मसूरी की वो खौफनाक रात ! | Rampur Tiraha Case | Uttarakhand News | Masoori Golikand

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जी हां दगड़ियो उत्तराखंड आंदोलन पर जब चली थी सत्ता की बंदूक, हक मांग रहे लोगों को मिली ‘गोलियां’ मसूरी की वो खौफनाक रात। दगड़ियो बताने आया हूं उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे काले और खौफनाक चेहरे के बारे में मसूरी गोलीकांड के बारे में। 31th Anniversary Of Mussoorie Firing Incident दगड़ियो जरा याद करिएगा वो तारीख 2 सितंबर की ही थी। जब निहत्थे आंदोलनकारियों पर बरसी थीं गोलियां — लोकतंत्र की चीत्कार बन गई थी वो रात, सरकार की बर्बरता ने हक मांगती आवाज़ों को खून से लथपथ कर दिया। दगड़ियो मसूरी गोलीकांड की 31वीं बरसी पर उत्तराखंड आंदोलन की काली छाया और अधूरे सपनों की कहानी बताने जा रहा हूं, 2 सितंबर 1994 का दिन उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। दगडड़ियो मसूरी की शांतिपूर्ण वादियों में उस दिन निहत्थे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाकर छह लोगों की जान ले ली। इनमें दो महिलाएं भी शामिल थीं। यह गोलीकांड केवल एक हिंसात्मक घटना नहीं थी, बल्कि यह उत्तराखंड आंदोलन के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जिसने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया। दोस्तो अभी आप लोगों ने डॉ.हरक सिंह रावत को खूब सूना होगा कई कई दिनों से वो अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं उनके बयानों में मुख्य तौर पर आपने दो नाम सुने होंगे जिन नामों को लेते हुए वो कह रहे हैं कि उनकी आत्मा भी आज रो रही होगी। शायद आप लोगों ने ध्यान नहीं दिया होगा, दगड़ियो मै जिस मसूरी गोलिकांडक का जिक्र कर रहा हूं, वो दोनों महिलाएँ इसी गोलिकांड में शहीद हुई थी।

आगे मैं आपको उनके बारे में बताउंगा, उनके नाम पते सब कुछ और साथ ही और भी कई लोगों ने अपनी जान मसूरी गोलीकांड में गवाई थी वो भी बताउंगा। दगड़ियो राज्य आंदोलन की शुरुआत और संघर्ष की लंबी राह रही है। ये आप जातने होंगे जो नहीं जानते उनको मैं बताने जा रहा हूं, खास कर वो युवा पीड़ी जिसने बना हुआ उत्तराखंड देखा। दोस्तो उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग अचानक नहीं उठी थी, कहा जाता है कि इसकी नींव 1938 में गढ़वाल के श्रीनगर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के दौरान पड़ी थी, जब पहली बार पहाड़ के लिए अलग राज्य की आवश्यकता पर चर्चा हुई। इसके बाद कई दशक तक यह मांग धीरे-धीरे उभरती रही, लेकिन असली जन आंदोलन 1990 के दशक में तब तेज़ी से बढ़ा जब पहाड़ों की उपेक्षा, बेरोजगारी, पलायन और विकास की कमी ने जन मानस को उबाल दिया। दगड़ियो यहां मै आपको बता दूं कि 1 सितंबर 1994 को खटीमा में पुलिस की गोलीबारी में 7 आंदोलनकारी शहीद हुए। ये घटना पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया, अगले ही दिन, यानी 2 सितंबर को मसूरी में हुई शांतिपूर्ण रैली के दौरान पुलिस ने अचानक अंधाधुंध गोलियां चला दीं, जिससे 6 आंदोलनकारी शहीद हो गए। यह गोलीकांड आंदोलनकारियों के लिए एक गहरा सदमा था, लेकिन इसने उनके संकल्प को नहीं तोड़ा और दगड़ियो उत्तराखंड के उत्तराखंड बनने की ये कहानी है इसलिए थोड़ा ध्यान से देखिएगा और समझिएगा भी। दगड़ियों शहीदों की यादें आज बस यादों में ही रह गई हैं और उनका बलिदान हमेशा-हमेशा याद किया जाएगा।

उत्तराखंड को बनाने में जिन लोगों ने अनपा सब कुछ गवां दिया उनको भी सलाम किया जाएगा। कुछ नाम मै आपको बताने जा रहा हूं इसमें से दो नाम आपने हालही में हरक सिंह रावत कांग्रेस के नेता के मुंह से सुने होंगे। वो नाम हैं बेलमती चौहान और हंसा धनाई, ये वो दो महिलाएं हैं जिंन्हों ने मसूरी लोगी कांड में अपनी जान गवाई। इसके अलावा मदन मोहन ममगाईं, बलवीर नेगी, धनपत सिंह, और राय सिंह बंगारी—ये वे छह शहीद थे, जिन्होंने अपनी जान की कीमत पर पहाड़ों के लोगों के सपनों को आवाज़ दी दगड़ियो। इनमें दो महिलाएं भी थीं, जो इस आंदोलन की संवेदनशीलता और व्यापक जन समर्थन को दर्शाती हैं। जिनके बारे में मैने आपको सबसे पहले बताया साथ ही दोस्तो मै आपको ये भी बता दूं कि इस गोलीकांड में एक पुलिस अधिकारी भी शहीद हुआ था, लेकिन यह घटना आंदोलनकारियों की जंग को रोक न सकी। पूरे उत्तराखंड में विरोध और गुस्से का माहौल था, जिसने आंदोलन को और प्रबल कर दिया। अब आता हूं राज्य गठन और अधूरे सपनों की हकीकत पर दोस्तो आपको क्या लगता है आंदोलनकारियों ने जो सपने देखे थे वो पूरे हो गए। उत्तराखंड बनने के साथ ही नहीं ऐसा नहीं है जिस मकसद से आंदोलन हुआ लोगों ने जान गवाई वो मकसद शायद अभी पूरा नहीं हुआ है कब तक होगा ये भी पता नहीं आगे वक्त मिलेगा तो बताउंगा तब की मांग और आज की तक्वीर के बारे में लेकिन उससे पहले ये 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, लेकिन आंदोलनकारियों का मानना है कि वे सपने अब भी अधूरे हैं।

