उत्तराखंड जहां वीरों की धरती है, लेकिन आज उसी धरती ने एक सवाल खड़ा कर दिया। देश के लिए शहीद हुए बेटे के अंतिम दर्शन के लिए बुजुर्ग मां-बाप को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, वजह सिर्फ एक—गांव तक सड़क नहीं थी तिरंगे में लिपटा शहीद का पार्थिव शरीर उस गांव तक नहीं पहुंच पाया, जहां उसने पहला कदम रखा था यहां रास्ता नहीं था, इसलिए दर्द ही रास्ता बना। दोस्तो बड़ी परेशानी होती है कभी कभी खबर बताने में वो तब जब प्रदेश में चर्चा इस बात पर चल रही हो कि उत्तराखंड के माननीय सासंद अपनी नीधि का पैसा दुसरे राज्यों में खर्च कर रहे हैं और मै ये खबर बताने के लिए मजबूर हूं कि, अपनी वीर भूमि में एक सड़क नहीं होने से एक जवान का पार्थिव शरीर उसके गांव उसके घर यानि उस मिट्टी तक नहीं पहुंच पाया जहां उसका जन्म हुआ था और ज्यादा परेशानी तब होती है। दोस्तो जब शहीद जवान के माता पिता अपने शहीद बेटे के अंतिन दर्शन के लिए पहले 4 किमी पैदल चलते हैं और फिर शायद 13-14 किमी वाहन से तब कहीं बेटे के अंतिम दर्शन पाते हैं। अब कुछ लोग कहेंगे भाई खबर बताते है क्या वो कहते हैं कब कहां कैसे कौन वैसे कुछ, लेकिन ये बताना भी एक खबर ही है आगे कि खबर देखिएग।
दोस्तो जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए उत्तराखंड के वीर सपूत हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया की शहादत ने पूरे देश को गर्व और गांव को गहरे शोक में डुबो दिया, लेकिन इस शहादत के साथ एक कड़वी हकीकत भी सामने आई—सड़क के अभाव में शहीद का पार्थिव शरीर उस गांव तक नहीं पहुंच सका, जहां उसने जन्म लिया था। बेटे के अंतिम दर्शन के लिए बुजुर्ग माता-पिता को चार किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक आना पड़ा। तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर कपकोट तक ही पहुंच पाया, जहां हजारों नम आंखों ने अपने लाल को अंतिम विदाई दी। कई लोग तो देख ही नहीं पाए क्योंकि पहुंच ही नहीं पाए। दोस्तो जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में बीते रविवार को आंतकियों और सेना के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी। आतंकियों के ग्रेनेड हमले में सेना के आठ जवान घायल हो गए थे, जिन्हें एयरलिफ्ट कर अस्पताल पहुंचाया गया था। उपचार के दौरान उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र के बीथी गांव निवासी पैरा ट्रूपर हवादार गजेंद्र सिंह गड़िया ने अंतिम सांस ली थी। इससे पूरे गांव में कोहराम मच गया था। मंगलवार को उनका शव पैतृक गांव बीथी लाया जाना था। गांव के लिए सड़क नहीं होने के कारण उनका शव कपकोट पहुंचाया गया था। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण शहीद उस मिट्टी से नहीं मिल पाया जिस पर उसने जन्म के बाद पहला कदम रखा था। कई रिश्तेदार और ग्रामीण वीर जवान के आखिरी दर्शन नहीं कर सके। सड़क के अभाव में बेटे के अंतिम दर्शन के लिए को बुजुर्ग माता-पिता को चार किमी पैदल चलकर कपकोट आना पड़ा। उनका शव कपकोट तक ही पहुंच पाया था।
गांव से उनकी मां चंद्रावती देवी और पिता धन सिंह करीब चार किमी पैदल चलकर सड़क तक पहुंचे। इसके बाद 13 किमी वाहन से कपकोट के डिग्री कॉलेज तक पहुंचे। वहां उन्होंने अपने लाल के अंतिम दर्शन किए। बेटे का शव देख मां-बाप बिलख उठे। गांव के अन्य पुरुष भी अपने लाल को कंधा देने को कपकोट पहुंच गए, पर गांव की कई लोग शहीद के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए। इधर, एसडीएम अनिल चन्याल के मुताबिक सेना के अधिकारियों और शहीद के पिता के टेलीफोनिक वार्ता के बाद डिग्री कॉलेज कपकोट का कार्यक्रम तय हुआ है। इसमें प्रशासन का कोई हस्तक्षेप नहीं था। दोस्तो तहसील क्षेत्र के बीथी पन्याती गांव निवासी शहीद हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर मंगलवार को हेलीकॉप्टर से डिग्री कॉलेज मैदान में लाया गया। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले जांबाज गजेंद्र के अंतिम दर्शन के लिए लोग बेताब थे। परिजनों को अंतिम दर्शन कराए गए। परिजनों की अश्रुपूरित विदाई के बाद शहीद की अंतिम यात्रा शुरू हुई। इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद रहे। जब तक सूरज चांद रहेगा, गजेंद्र तेरा नाम रहेगा, भारत माता की जय के उदघोष से कपकोट घाटी गूंज उठी। सरयू और खीरगंगा के संगम पर सैन्य सम्मान के साथ शहीद गजेंद्र की अंत्येष्टि की गई। शहीद गजेंद्र के पार्थिव शरीर का पहुंचाने में काफी देरी लग गई थी। मंगलवार की सुबह से ही क्षेत्र के लोग शहीद हवलदार गजेंद्र का पार्थिव शरीर आने का इंतजार कर रहे थे। 11 बजे से लोग डिग्री कॉलेज कपकोट के मैदान में जुटने शुरू हो गए। पहले पार्थिव शरीर को पैतृक गांव ले जाने का कार्यक्रम था। शहीद के पिता भी गांव में ही थे, लेकिन पार्थिव शरीर पहुंचने में विलंब के कारण इस कार्यक्रम में बदलाव कर दिया गया। माता-पिता को भी गांव से कपकोट ही बुला लिया गया। पत्नी और बच्चे पहले से ही यहां मौजूद थे। दोपहर करीब दो बजे हेलीकॉप्टर से शहीद का पार्थिव शरीर यहां लाया गया। लेकिन गांव तक नहीं पहुंच पाया, देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया को गांव नहीं मिला उनका अंतिम घर लेकिन उनके अदम्य साहस और बलिदान ने पूरे कपकोट घाटी को गर्व और श्रद्धा से भर दिया। आज भी उनके नाम की गूंज सरयू और खीरगंगा के संगम तक सुनाई देती है—यही है वीरों की अमरता, यही है उनके बलिदान की सच्ची विरासत।