देवी के दरबार में जल रही आस्था की अखंड ज्योति क्या दैवीय शक्ति टाल रही है संकट? जी हां दोस्तो उत्तराखंड की पवित्र घाटियों में नवरात्र की साधना अपने चरम पर है, लेकिन इस बार सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि आकाश में तैरते संकेत भी हैं। Maa Dhari Devi Mandir कत्यूरी राजाओं की धरोहर, प्राचीन पत्थरों में तराशी गई देवी की मूर्तियां, और उनके दरबार में हो रही विशेष पूजा—कहने को ये परंपरा है, लेकिन श्रद्धालु और पुजारी मानते हैं—ये साधना किसी अनजाने संकट से रक्षा के लिए हो रही है। दोस्तो क्या वास्तव में देवी खुद अपने भक्तों को आने वाले खतरे के प्रति चेतावनी दे रही हैं? या फिर यह सिर्फ एक संयोग है कि जिस समय पर्वतमालाओं में हलचल है, उसी समय मंदिरों में हो रही है विशेष आपदा निवारण पूजा? दोस्तो इस साल मानसून सीजन में भारी बारिश और बादल फटने की घटनाओं ने उत्तराखंड के जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। लोगों के आशियाने उजड़ गए तो कई लोगों ने अपनों को खो दिया। इस तरह की आपदाओं से सुरक्षा के लिए नवरात्रि के पावन पर्व पर चार धाम और राज्य की रक्षक कही जाने वाली मां धारी देवी में इस साल विशेष पूजन किया जा रहा हैदोस्तो शारदीय नवरात्रों के अवसर पर मां की शक्ति पीठों में भक्तों की भीड़ उमड़ना शुरू हो गई है। यहां नौ दिनों तक मां के विभिन्न स्वरूपों को पूजा जायेगा। इस बीच उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल स्थित प्रसिद्व सिद्वपीठ धारी देवी मंदिर में भी बड़ी संख्या में श्रद्वालु पहुंच रहे हैं। अलकनंदा नदी के बीचों बीच कत्यूरी शैली में निर्मित मां धारी देवी का नया मंदिर भव्य लग रहा है, जो अपने आप में एक आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।
दोस्तो उत्तराखंड के श्रीनगर में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित धारी देवी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, चेतना और चेतावनी का प्रतीक बनता जा रहा है। शक्तिस्वरूपा मां धारी देवी के बारे में मान्यता है कि वे दिन में तीन बार रूप बदलती हैं—सुबह बालिका, दिन में युवती, और शाम को वृद्धा के रूप में दर्शन देती हैं। यह स्वरूप केवल पौराणिक नहीं, बल्कि हर उस श्रद्धालु की अनुभूति में जीवित है जो नवरात्रि में इस शक्तिपीठ में पहुंचता है। मंदिर न्यास प्रबंधक पं. लक्ष्मी प्रसाद पांडेय के अनुसार, नवरात्रों के दौरान देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और मां के काली स्वरूप की आराधना कर अपने सुहाग और संतान की कुशलता के लिए मन्नत मांगते हैं लेकिन इस बार आरती की आवाजों के बीच एक और स्वर भी गूंज रहा है। पं. लक्ष्मी प्रसाद पांडेय का बयान केवल एक मंदिर प्रबंधक का नहीं, बल्कि एक गहरी चिंता का संकेत है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अलकनंदा नदी के आसपास अतिक्रमण बहुत बढ़ गया है, और हाल के दिनों में राज्य में चार स्थानों पर बादल फटने की घटनाएं हो चुकी हैं। दोस्तो ऐसे में, अगर भविष्य में कभी कोई और बादल फटता है या बांध टूटता है, तो अलकनंदा का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। इसका सीधा खतरा धारी देवी मंदिर को हो सकता है। दोस्तो ईश्वर न करे, लेकिन यदि ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होती है, तो मंदिर को भारी क्षति हो सकती है, कोई पहली बार नहीं है जब धारी देवी को लेकर सुरक्षा और चेतावनी की बात उठी हो। 2013 की केदारनाथ आपदा को लेकर आज भी क्षेत्र में यह मान्यता है कि जब धारी देवी की मूर्ति को अस्थायी रूप से स्थानांतरित किया गया था, उसी रात प्रदेश में भीषण जलप्रलय आई थी।
उस घटना ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया था। और तब से यह विश्वास और भी गहरा हुआ है कि मां धारी देवी सिर्फ एक प्रतिमा नहीं, बल्कि प्राकृतिक संतुलन की रक्षक हैं। इसके अलावा भी दोस्तो मंदिर समिति ने हालात की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर अपील की है कि मंदिर को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया पर विचार किया जाए। यह अपील सिर्फ मंदिर की भौतिक संरचना की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत और जन-विश्वास को बचाने के लिए भी है, जो मां धारी देवी के नाम से जुड़ा है। यहां एक सवाल भी है क्या यह देवी का संकेत है? नवरात्रों में जब मां तीन स्वरूपों में प्रकट होती हैं, तब सिर्फ आराधना नहीं होती—बल्कि कहीं न कहीं प्रकृति और चेतना के बीच संवाद भी होता है। क्या यह सिर्फ संयोग है कि जब राज्य में आपदाएं बढ़ रही हैं, ठीक उसी समय मंदिर समिति मां की सुरक्षा के लिए सरकार को पत्र लिख रही है?कई श्रद्धालु मानते हैं कि यह सिर्फ इंसानों की चिंता नहीं, बल्कि मां का इशारा है—कि कुछ बड़ा घटित हो सकता है, यदि समय रहते कदम न उठाए जाएं।
दोस्तो वैसे धारी देवी न केवल उत्तराखंड, बल्कि समूचे भारत की शक्तिस्वरूपा देवी हैं, जिनकी उपस्थिति भक्तों की चेतना में जीवंत रहती है। मंदिर समिति की अपील को केवल एक प्रशासनिक पत्र न मानकर, एक चेतावनी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि अलकनंदा के किनारे स्थित इस ऐतिहासिक शक्तिपीठ की सुरक्षा के लिए ठोस और दीर्घकालिक योजना बनाए—ताकि भविष्य में किसी भी प्राकृतिक आपदा से मां का धाम अछूता रहे। धारी देवी के भक्तों का विश्वास है—जब तक मां वहीं स्थित हैं, तब तक घाटी की रक्षा होती रहेगी। अब देखना यह है कि सरकार इस श्रद्धा और संकेत दोनों को कितनी गंभीरता से लेती है।