उत्तराखंड में लौट आई 2013 की काली रात! फिर दहला बसुकेदार, मलबे में दबी जिंदगियां। दगड़ियों रूद्रप्रयाग के बसुकेदार में टूटा कहर, मलबे में दबीं सैकड़ों साँसें। Cloud Burst in Rudraprayag छेनागाड़ में आई कयामत की रात,ऐसा लगा कि महादेव भी न रोक सके तबाही को आने से धरती फटी, मंदिर गिरा, उम्मीदें थम गईं और बसुकेदार फिर रो पड़ा। दोस्तो ये कुदरत की गूंज या किसी अनहोनी की दस्तक है बसुकेदार में फिर आज मात तस्वीरें तबाही की हैं और तबाही के बाद का अंदाजा आप खुद ब खुद लगा सकते हैं। दगडियों आज यहां मलबे में दबी पूजा, आस्था, और जिंदगियां हैं, बसुकेदार बना श्मशान है थोड़ा याद कीजिए 2013 की उस आपदा को जहां महादेव के आगन से कई लोग सीथे बैंकुंठ पहंच गये थे वो रात फिर लौट आई। जब पहाड़ ने निगल लीं थी बहुत सी साँसें, छेनागाड़ की तबाही में दिखाई दी 2013 की परछाईं तबाही की कहानी फिर दोहराई गई, जब महादेव का घर ही टूट गया तो दगड़ियो छेनागाड़ में क्या बचा? बताने के लिए आया हूं आपको। खबर संवेदनाओं से भरी है।
दगड़ियो रुद्रप्रयाग के छेनागाड़ में तबाही: 2013 के केदारनाथ त्रासदी की याद दिलाती भयंकर आपदा। उत्तराखंड की पहाड़ों की गोद में बसे रुद्रप्रयाग जिले का छेनागाड़ क्षेत्र एक बार फिर आपदा के खतरनाक गढ़ में बदल गया। पिछले कुछ वर्षों में कई बार प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आने वाला यह क्षेत्र, शुक्रवार तड़के तीन बजे बादल फटने की भीषण घटना का साक्षी बना। मूसलाधार बारिश और अचानक आई भारी जलधारा ने बसुकेदार के छोटे से बाजार को मलबे की चपेट में ले लिया। इस विनाशकारी आपदा ने न केवल यहाँ के लोगों की जिंदगी तबाह कर दी, बल्कि 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी की काली छाया को भी ताजा कर दिया। जैसे ही सुबह का अंधेरा छटा, जोरदार गर्जना के साथ पानी की तबाही ने पूरे इलाके को अपनी गिरफ्त में ले लिया। घाटी के संकरे रास्तों पर बहती तेज धाराओं ने सड़कें, मकान, दुकाने और हर वो चीज निगल ली जो उनके रास्ते में आई। बसुकेदार के बाजार में 18 भवन पूरी तरह ध्वस्त हो गए, आठ लोग लापता हुए और दर्जनों परिवार बेघर हो गए।
स्थानीय लोग अब भी सदमे की हालत में हैं, कई ने अपनी जान बचाने के लिए मलबे के बीच से भागकर किसी तरह अपने बचाव की कहानी सुनाई। ग्रामीणों की ज़ुबानी आपदा की वो घबराहट और भय की झलक साफ दिखती है। “रात तीन बजे जैसे पत्थर आपस में टकरा रहे थे, मकान हिल रहे थे, बाहर निकलना नामुमकिन था। पानी तेज बह रहा था, सड़कें डूब गईं और आवाजाही ठप्प हो गई,” ऐसा कहते हुए कई लोगों की आवाज़ कांप उठी। कुछ अभी भी अपने रिश्तेदारों या सुरक्षित स्थानों में शरण लिए हुए हैं, अपने टूटे हुए घरों और खोई हुई जिन्दगी को सोचकर। दगड़ियों छेनागाड़ की ये तबाही 2013 के केदारनाथ आपदा की यादों को फिर से जागृत कर रही है। उस वर्ष उत्तराखंड में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने हजारों लोगों की जान ले ली थी और कई इलाकों को तबाह कर दिया था। उस त्रासदी की भयावहता आज भी इस क्षेत्र की मिट्टी में गूंजती है।
अब जब छेनागाड़ में फिर से ऐसी ही तबाही आई है, तो लोगों के दिलों में वही डर, वही बेचैनी और वही दर्द उमड़ रहा है। केदारनाथ आपदा ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था, और ऐसा लग रहा है कि प्रकृति की माया फिर से अपनी क्रूर छटा दिखा रही है… छेनागाड़ की तबाही ने एक बार फिर प्रशासन और सरकार की आपदा प्रबंधन और पूर्व तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिंदेश्वर महादेव मंदिर का मलबे में दब जाना—आस्था पर बड़ा आघात दगडियो छेनागाड़ आपदा की सबसे दुखद