देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ सिर्फ खूबसूरत नहीं, बहादुर भी हैं…उत्तराखंड की मिट्टी में कुछ खास है…यहाँ की हवाओं में शौर्य की खुशबू…घाटियों में बलिदान की गूंज…और हर गाँव में राष्ट्रभक्ति की जड़ें गहराई तक फैली हैं। Judge Sudhanshu Dhulia नमस्कार मै हूं पंकज रौतेला…. स्वागत है आपका उत्तराखंड न्यूज में। ये तो सभी जानते हैं कि उत्तराखंड के युवाओं की पहली पसंद सेना रही है। और आज भी ये वो भूमि है। जहाँ बचपन से ही बच्चों को देश की सेवा। करना सिखाया जाता है। ऐसे में ये तो सभी जानते हैं कि हर चौथे घर में एक सैनिक आपको मिलजाएगा। लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि सेना के अलावा कई क्षेत्र हैं जहां उत्तराखंडियों ने झंडे गाड़े हैं या यू कहें कि अभी भी देश सेवा में जुटे हुए हैं। एसे में जब हम उत्तराखंड के बहादुर बेटों के देश की सेवा में योगदान कि बात कर रहे हैं तो एक नाम बहुत चर्चा में है। आजकल, वैसे ये मामला बिहार का है न्याय का है, लेकिन इस मामले में एक छोर ऐसा भी जिसका सीधा संबंध अपनी देवभूमि उत्तराखंड से है। आगे बताएंगे आपको देवभूमि के उस लाल के बारे में जिसकी पिढ़ियां खप गई देश सेवा में, लेकिन उससे पहले ये जान लीजिए।
उत्तराखंड ने अपने छोटे से आकार और पहाड़ी भूगोल के बावजूद भारत को देश के सर्वोच्च पदों पर कई महान सपूत दिए हैं। इन लोगों ने न केवल राज्य बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है। उत्तराखंड के कई जवान शौर्य चक्र, वीर चक्र, और परम वीर चक्र से सम्मानित हैं। उत्तराखंड, सेना भर्ती और रक्षा सेवा में सबसे ज्यादा भागीदारी देने वाले राज्यों में से एक है। चलिए अब बात करते हैं देवभूमि के उस सपूत कि जो देश के फलक पर मौजूदा वक्त में चमक रहा है, या यूं कहें कि चर्चा चारों ओर है, नाम है जज सुधांशु धूलिया, धूलिया शब्द से भी पता चलता है कि ये उत्तराखंड की पहाडियों में जन्मा सपूत है। जज सुधांसु धूलिया का जन्म कहां हुआ। पढाई लिखाई कहां हुई, और उनके परिवार के बारे में भी आपको बताएंगे, क्योंकि देशभक्ति की चमक उनके पारिवारिक विरासत में झलकती है। वो कैसे ये भी आगे बताएंगे लेकिन उससे पहले आपको बताते हैं कि जज सुधांशु धूलिया क्यों चर्चा में हैं और आपके लिए हमसब के लिए उत्तराखंड के लिए, क्यों गौरव की बात है….दरअसल जज सुधांशु धूलिया देश की सुप्रीम कोर्ट के जज हैं।
बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानि SIR के विरोध में दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। मालमे पर गठित उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ में जज सुधांशु धूलिया शामिल हैं, और दूसरे जज, जस्टिस जयमाला बागची हैं। इस बेंच ने विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए कम समयसीमा पर सवाल उठाया, साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि वह बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं मान रहा है? बता दें कि बिहार में अक्टूबर-नवंबर महीने में ही विधानसभा चुनाव हैं और चुनाव आयोग ने जून महीने में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने कम समय में निर्देशित दस्तावेज कोई कैसे जुटा पाएगा? तो ये मामला तो है हि इसके अलावा सुधांशु धूलिया ने कई अहम मामलों कि सुनवाई की है, इसलिए ये जानना और समझना जरूरी है कि सुधांशु धूलिया हैं कौन और उत्तराखंड से उनका क्या नाता है। 10 अगस्त 1960 को पौड़ी गढ़वाल के लैंसडाउन में जन्मे सुधांशु धूलिया के जीवन की शुरुआत यहीं की पहाड़ियों से हुई। उनका परिवार देश हित से जुड़ा रहा। सुधांशु धूलिया एक और पीढ़ी हैं जो देश कि सेवा क्षेत्र में हैं उनके दादा, पं. भैरव दत्त धूलिया, स्वतंत्रता सेनानी रहे।
