाँ इतिहास बनकर रह गई हैं और उत्तराखंड से इसका गहरा नाता है – लेकिन मै आज क्यों गायब हो चुकी एचमटी की बात कर रहा हूं। दोस्तो खासकर काठगोदाम का एचएमटी इलाका, जहाँ कभी ये घड़ियाँ बनती थीं और हजारों लोगों की रोज़गार की जिंदगी चलती थी तो चलिए, मैं आपको लेकर चलता हूँ उस इलाके में, जहाँ एचएमटी की कहानी आज भी लोगों की यादों में जीवित है और फैक्ट्री की बंद पड़ चुकी यूनिट खंडहर बन चुकी है। यहाँ से शुरू होती है मैरी खास रिपोर्ट, एचएमटी घड़ी की धरोहर। दोस्तो आज मेरी सामने एक खबर आई कि उत्तराखंड में स्थित डीआईबीईआर, डीएआरएल प्रयोगशालाओं को बंद किया जा रहा है।इसको लेकर कई तरह की आशंकाएं तैर रही हैं। इसके लिए बीजेपी के सांसद अजय भट्ट ने रक्षा मंत्री को बकायदा एक पत्र भी लिखा है और लिखा है कि इन आशंकाओँ को दूर करें बताएं की खबर क्या है, क्या वाकई ये दोनों संस्थान उत्तराखंड में बंद हो जाएगे। ये एक सवाल है दोस्तो इसके बारे में मेने एक रिपोर्ट बनाई है वीडियो आप पेज पर देख सकते हैं कि ये दोनों डीआईबीईआर, डीएआरएल प्रयोगशालाएं हैं क्या और ये उत्तराखंड के लिए कितने महत्वपूर्ण है, लेकिन दोस्तो एक ऐसी खबर तब आई थी एचएमटी को लेकर, लेकिन तब हम एचमटी को बचा नहीं आए। दोसतो दो उस दौर में खबर आई थी उससे कभी हर हाथ में दिखाई देने वाली एचएमटी घड़ी अब इतिहास बनकर रह गई। जिस घड़ी को पहनना स्टेटस सिंबल माना जाता था, आज वह गुजरे जमाने की बात हो गई है। कंपनी बंद होने से कई लोगों का रोजगार तो छिना ही, साथ ही इस कंपनी की घड़ियों के शौकीनों को तगड़ा झटका लगा. कई लोगों ने आज भी इस कंपनी की घड़ियों को सहेज कर रखा है।
दोस्तो, 90 के दशक में एचएमटी कंपनी की घड़ियां लोगों की हाथों की शान हुआ करती थी। एचएमटी की घड़ियां स्टेटस सिंबल मानी जाती थी, लेकिन अब एचएमटी की घड़ियां इतिहास बन कर रह गई हैं। शादी के दौरान दूल्हे को या रिटायरमेंट के दौरान कर्मचारियों को उपहार के रूप में एचएमटी की घड़ियां देने का रिवाज था। लेकिन आज एचएमटी की घड़ियां लोगों की कलाइयों से दूर हो गई हैं. इसका मुख्य कारण है कि कई साल पहले एचएमटी फैक्ट्री ने अपनी सभी यूनिट को बंद कर दिया था. लेकिन आज भी लोगों के जुबान पर एचएमटी कंपनी की घड़ी का नाम सुना जा सकता है। उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रानीबाग में एचएमटी घड़ी की फैक्ट्री हुआ करती थी लेकिन एचएमटी की फैक्ट्री अब बंद हो चुकी है. एचएमटी फैक्ट्री हर साल 20 लाख से अधिक घड़ियों का उत्पादन करती थी लेकिन समय बदला और परिस्थितियां विपरीत हुईं तो एचएमटी इतिहास बनकर रह गयी है। अब एचएमटी फैक्ट्री खंडहर में तब्दील हो चुकी है। दोस्तो साल 1990 के दशक में लोगों को घड़ी पहनने का बढ़ा क्रेज था. शादी के दौरान दूल्हा हो या रिटायरमेंट के दौरान कर्मचारियों को या एग्जाम पास करने में बच्चों को उपहार स्वरूप एचएमटी की घड़ियां दी जाती थी। लेकिन अब एचएमटी कंपनी की घड़ी का अस्तित्व खत्म हो गया है। एचएमटी फैक्ट्री कुमाऊं की शान हुआ करती थी। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्र में उद्योग मंत्री रहते हुए स्वर्गीय एनडी तिवारी की पहल पर साल 1982 में प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के कार्यकाल में फैक्ट्री को मंजूरी मिली।
