उत्तराखंड में शुरू हुई CM बनने की जंग?| BJP Infighting | Uttarakhand News | CM Dhami | Arvind Pandey

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उत्तराखंड चुनाव से ठीक पहले, सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ी घेराबंदी शुरू हो चुकी है! धामी सरकार पर सवाल अब विपक्ष नहीं, अपने ही लोग दाग रहे हैं!जो कल तक साथ खड़े थे, आज वही मोर्चा खोल चुके हैं। सवाल ये नहीं कि सरकार पर हमला क्यों हो रहा है, सवाल ये है कि हमला अंदर से क्यों हो रहा है? क्या ये सिर्फ़ नाराज़गी है, या फिर उत्तराखंड में सीएम बनने की खुली जंग शुरू हो चुकी है? कुर्सी की इस लड़ाई में कौन किसके साथ है और कौन किसे किनारे लगाने की तैयारी में है— सत्ता, संगठन और सियासत की इस टक्कर में सरकार की उस घेराबंदी की पूरी कहानी जो चुनाव से पहले पूरे सियासी समीकरण बदल सकती है। उत्तराखंड बीजेपी में गहरी खाई त्रिवेंद्र, बलूनी और अन्य नेता अरविंद पांडे से मिलने को तैयार हुए या फिर सररकार के खिलाफ जाने को तैयार हैं। ये इसलिए क्योंकि बीते कुछ वक्त की तस्वीरें ये बता रही हैं कि उत्तराखंड की सियासत में एक अलग-अलग तरह की आग बीजेपी के अंदर धीरे-धेरे सुलग रही है। दोस्तो कई बार ऐसा लगा की बीजेपी के तमाम विधायक सांसद, पूर्व मंत्री, प्रदेश की मौजूदा बीजेपी की सरकार को इशारों ही इशारों में नीचा दिखाने और बड़ा संकेत देते दिखाई दिए हैं, लेकिन इन सब के बीच की क्या उत्तराखंड में सीएम बदलने की परीपाठी जो पिछले कुछ वक्त से चल रही है। उसके लिए ये सब हो रहा है, क्या कोई सीधे सीएम धामी की सरकार को चुनौती दे रहा है। क्या कोई सीएम धामी पर खुद बैठना चाहता है वो चुनाव से पहले, क्या उसी की कसरत चल रही है। क्या उसी के लिए लांबबंदी गोलबंदी हो रही है।

दोस्तो गदरपुर से बीजेपी विधायक का तो मंत्री से ऊपर मुख्यमंत्री का सपना नहीं लगता जो बार-बार कई मसलों पर बीजेपी की लाइन से अलग थलग चल रहे हैं। जो सरकार के काम या फिर रवैये से संतुष्ट नहीं दिखाई देते हैं, लेकिन इतना तो तय है कि वो मुख्यमंत्री की रेस में नहीं है तो फिर क्या वो नाम जो आगे वाले हैं। वो इस कतार में सबसे आगे घड़े हैं, बताउंगा आपको वो एक एक नाम भी लेकिन उससे पहले एक और बात यहां जो प्रदेश की मौजूदा सरकार को डैंट देने वाली है वो ये खैमेबंदी, वो कैसे वो समझिए। दोस्तो बीजेपी की मौजूदा स्थिति को देखें तो ज्यादातर विधायक गढवाल से आते हैं और गढवाल वाले क्षेत्रों में बीजेपी के तमाम नेताओं विधायकों के खिलाफ एक अलग तरफ की धारणा चल रहा है और ये नेता के खिलाफ वाला माहौल तब गर्माता दिखाई दिया। जब अंकिता भंडारी केस में कथित वीआईपी का नाम का जिक्र हुआ, तब बीजेपी वालों को जनता ने घेरना शुरू कर दिया। बीजेपी के मौजूदा विधायकों से इस मामले पर सवाल किया जाने लगा, लेकिन जवाब जनता को संतुष्ट करने वाला नहीं था। ऐसे मै जो तस्वीर अभी बीजेपी के अंदर के तुफान को बता रही है, वो देखिए कैसे गढवाल छोड़ बीजेपी का एक धड़ा कुमाउं के नाराज विधायकों बीजेपी के बड़े नेताओं को लाबंद कर करने में जुट चुके हैं इसे तोड़ा ऐसे समझिए। उत्तराखंड की सियासत इन दिनों बेहद सक्रिय और संवेदनशील मोड़ पर है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के उत्तराखंड दौरे के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की गतिविधियाँ राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रही हैं। इस समय का सबसे चर्चित मामला है—पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र रावत, गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी, हरिद्वार विधायक मदन कौशिक और बिशन सिंह चुफाल का अरविंद पांडे से मिलने का कार्यक्रम, वो मिले नहीं मिले वो अलग बात है लेकिन ऐसा क्या हूआ कि अरविंद पांडे के दर्द में परेशानी में शामिल होने की होड़ मच गई।