आंदोलन के दौरान वो जेल गए और कर्मभूमि नामक पत्रिका संपादित की, पिता केशव चंद्र धूलिया इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे और माता संस्कृत की प्रोफेसर। ऐसा माहौल बचपन से ही जज सुधांशु धूलिया के अंदर न्याय और विद्या का बीजारोपण कर गया। सुधांशु जी की प्रारंभिक पढ़ाई देहरादून, इलाहाबाद और लखनऊ में रही, जहाँ स्कूल जीवन के दौरान उन्होंने मंचन, बहस और खेल में गहरी रुचि ली। 1981 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक, 1983 में आधुनिक इतिहास में मास्टर्स, और फिर 1986 में एलएल.बी सुधांशु जी ने 1986 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालतनामा शुरू किया…अब भले ही जज सुधांशु धूलिया की पढ़ाई इलाहाबाद विस्वद्याल से हुई और उन्होंने वकालत की शुरूआत भी इलाहाबाद हईकोर्ट से कि लेकिन नए राज्य उत्तराखंड के गठन के साथ—2000 में नयी शुरुआत—उन्होंने नैनीताल में वकालत शुरू की और बन गए राज्य के पहले चीफ स्टैंडिंग काउंसिल.. 2003 में स्टेट एडिशनल एडवोकेट जनरल, और 2004 में उन्हें सीनियर एडवोकेट की उपाधि मिली। 1 नवम्बर 2008 को उन्होंने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उच्च न्यायालय में आने के बाद, वे शिक्षा और विधिक अकादमी के प्रभारी भी बने। 13 वर्षों में उन्होंने 1,119 फ़ैसले लिखे और 1,415 बेंचों का हिस्सा रहे। 10 जनवरी 2021 को वे गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने, जहाँ उन्होंने 81 निर्णय और 110 बेंचों में भाग लिया। फिर 9 मई 2022 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया…. जहाँ वे अनुच्छेद 14, 21 और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक विषयों पर निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। 022 में उन्होंने कर्नाटक राज्य की हिजाब प्रतिबंध अधिसूचना को असंवैधानिक ठहराया।
पढ़ाई में हिजाब पहना जाना एक विकल्प और विश्वास की बात है। उनके इस दृष्टिकोण ने लैंगिक अभिव्यक्ति और धार्मिक अधिकारों को नई दिशा दी। और उत्तराखंड के लाल सुप्रीम कोर्ट की एक महत्वपूर्ण सुनवाई का हिस्सा हैं, साथ ही आपको ये भी बतातें चले कि जज सुधांशु धूलिया का 9 अगस्त 2025 को उनकी रिटायर्डमेंट निर्धारित है। रिटायर्डमेंट के बाद संभव है कि वे उत्तराखंड के शिक्षा, मानवाधिकार और सांस्कृतिक संस्थानों के साथ फिर जुड़ें। एक व्यक्ति जो पहाड़ों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक का सफर तय कर चुका है। उनके लिए उत्तराखंड में न्याय, शिक्षा और सामाजिक सेवा की यात्रा अभी खत्म नहीं होगी। जज सुधांशु धूलिया की कहानी केवल एक न्यायाधीश की सफलता नही। यह उत्तराखंड की संवैधानिक भावना, जनजीवन, न्याय की गहराई और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। पहाड़ी मिट्टी से लेकर सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियों तक, उनका सफर ये दर्शाता है कि जब जड़ें मजबूत हों, तो हर ऊँचाई पार की जा सकती है। उम्मीद है आपको यह स्टोरी पसंद आई होगी। अपने सुझाव कमेंट कर दे सकते हैं। साथ लाईक और शेयर करना ना भूलें। जय उत्तराखंड