उत्तराखंड में ‘शराबी’ शोर! | Uttarakhand News | Devprayag News | Excise Department

Spread the love

तो दोस्तो क्या अपने उत्तराखंड में शराबी शोर है। शराबीशोर का तमलब ये है कि यहां एक तरफ शऱाब पर जनता और अधिकारी भिड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ आबकारी विभाग शराब के नए ठेके खोलने जा रहा है और ताजुब की बात ये कि इनमें से किसी ने शाराब नहीं पी ऱखी है। बिना पीए इतना शोर है तो फिर पीकर क्या आलम होगा। मै आज अपने पहाड़ की उस समस्या के बारे में बात करने आया हूं। जहां एक ओर शराबबंदी के फैसले, भारी विऱोध तो दूसरी ओर 55 नई दुकानों की तैयारी। दोस्तो शराब एक तऱफ अवैध तरह से खूब परोसी जा रही है। उस पर नकेल कम ही दिखाई देती है। वहीं दूसरी ओर सरकार और आबकारी विभाग पुराने बवाली ठेको बचाने के लिए लड़ रहा है और साथ ही नहीं दुकान सजाने की तैयारी भी। ये तस्वीर बेरीनाग की है उड़ियारी बैंड में शराब दुकान के विरोध में महिलाएं सड़कों पर उतरी. महिलाओं ने शराब दुकान के विरोध में तहसीलदार का घेराव किया, क्यों किया शराब के ठेके का विरोध हो रहा है। लेकिन तस्वीर और विरोध की बयार है, कतार लंबी है। तो क्या अब शराब का विरोध करने पर अधिकारियों से ऐसे धक्के मिलेंगे? दोस्तो जब ‘साला’ कहने पर मंत्री पर कार्रवाई हो सकती है, तो अधिकारी पर क्यों नहीं? ऐसे विभाग पर क्यों नहीं। क्या शराब का ठेका इतना जरूरी हो गया।

दोस्तो टिहरी गढ़वाल में शराब के ठेके का विरोध कर रहे पूर्व प्रधान नेत्र सिंह को जिला आबकारी अधिकारी के.पी. सिंह द्वारा धक्का देने का वीडियो सामने आया है। इस घटना के बाद लोगों में नाराज़गी है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब विरोध की आवाज उठाने पर ग्रामीणों को ऐसे व्यवहार का सामना करना पड़ेगा? तीर्थनगरी देवप्रयाग की पावन मर्यादा को ताक पर रखकर खोले गए शराब के ठेके के विरोध में जन-आक्रोश की ज्वाला धधक उठी है। आंदोलन के दूसरे दिन सोमवार को संगम नगरी में भारी तनावपूर्ण स्थिति बनी रही, जहां महिलाओं ने भजन-कीर्तन के माध्यम से सरकार की ‘सद्बुद्धि’ के लिए प्रार्थना की, वहीं दूसरी ओर जिला आबकारी अधिकारी के.पी. सिंह द्वारा पूर्व प्रधान के साथ की गई कथित अभद्रता ने आग में घी डालने का काम किया है। आक्रोशित जनप्रतिनिधियों ने तहसीलदार के समक्ष अधिकारी को तत्काल निलंबित करने की मांग करते हुए थाने में तहरीर देकर मोर्चा खोल दिया है। Rudraprayag जनपद के बसुकेदार क्षेत्र के डुंगर गांव में महिला मंगल दल और ग्राम प्रधान की पहल पर गांव में शराबबंदी को लेकर सख्त निर्णय लिया गया है। आयोजित बैठक में सामाजिक कार्यक्रमों में शराब पर रोक लगाने का सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया। निर्णय के अनुसार शादी-विवाह, मुंडन, पितृ कार्य जैसे आयोजनों में शराब पीकर पहुंचने पर 11 हजार का जुर्माना लगेगा। अब देखिए, हो क्या रहा है। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में आबकारी विभाग ने राजस्व बढ़ाने के लक्ष्य के साथ एक बड़ा कदम उठाया है। इस वर्ष देसी और अंग्रेजी शराब की कुल 55 नई दुकानें खोलने की तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है। विभाग अब इन दुकानों के आवंटन के लिए लॉटरी प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में जुटा है।

प्रस्तावित योजना के अनुसार सबसे ज्यादा 23 दुकानें ऊधमसिंह नगर जिले में खोली जाएंगी। इसके अलावा पिथौरागढ़ में 14, नैनीताल में 8 और चम्पावत में 4 नई दुकानें शुरू की जाएंगी। दोस्तो सीमांत जिलों तक नेटवर्क विस्तार का यह कदम प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां अब तक कई क्षेत्रों में लाइसेंसी दुकानों की पहुंच सीमित रही है। हालांकि इससे विवाद की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है क्योंकि जनभावनाओं के प्रभावित होने से आक्रोश उमड़ सकता है। दोस्तो नई दुकानों के संचालन से सरकार को लगभग 60 से 65 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त राजस्व मिलने की संभावना जताई जा रही है। विभाग इसे वित्तीय लक्ष्य हासिल करने की दिशा में अहम पहल मान रहा है। अधिकारियों का कहना है कि दुकानों के लिए ऐसे स्थान चिन्हित किए जा रहे हैं जहां पार्किंग की पर्याप्त सुविधा हो, ताकि मुख्य सड़कों पर यातायात प्रभावित न हो। दोस्तो आबकारी विभाग के अनुसार सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद इन दुकानों का संचालन एक अप्रैल से शुरू किया जा सकता है। विभागीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सभी लाइसेंस आबकारी नियमों के तहत ही जारी किए जाएंगे। नई दुकानों को लेकर जहां विभागीय स्तर पर तैयारी तेज है, वहीं स्थानीय स्तर पर भी इसकी चर्चा शुरू हो गई है। कुछ क्षेत्रों में इसे रोजगार और सुविधा के रूप में देखा जा रहा है, तो कहीं सामाजिक प्रभाव को लेकर चिंता भी जताई जा रही है”तो दोस्तों, तस्वीर अब साफ है। एक तरफ गांव-गांव में महिलाएं शराब के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, विरोध कर रही हैं, शराबबंदी की मांग कर रही है। और दूसरी तरफ सिस्टम है कि नए ठेकों की तैयारी में जुटा हुआ है। सवाल यही है—क्या राजस्व ज्यादा जरूरी है या समाज की शांति और परिवारों की खुशहाली? क्या विकास का रास्ता शराब के सहारे ही तय होगा या फिर जनभावनाओं को भी उतनी ही अहमियत दी जाएगी? फिलहाल उत्तराखंड में ‘शराबी शोर’ जारी है देखना होगा कि इस शोर में सरकार जनता की आवाज सुनती है या नहीं।