ऐसे में दोस्तो वो सवाल क्या नए सीएम को लेकर पिच तैयार की जा रही है। धामी नहीं तो फिर कौन ये सवाल सभी के जहन में आएगा। बीजेपी वालों के अंदर से आवाज दबी-दबी सी आ रही है, अरविंद पांडे के साथ अपनी हमदर्दी जोड़ एक तो ये जो नाम सबके सामने आज नहीं इससे पहले भी आते रहे हैं। वो पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रात का हो या अनिल बलूनी का क्या इन दोनों में से कोई एक अगला प्रदेश के मुख्यमंत्री होगा, वो इसलिए क्योंकि अनिल बलूनी की केन्द्री भूमिका बीड़ी बीजेपी में दिखिई दी है। इस मुलाकात को लेकर सियासी गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। एक पहलू यह है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता अरविंद पांडे को मनाने या पार्टी संगठन के साथ सुलह कराकर किसी भी तरह की टूट को रोकने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। अरविंद पांडे की नाराजगी और धामी सरकार के प्रति असहमति पिछले कुछ महीनों से लगातार सुर्खियों में रही है। उन्होंने कई मौकों पर सीबीआई जांच की मांग की, भूमि विवाद के आरोपों पर अपनी बात रखी और पार्टी की अंदरूनी रणनीति पर सवाल उठाए दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषक इसे धामी सरकार की घेराबंदी के रूप में भी देख रहे हैं। उत्तराखंड भाजपा में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों खंडों में बड़े नेता धामी सरकार के खिलाफ सक्रियता दिखा रहे हैं। त्रिवेंद्र रावत और अनिल बलूनी के नेतृत्व में एक गुट धीरे-धीरे संगठन में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। इस मुलाकात के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या इस गुट के प्रयास से नाराज विधायकों को अपने साथ जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे। भाजपा के भीतर की इस हलचल के बीच यह सवाल भी अहम बनता जा रहा है कि क्या अरविंद पांडे इस सुलह में शामिल होंगे या नहीं। पांडे का विरोध केवल व्यक्तिगत नाराजगी तक सीमित नहीं है; उनका प्रभाव कुमाऊं क्षेत्र के कई विधायकों तक फैला हुआ है। ऐसे में अगर वह गुट के पक्ष में खड़े होते हैं, तो यह धामी सरकार के लिए एक चुनौती बन सकता है। इस मुलाकात का राजनीतिक महत्व सिर्फ पार्टी संगठन के भीतर सीमित नहीं है। इससे आगामी चुनावी रणनीति और सत्ता समीकरण पर भी असर पड़ेगा। अगर वरिष्ठ नेता पांडे को मनाने में सफल रहते हैं, तो पार्टी एकजुट दिख सकती है। वहीं, यदि पांडे गुट के पक्ष में मजबूती से खड़े होते हैं, तो भाजपा की अंदरूनी खाई और गहरी हो सकती है। संक्षेप में कहा जाए, तो उत्तराखंड भाजपा की सियासत इन दिनों न केवल धामी सरकार के चारों ओर हलचल पैदा कर रही है, बल्कि यह साफ संकेत भी दे रही है कि चुनाव और संगठन के दबाव में बड़े नेता अब सक्रिय हो चुके हैं। आने वाले दिनों में उधम सिंह नगर में हुई इस मुलाकात का असर सिर्फ पांडे और उनके समर्थकों पर नहीं, बल्कि पूरे राज्य की सियासी तस्वीर पर पड़ने वाला है।