साल 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने एचएमटी फैक्ट्री का उद्घाटन किया। करीब 91 एकड़ में फैले एचएमटी घड़ी कारखाना व आवासीय परिसर में 1246 कर्मचारी काम किया करते थे। लेकिन आज कर्मचारियों की नौकरी खत्म हो चुकी है। आज एचएमटी के कर्मचारी भी इस फैक्ट्री की बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। साल 1985 में स्थापित फैक्ट्री में हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। स्वर्णिम दौर में यहां हर साल 20 लाख से अधिक घड़ियों का उत्पादन होता था। शुरुआती दिनों में फैक्ट्री में 1246 कर्मचारी काम किया करते थे. कुप्रबंधन के कारण फैक्ट्री पर संकट के बादल मंडराने लगे। साल 1993-94 में फैक्ट्री घाटे में आने लगी, जिसके बाद कई बार इस फैक्ट्री को चलाने के लिए वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई गई, लेकिन साल 2016 में मैनेजमेंट ने फैक्ट्री को बंद कर दिया। आज भी घड़ी पहनने वाले शौकीन एचएमटी घड़ी की तलाश करते हैं। दोस्तो हल्द्वानी के सबसे बड़े घड़ी कारोबारी कहते दिखाई देते हैं कि साल 1990 से लेकर 2000 तक एचएमटी फैक्ट्री में घड़ियों का उत्पादन हुआ. लोगों की एचएमटी घड़ी पहली पसंद हुआ करती थी। लेकिन बाजार में नई कंपनियां आने के बाद प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू हो गया। यहां तक कि एचएमटी की घड़ियां पोस्ट ऑफिस में भी मिला करती थी। आज भी लोग एचएमटी घड़ी की मांग करते हैं लेकिन बाजारों में उपलब्ध नहीं होने के चलते लोग नहीं खरीद पाते हैं। दोस्तो घड़ी कारोबारी ये कहते हैं कि एचएमटी घड़ी की क्वालिटी अन्य कंपनियों की घड़ियों की तुलना में बेहतर थी। इसका मेंटेनेंस भी आसान हुआ करता था, लुक के साथ-साथ कई डिजाइन में एचएमटी अपनी घड़ियों को तैयार करती थी जो लोगों की पहली पसंद हुआ करते थी। घड़ी के शौकीन आज भी एचएमटी घड़ी की मांग करने हैं, लेकिन कुछ लोगों ने एचएमटी की घड़ियों को अब धरोहर के रूप में भी अपने घर में रखा है। दोस्तो, एचएमटी घड़ी सिर्फ समय बताने का जरिया नहीं थी, बल्कि उत्तराखंड की शान, हमारी यादों और हमारी पहचान का हिस्सा भी थी। उस फैक्ट्री में काम करने वाले हजारों लोगों की मेहनत और मेहनत की यह कहानी आज खंडहर में बदल गई है। लेकिन घड़ी पहनने का जो क्रेज, वो शौक और वो सम्मान कभी खत्म नहीं होगा। ऐसे में एचएमटी सिर्फ एक ब्रांड नहीं, बल्कि हमारे दौर की यादों का एक अमिट हिस्सा बनकर रह गई है। और यकीन मानिए, जिनके घरों में आज भी यह घड़ी सुरक्षित है, उनके लिए यह एक धरोहर है, एक याद है, एक सम्मान है।