Uttarakhand कांग्रेस में संतुलन या नया संघर्ष? | Uttarakhand News

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दोस्तों, उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों कुछ अलग ही माहौल में दिख रही है। राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि यह “तूफान से पहले की खामोशी” है। ऐसे में सभी की निगाहें एक अनुभवी नेता पर टिकी हैं—हरीश रावत। करीब छह दशक से कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा रहे हरीश रावत की अगली चाल पूरे सियासी समीकरण को बदल सकती है। क्या पार्टी उनके अनुभव को मानते हुए संतुलन बनाएगी, या नए समीकरणों के साथ जोखिम उठाएगी? इस राजनीतिक सस्पेंस और आने वाले फैसलों की पूरी कहानी। दोस्तो उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी है, लेकिन यह खामोशी सामान्य नहीं मानी जा रही। राजनीतिक गलियारों में इसे “तूफान से पहले की शांति” कहा जा रहा है। इस खामोशी के केंद्र में हैं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता , जिनकी सक्रियता भले ही कम दिखाई दे रही हो, लेकिन उनके इर्द-गिर्द सियासी हलचल तेज हो चुकी है। दोस्तो करीब छह दशक से कांग्रेस की राजनीति का अहम हिस्सा रहे हरीश रावत ने ग्राम स्तर से लेकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक का लंबा सफर तय किया है। संगठन और सरकार दोनों में उनकी गहरी पकड़ रही है। यही कारण है कि आज भी उन्हें उत्तराखंड की राजनीति का सबसे अनुभवी और प्रभावशाली चेहरा माना जाता है, लेकिन क्या वो मौजूदगा वक्त में अपनी ही पार्टी से अपने ही नेताओँ से नाराज हैं। इस बात का आधार ये वाला बयान बन रहा है। जी हां दोस्तो मै संजय नेगी की बात करूं तो ऊससे पहले बात पूरी तरह से हरीश रावत की होनी चाहिए। बकौल संजय नेगी की उनकी भी कांग्रेस में ज्वनिंग होने वाली थी। लेकिन कांग्रेस नेताओं ने नहीं होने दिया तो हरीश रावत नाराज हो गए और राजनीतिक उपवास पर चले गए।

अगर दोस्तो ये सच है तो फिर कांग्रेस के लिए आगे डकर बेहद चुनौती पूर्ण होने वाली है। क्या हरीश रावत की नाराजगी के साथ कांग्रेस वापस सत्ता में आ सकती है। लेकिन दोस्तो मौजूदा वक्त में पार्टी के भीतर उनकी भूमिका पहले जैसी सक्रिय नहीं दिखती निर्णय प्रक्रिया से उन्हें कुछ हद तक अलग-थलग किया गया है और उनकी राय को वह महत्व नहीं मिल रहा, जिसकी अपेक्षा एक वरिष्ठ नेता के तौर पर की जाती है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरीश रावत जैसे नेता को नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है। दोस्तो इसी बीच रामनगर से उभरते युवा नेता को लेकर सियासत गर्म है, जिसका नाम मेने इससे पहले लियया संजय नेगी। दोस्तो पिछले विधानसभा चुनाव में 17 हजार से अधिक मत हासिल कर उन्होंने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। कांग्रेस पृष्ठभूमि से जुड़े रहने के बावजूद उन्होंने कभी पार्टी के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी नहीं की, जिससे उनकी स्वीकार्यता और बढ़ी है। खबरें बता रही हैं कि हरीश रावत संजय नेगी को कांग्रेस में शामिल कराने के लिए प्रयासरत हैं। इसे केवल एक सामान्य राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन इस राह में एक बड़ी चुनौती भी है- रामनगर की राजनीति में और संजय नेगी और रंजीत रावत के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेद, लेकिन इस पर रणजीत रावत का बयान भी आया है।

दोसतो अब राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी संतुलन साध ले और रंजीत रावत को सल्ट तथा संजय नेगी को रामनगर से अवसर दे, तो कुमाऊं क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति मजबूत हो सकती है। लेकिन इसके लिए आंतरिक मतभेदों को सुलझाना आवश्यक होगा। वर्तमान परिदृश्य में हरीश रावत का रुख बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। संजय नेगी के मुद्दे पर उनका अडिग रहना यह संकेत देता है कि वे इस बार किसी समझौते के मूड में नहीं हैं। राजनीतिक भाषा में इसे “अंगद का पैर” कहा जा रहा है—जिसे हिलाना आसान नहीं होगा। अब सवाल यह है कि कांग्रेस नेतृत्व क्या निर्णय लेता है। क्या पार्टी अपने अनुभवी नेता की बात मानकर संगठनात्मक संतुलन बनाएगी, या फिर नए समीकरणों के साथ आगे बढ़ने का जोखिम उठाएगी? स्पष्ट है कि हरीश रावत की खामोशी को कमजोरी नहीं माना जा सकता। यह उनके अनुभव का हिस्सा है, जहां वे सही समय का इंतजार करते हैं और फिर निर्णायक चाल चलते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में आने वाले समय में बदलाव की पूरी संभावना है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि हरीश रावत की अगली चाल क्या होगी—क्योंकि अक्सर उनकी एक चाल पूरे सियासी समीकरण बदलने की क्षमता रखती है। थंबनेल क्या हो गया।