वे कहते हैं कि जब राज्य बनेगा, तो पलायन रुकेगा, बेरोजगारी घटेगी, और पर्वतीय क्षेत्रों का विकास होगा। लेकिन बीते 25 वर्षों में ऐसा नहीं हो पाया। वैसे दगड़ियो आज भी पहाड़ों में युवा रोजगार के लिए मैदानी इलाक़ों की ओर पलायन कर रहे हैं। गांव खाली हो रहे हैं और खेती-बाड़ी टूट रही है। राज्य सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं जैसे आंदोलनकारियों के लिए पेंशन योजना और नौकरियों में आरक्षण, लेकिन इसमें बहुत असमानताएं और तकनीकी समस्याएं हैं। कई आंदोलनकारी अभी तक औपचारिक सूची में नहीं आ पाए हैं, जिससे उन्हें इन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा इसके अलावा एक और बात है जिस पर बात होनी चाहिए। क्योकी आंदोलनकारी कहते हैं कि वे अपनी कुर्बानी को राजनीतिक मुनाफे में बदलते हुए देख रहे हैं। कई बुजुर्ग पेंशन से वंचित हैं, कई को सीबीआई जांच का सामना करना पड़ा, और कुछ अभी भी चल रहे केसों की वजह से परेशान हैं। वे आरोप लगाते हैं कि सरकारें केवल प्रतीकात्मक राजनीति करती रही हैं और असली मुद्दों जैसे महंगाई, बेरोजगारी, और विकास से ध्यान भटकाने के लिए हंगामा कर रही हैं। आंदोलनकारियों का यह भी कहना है कि खनन माफिया और भू-माफिया के कारण जंगल और जमीन तेजी से खत्म हो रही है। उन्होंने कहा, “हमने अपने खून से इस राज्य को सींचा है, लेकिन अब यहां केवल कारोबार हो रहा है, सेवा नहीं। दगड़ियो शायद वीडियो थोड़ा लंबी हो जाय लेकिन जानकारी तो छूटनी नहीं चाहिएना वैसे जब मसूरी में आंदोलन हो रहा था। उस दौरान मसूरी का हर व्यक्ति था आंदोलनकारी था राज्य आंदोलनकारी बताते हैं कि पूरा शहर और हर व्यक्ति आंदोलन से जुड़ा था वे कहते हैं कि उस दिन का मंजर याद करते हुए आज भी रूह कांप जाती है। हर घर में एक आवाज़ थी — उत्तराखंड को अलग राज्य बनाना है।

दगड़ियो हर साल 2 सितंबर को मसूरी में शहीदों को याद किया जाता है, फूल चढ़ाए जाते हैं और भाषण होते हैं लेकिन आंदोलनकारी इसे प्रतीकात्मक राजनीति कहते हैं। वे चाहते हैं कि सरकारें केवल याद न करें, बल्कि उनके लिए काम करें वे सवाल करते हैं—क्या सिर्फ राज्य बनाना ही काफी था? क्या उत्तराखंड केवल एक प्रशासनिक इकाई रह गया है, या एक संवेदनशील विकास मॉडल?एक और बात दग़ड़ियोो आज 31 साल बाद वाला सवाल मसूरी गोलीकांड की 31वीं बरसी पर ये सवाल और भी तेज हो गए हैं क्या आंदोलनकारियों को न्याय मिला? क्या राज्य उनके सपनों जैसा विकसित हो पाया? क्या पहाड़ों की पीड़ा कम हुई? जवाब है—अभी बहुत कुछ अधूरा है। उत्तराखंड की सरकारों को चाहिए कि वे केवल जुमलेबाजी छोड़कर सच्चे विकास, रोजगार और न्याय के लिए ठोस कदम उठाएं। तभी मसूरी गोलीकांड के शहीदों का बलिदान सार्थक होगा, मसूरी क्या पूरे प्रदेश में खूब आंदोलन हुए बहुत लोगों ने अपनी जान गवाई उन सब को याद किया जाना चाहिए, लेकिन दगड़ियो मसूरी गोलीकांड सिर्फ एक गोलीबारी नहीं थी, बल्कि एक जनसंघर्ष की आखिरी लड़ाई थी। आज भी वह संघर्ष जारी है, और वह आवाज़ अब भी बुलंद है—उत्तराखंड के लिए न्याय, सम्मान और विकास की आज मसूरी गोलीकांड की 31वीं बरसी है। 2 सितंबर 1994 को उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा मचाए गए कोहराम के बारे में सुनकर आज भी लोग सिहर जाते हैं। मसूरी में आज से ठीक 30 साल पहले, उत्तराखंड आंदोलन की मांग कर रहे निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर मसूरी की शांत वादियों में पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। इस भीषण गोलीकांड में 6 राज्य आंदोलनकारी शहीद हो गए थे। इनमें दो महिलाएं भी शामिल थीं।