डर के साये में परिवार जी हां दोस्तो कोटद्वार में बाबा नाम के विवाद ने अब एक पूरे परिवार की ज़िंदगी उलट दी है जिस दीपक की दुकान के नाम पर बवाल मचा, आज वही दीपक नहीं, उसका पूरा परिवार डर के साये में जीने को मजबूर है। Uttarakhand Baba Shop Issue हालात ऐसे बन गए कि बेटी की पढ़ाई तक छूट गई, स्कूल जाना मुश्किल हो गया,घर से बाहर निकलना डर बन गया। सवाल ये है—क्या किसी विवाद की कीमत मासूम बच्चों को चुकानी चाहिए?क्या नाम के झगड़े में एक परिवार का सुकून छिन जाना जायज़ है?आज कोटद्वार में मामला सिर्फ विवाद का नहीं,डर, असुरक्षा और टूटते भरोसे का बन चुका है पूरी खबर मेरी इस रिपोर्ट में। कोटद्वार बाबा दुकान विवाद अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह मामला देशभर में चर्चाओं का विषय बन चुका है। 26 जनवरी को शुरू हुआ यह विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि अब इसका असर सीधे आम लोगों की ज़िंदगी पर पड़ने लगा है दोस्तो इस पूरे घटनाक्रम में दुकान स्वामी के पक्ष में खड़े हुए युवक दीपक की मुश्किलें भी लगातार बढ़ती जा रही हैं 31 जनवरी को बजरंग दल से जुड़े लोगों ने कोटद्वार पहुंचकर दीपक के खिलाफ नारेबाजी कर पूरे शहर का माहौल बिगाड़ दिया।
दीपक का कहना है कि उन्होंने कोई राजनीतिक या धार्मिक लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि एक इंसानियत का फर्ज निभाया। उन्होंने बताया कि 26 जनवरी को कुछ लोग एक बुजुर्ग दुकानदार पर दबाव बना रहे थे। ऐसे में उन्होंने एक सामान्य नागरिक की तरह आगे बढ़कर उस बुजुर्ग व्यक्ति को बचाने की कोशिश की, लेकिन यही कदम आज उनके और उनके परिवार के लिए भय का कारण बन गया है। इधर दोस्तो विवाद के बाद से दीपक और उनका परिवार डर के माहौल में जीने को मजबूर है। दीपक ने बताया बजरंग दल से जुड़े लोगों के भय के चलते घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया है। हालात इतने बिगड़ गए कि उनकी छोटी बेटी का स्कूल जाना भी बंद हो गया है। परिवार को हर समय किसी अनहोनी की आशंका सताती रहती है। दीपक का जिम, जो उनकी रोज़ी-रोटी का मुख्य साधन है, 26 जनवरी के बाद से बंद पड़ा था। आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव के बावजूद मंगलवार को उन्होंने साहस दिखाते हुए जिम दोबारा खोल दिया। दीपक का कहना है कि डर के आगे झुक जाना समाधान नहीं है, इसलिए उन्होंने सामान्य जीवन की ओर लौटने की कोशिश की है। दीपक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस दुकान का नाम पिछले 35 वर्षों से बिना किसी विवाद के चल रहा है, उसे अचानक बदलने की मांग समझ से परे है। उन्होंने कहा उस नाम से किसी भी समुदाय या व्यक्ति की भावनाएं आहत नहीं होतीं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर इतने वर्षों में कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, तो अब अचानक इसे मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? उन्होंने कहा वे लंबे समय से कोटद्वार में रह रहे हैं।
सामाजिक मुद्दों को लेकर हमेशा सक्रिय रहे हैं। जरूरतमंदों की मदद करना और गलत के खिलाफ आवाज़ उठाना उनकी आदत रही है। आज हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि बाहरी लोग कोटद्वार पहुंचकर माहौल खराब कर रहे हैं। जिससे शहर की शांति और सौहार्द पर भी असर पड़ रहा है। दीपक ने कहा विरोध और दबाव के कारण उनके परिवार में डर का माहौल जरूर है, लेकिन वे किसी भी कीमत पर इंसानियत और सच के रास्ते से पीछे नहीं हटेंगे। दोस्तो दीपक ने प्रशासन से भी मांग की कि आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। किसी को भी डर के साए में जीने के लिए मजबूर न किया जाए। यह मामला अब केवल एक दुकान के नाम का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि क्या इंसानियत के पक्ष में खड़े होना आज एक आम नागरिक के लिए खतरा बनता जा रहा है। कोटद्वार की यह घटना समाज के सामने सोचने का एक बड़ा सवाल छोड़ गई है.कोटद्वार बाबा विवाद के बाद दीपक इन दिनों चर्चाओं में है। राहुल गांधी समेत तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने दीपक की सराहना की है। आज मंगलवार को भीम आर्मी से जुड़े कार्यकर्ता भी दीपक से मिलने कोटद्वार जा रहे थे। इसी बीच चंडीघाट चौकी पर पुलिस ने भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं को रोक लिया। इसके बाद दोनों में काफी नोकझोंक हुई।
पुलिस ने कोटद्वार जाने की जिद पर अड़े भीम आर्मी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। कुछ देर बाद उन्हें रोशनाबाद ले जाकर छोड़ दिया। कोटद्वार में पिछले दिनों से एक दुकान में बाबा लिखने का मामला तुल पकड़ता जा रहा है। भीम आर्मी के प्रदेश अध्यक्ष महक सिंह अपने समर्थकों के साथ कोटद्वार में दीपक को समर्थन करने के लिए निकल रहे थे। तभी पुलिस ने उन्हें चंडी घाट चौकी पर रोक लिया। पहले तो काफी देर तक बातचीत चलती रही। पुलिस ने उन्हें समझाने का काफी प्रयास किया, लेकिन भीम आर्मी के पदाधिकारी कोटद्वार जाने की जिद पर अड़े रहे। दोस्तो, कोटद्वार की ये कहानी अब सिर्फ एक दुकान के नाम तक सीमित नहीं रही। ये कहानी है डर, दबाव और इंसानियत की कीमत चुकाने की। एक आम नागरिक, जिसने सिर्फ एक बुज़ुर्ग का साथ दिया, आज वही अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। बेटी की पढ़ाई छूट गई, घर में डर पसरा है और शहर की शांति पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल ये है— क्या इंसानियत के साथ खड़े होने की सज़ा डर में जीना है? क्या बाहरी दबाव के आगे एक शांत शहर को झुकना पड़ेगा? और क्या प्रशासन आम नागरिकों को यह भरोसा दिला पाएगा कि सच के साथ खड़े होने वाले अकेले नहीं छोड़े जाएंगे?