घटना है प्रसिद्ध बिंदेश्वर महादेव मंदिर का मलबे में दफन हो जाना यह मंदिर न केवल क्षेत्रवासियों की आस्था का केन्द्र था, बल्कि महाशिवरात्रि जैसे पर्वों पर हजारों श्रद्धालुओं का आकर्षण भी रहा। मंदिर का गेट तो मलबे के ऊपर बचा हुआ है, लेकिन पूरा मंदिर अब मलबे की चादर तले दबा हुआ है। स्थानीय लोग इसे एक अशुभ संकेत मान रहे हैं। उनका मानना है कि महादेव को ही यह क्षेत्र का रक्षक माना जाता था, और जब उसका मंदिर मलबे में दब जाता है तो इसका मतलब है कि प्राकृतिक आपदा की तीव्रता के सामने मानव आस्था भी कमजोर पड़ गई, ये न केवल एक धार्मिक स्थल का विनाश है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और समाज पर एक गहरा झटका भी है।
बिंदेश्वर महादेव का मंदिर, जो सदियों से लोगों के विश्वास का प्रतीक रहा, अब मलबे के नीचे दबा हुआ इतिहास बन गया है। यह आपदा के प्रभाव को और भी संवेदनशील और मनुष्य को प्रकृति के प्रति अपनी नाजुक स्थिति का अहसास कराता है। दगड़ियो बार-बार आती ऐसी आपदाएं उत्तराखंड के पर्यावरणीय संकट और प्रशासनिक कमज़ोरियों का संकेत हैं। प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में वन कटान, अनियंत्रित निर्माण और जल संरक्षण के अभाव ने आपदा की मार को और बढ़ा दिया है, इसके साथ ही दोस्तो आपदा प्रबंधन में सुधार और प्रभावी तैयारी का अभाव भी सवालों के घेरे में है। 2013 के बाद भी जब प्राकृतिक आपदाओं के खतरे बरकरार हैं, तब भी पूर्व तैयारी, आपदा जागरूकता और बचाव कार्यों में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हुआ? ये सवाल पूछे जाने चाहिए।
दोस्तो छेनागाड़ की इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आपदा से निपटने के लिए न केवल त्वरित राहत कार्यों की जरूरत है, बल्कि स्थायी और दीर्घकालिक पर्यावरण संरक्षण नीति भी बनानी होगी और हां दगड़ियो यह आपदा सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है ऐसा मुझे व्यक्तिगत तौर लगता रहा है। मै हर बार आप सब को बताता रहा हूं, कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाना और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है साथ ही सरकार, प्रशासन, स्थानीय समुदाय और पर्यावरणविदों को मिलकर ऐसी रणनीति बनानी होगी जो न केवल आपदा के बाद राहत और पुनर्निर्माण कार्यों में दक्ष हो, बल्कि ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति को भी कम कर सके। स्थानीय लोगों को आपदा की तैयारी, बचाव कार्य और सतर्कता के लिए प्रशिक्षित करना भी आवश्यक है ताकि आने वाले समय में इस तरह की त्रासदियों को कम से कम नुकसान पहुँचाए। वैसे दगड़ियो रुद्रप्रयाग के छेनागाड़ की इस तबाही ने एक बार फिर याद दिलाया है कि प्रकृति की शक्तियों के सामने मनुष्य कितना नाजुक है। लाखों आश्रयों, सपनों और उम्मीदों को एक ही पल में निगल जाने वाली यह आपदा न केवल एक विनाशकारी घटना है, बल्कि हमें हमारी सीमाओं का अहसास कराने वाली सीख भी है। कुछ लोग कहते हैं कि मै कई बार ज्ञान ज्यादा दे जाता हूं लेकिन सच भी तो है ना दगड़ियों जब तक हम प्रकृति के साथ सामंजस्य नहीं बनाएंगे, प्रकृति की शक्तियां हमें अपनी काबू में करती रहेंगी। छेनागाड़ की आपदा हमें याद दिलाती है कि सतर्कता, तैयारी और पर्यावरण संरक्षण के बिना हम भीषण विपत्तियों के और भी ज्यादा शिकार हो सकते हैं। धराली, थराली के बाद रुद्रप्रयाग जिले का छेनागाड़ भयंकर तबाही का भेंट चढ़ गया। आपदा की ऐसी गर्जना वर्ष 2013 की आपदा के बाद एक बार फिर से सुनने को मिली मानों आज ही पूरा क्षेत्र जमीन में समा जाए। ग्रामीणों की आंखों से वो खौफनाक मंजर दूर होने का नाम नहीं ले रहा है।