देवभूमि उत्तराखंड के केदारनाथ धाम से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। बाबा केदार की पवित्र ‘रूप छड़’ अचानक गायब हो गई है! यही नहीं, इस मामले ने अब गैरसैंण तक घमासान मचा दिया है। बदरी केदार मंदिर समिति यानी BKTC ने इस पूरे प्रकरण पर चुप्पी साध रखी है, तो वहीं कांग्रेस ने सदन में सवाल उठाकर सरकार को घेरा है। Kedarnath Dham’s ‘Roop Chhad’ missing देखें, कैसे देवस्थली की इस पवित्र प्रतीक की गायब होने की खबर ने राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में हलचल मचा दी है। अब गैरसैंण में गदर हो रहा है। वैसे दोस्तो बड़ा अचंभा होता है, बड़ी हैरानी होती, दुनिया वाले भी क्या सोच रहे होगे ना, हमारी देवभूमिमऔर यहां से आस्था का एक प्रतिक चिन्ह गायब हो जाता है। चलिए आपको पूरी खबर बताउंगा और ये भी कि कितना महत्वपूर्ण है ये रुप छड़ और कहां गायब हो गई और अब तक क्यों नहीं मिली। दोस्तो अबने बाबा के धाम केदारनाथ धाम में अत्यधिक धार्मिक महत्व रखने वाली बाबा केदार की रूप छड़ अभी बदरी केदार मंदिर समिती (बीकेटीसी) के पास मौजूद नही है। इस लापरवाही को लेकर सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं। इस सबंध में मंदिर समिती ने चुप्पी साध रखी है। पंडा पुरोहितों का कहना है कि रूप छड़ एक तरह से बाबा केदारनाथ का ही स्वरुप है और इसको लेकर लापरवाही एक बड़ी बात है। हालांकि इसमें बीकेटीसी के तरफ से जारी एक पत्र के सामने आने के बाद मामला स्पष्ट हो गया है।
दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड में अपने चारों धाम, यहां की देव संस्कृति और देव परंपरा के लिए सनातन धर्म में विशेष स्थान रखते हैं। यहां की पौराणिक मान्यताएं और धार्मिक प्रतीक, चारों धामों की पूजा पद्धतियां पूरे भारत देश और सनातन धर्म के कर्मकांडों को लेकर पथ प्रदर्शक का काम करती हैं। ऐसा ही एक विशेष प्रतीक है केदारनाथ धाम में चल विग्रह डोली के साथ चलने वाला धर्म दंड का, जिसे स्थानीय भाषा में रूप छड़ भी कहा जाता है. इस धर्म दंड (रूप छड़) की केदारनाथ धाम में विशेष मान्यता है। जानकार और पंडा पुरोहित का कहना है कि बाबा केदारनाथ धाम के दर्शन करना या फिर इस धर्म दंड (रूप छड़) का दर्शन करना, दोनों एक बराबर पुण्य देते हैं। यानी केदार बाबा का यह धर्म दंड (रूप छड़) बाबा केदार का ही एक स्वरूप माना जाता है। दोस्तो केदारनाथ धाम में केवल धर्म दंड ही नहीं, इसके अलावा और भी कई ऐसी धार्मिक प्रतीक हैं, जिनकी पौराणिक मान्यता है। केदारनाथ और बदरीनाथ धाम में भगवान से जुड़े जो भी धार्मिक प्रतीक या फिर पूजनीय सामग्री है, इन्हें उसी भगवान या फिर उसी धाम की निजी संपत्ति माना गया है। हालांकि, पूजा और अनुष्ठान के दौरान परंपराओं के तहत रावल और अन्य पुजारी इन धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं. इन सभी धार्मिक प्रतीकों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी बदरी केदार मंदिर समिति की है. माना जाता है कि यह सभी धार्मिक प्रतीक भगवान की निजी संपत्ति हैं। इन्हें किसी दूसरी जगह पर अन्य किसी प्रयोजन के लिए नहीं ले जाया जा सकता है। अब सवाल ये है कि ये रुप छड़ कहा गई और, और खोजने के लिए क्या किया जा रहा है।
दोस्तो चलिए वैसे तो महाराज के दर्शन बड़े दुर्लभ हैंनऔर उनको मिल माना आसान नहीं है, ये मेरा नहीं लोगों का कहना है यहां मिले तो फिर बोलना भी पड़ा, लेकिन दोस्तो इससे इतर जहां एक जांच हो रही है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ने जबरदस्त तरीके से मोर्चा खोला है सरकार के खिलाफ और बीकेटीसी के खिलाफ। जी हां दोस्तो बड़ी बिकट परिस्थितिया है ना किसी को पता ही नहीं है कि ये रुप छड़ कहा गई। अब कांग्रेस वाले तो सवाल करेंगे ही, विधानसभा में नेता प्रतिक्षा तमाम मुद्दों को उठा रहे हैं तो रुप छड़ के गायब होने वाले पर बोले। इतना बड़ा दुसाहस किसने किया आस्था विश्वास के केंद्र में किसने विश्वासघात किया, क्यों किया सवाल तामम हो सकते हैं, लेकिन अब तक जांच चल ही रही है। जांच में क्या आएगा ये तो वक्त बताएगा, लेकिन दोस्तो हाल ही में केदारनाथ धाम का विशेष धार्मिक महत्व वाला धर्म दंड (रूप छड़) जब भंडार गृह में प्राप्त नहीं हुआ तो इसको लेकर हड़कंप मच गया। चांदी के इस बेशकीमती धर्म दंड (रूप छड़) को लेकर धर्मस्य विभागीय मंत्री सतपाल महाराज ने सख्त आपत्ति दर्ज की। उन्होंने कहा कि बीकेटीसी कि यह जिम्मेदारी है कि वह केदारनाथ धाम के सभी धार्मिक प्रतीकों को सुरक्षित अपने अपनी कस्टडी में रखें।
बदरी-केदार मंदिर समिति जिसकी जिम्मेदारी है कि वह अपने अधीन सभी मंदिरों की संपत्तियों को सुरक्षित अपने कब्जे में रखेगी, लेकिन केदारनाथ धाम के धर्म दंड के गायब होने के बाद जब हड़कंप मचा तो मालूम हुआ कि केदारनाथ धाम के मुख्य रावल भीमाशंकर लिंग द्वारा महाराष्ट्र के नांदेड़ में पट्टा अभिषेक रजत महोत्सव में प्रतिभाग किए जाने के क्रम में उनके द्वारा रूप छड़ को भेजा गया था। जिसकी अनुमति बदरी केदार मंदिर समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विजय थपलियाल ने 19 जनवरी 2026 को दी थी। तभी से रूप छड़ गायब है। जानकार कहते हैं कि यह रावल का एक निजी कार्यक्रम था इसमें भगवान केदारनाथ के प्रतीकों को ले जाने की अनुमति नहीं है। यही नहीं, साल 2000 का एक पत्र भी सामने आया जहां पर इसी तरह से रावल द्वारा भगवान केदारनाथ के बेशकीमती प्रतीक चिन्हों को दक्षिण भारत ले जाने की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन उस समय तत्कालीन मंदिर समिति प्रशासन द्वारा इस पर रोक लगा दी गई थीमनउस समय इस अनुमति को स्पष्ट तौर पर यह कहकर रद्द किया गया था कि एसी ना तो कोई परंपरा है और ना ही दस्तूर।