अल्मोड़ा की पहाड़ियों में आज रच गया एक अंतरराष्ट्रीय प्रेम का अद्भुत संगम श्रीपूर्णा जोशी और फ्रांस के गुरेलिएन पेरिस ने कसार देवी में पारंपरिक भारतीय रीति-रिवाज के साथ सात फेरे लिए, और इस मौके पर शहनाई की मधुर धुनों ने पूरे इलाके को उत्सव का रंग दे दिया। फ्रांस से बारात लेकर आए दूल्हे और अल्मोड़ा की दुल्हन की यह जोड़ी साबित कर रही है कि प्यार की कोई सीमा नहीं होती। आज मै आपको दिखाउंगा इस भव्य और यादगार शादी की हर खास झलक कैसे बनी आकर्षण का केंद्र।दोस्तो वैसे आपने शादियां तो बहुत देखीं होंगी, लेकिन ऐसी नहीं देखी होगी। हमारे देश में कहावत है कि जोड़ियां आसमान में बनती हैं नहीं तो अल्मोड़ा के ध्रुव रंजन जोशी की बिटिया श्रीपूर्णा की शादी फ्रांस के और्हेल्यै से कैसे होती? जी हां हमने जो कहा वो सोलह आने सच है। भारत से करीब साढ़े 6 हजार किलोमीटर दूर फ्रांस की राजधानी पेरिस से उत्तराखंड स्थित अल्मोड़ा में बारात आई। भारतीय रीति रिवाज से विवाह स्थल कसार देवी तक उत्तराखंड के पारंपरिक बाजों-गाजों के साथ बारात पहुंची। फिर एक विवाह इतिहास में दर्ज हो गया।
दोस्तो उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा एक बार फिर अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के कारण सुर्खियों में है। इस बार चर्चा का केंद्र बना एक अंतरराष्ट्रीय विवाहइस विवाह में चीनाखान निवासी श्रीपूर्णा जोशी ने फ्रांस के और्हेल्यै गुरेलिएन के साथ पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया। 12 फरवरी को कसारदेवी क्षेत्र स्थित एक रिसॉर्ट में आयोजित यह भव्य समारोह भारतीय और विदेशी संस्कृतियों के खूबसूरत संगम का साक्षी बना। दोस्तो श्रीपूर्णा जोशी, ओएनजीसी से सेवानिवृत्त अधिकारी ध्रुव रंजन जोशी और प्रतिभा जोशी की पुत्री हैं। उन्होंने दिल्ली से मास कम्युनिकेशन में स्नातक, भारतीय विद्या भवन से टेलीविजन एवं फिल्म प्रोडक्शन में स्नातकोत्तर और ग्राफिक डिजाइन में डिप्लोमा किया है। वहीं दूल्हे और्हेल्यै फ्रांस निवासी हैं और भारतीय संस्कृति से विशेष रूप से प्रभावित बताए गए। दोस्तो विवाह समारोह वैदिक मंत्रोच्चार, अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे, वरमाला, कन्यादान और अन्य पारंपरिक रस्मों के साथ संपन्न हुआ। ढोल-दमाऊं की गूंज और छोलिया नृत्य दल के साथ निकली बारात ने आयोजन को पूरी तरह कुमाऊंनी रंग में रंग दिया।
फ्रांस से पहुंचे 25 से अधिक मेहमान भी पारंपरिक परिधानों में नजर आए. विदेशी महिलाओं ने साड़ी, घाघरा-चोली और पिछौड़ा धारण किया। पुरुष मेहमान कुर्ता-पायजामा और शेरवानी में सजे दिखे.दूल्हे और्हेल्यै ने कहा कि- अल्मोड़ा की प्राकृतिक सुंदरता, आध्यात्मिक वातावरण और स्थानीय परंपराओं ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। यूरोप में विवाह स्थलों की कमी नहीं है, लेकिन भारतीय संस्कृति और उत्तराखंड की आध्यात्मिक शांति ने मुझे यहां विवाह करने के लिए प्रेरित किया। दुल्हन के पिता ध्रुव रंजन जोशी ने कहते हैं कि भारत में पढ़ाई करने के बाद हमारी बेटी उच्च शिक्षा के लिए फ्रांस गई थी. पढ़ाई पूरी होने के बाद वह वहीं एक कंपनी में कार्यरत है। एक साल पहले बेटी के साथ काम करने वाले सहयोगी का बेटी के विवाह का प्रस्ताव मेरे पास आया था। पहले तो बेटी को इतनी दूर भेजने से मना किया. फिर फ्रांस जाकर उनके परिवार से मिला तो परिवार अच्छा लगा। इसके बाद दोनों का विवाह करने का निर्णय लिया. आज दोनों का विवाह हो रहा है तो मैं बहुत खुश हूं।
दोस्तो इस अंतरराष्ट्रीय विवाह को लेकर क्षेत्र में खासा उत्साह देखने को मिला। स्थानीय लोगों ने भी आयोजन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। पहाड़ी व्यंजन, लोक संगीत और पारंपरिक रीति-रिवाजों ने विदेशी मेहमानों को कुमाऊंनी संस्कृति से रूबरू कराया। यह विवाह न केवल दो व्यक्तियों, बल्कि दो देशों और संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक बन गया, जिसकी चर्चा अब पूरे क्षेत्र में हो रही है। दोस्तों, अल्मोड़ा की पहाड़ियां आज सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक वातावरण के लिए ही नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय प्रेम कहानी की गवाह बन गई हैं। श्रीपूर्णा जोशी और फ्रांस के और्हेल्यै गुरेलिएन का यह विवाह साबित करता है कि प्यार और संस्कृति की कोई सीमा नहीं होती। वैदिक मंत्रों, सात फेरे, ढोल-दमाऊं की थाप और कुमाऊंनी रंग में रंगी बारात ने यह शादी न सिर्फ दो दिलों का, बल्कि दो देशों और संस्कृतियों का अद्भुत संगम बना दिया।अल्मोड़ा की सांस्कृतिक विरासत और भारतीय रीति-रिवाज की गर्माहट ने विदेशी मेहमानों के दिलों को भी जीत लिया। यह सिर्फ एक शादी नहीं, बल्कि एक यादगार उत्सव और सांस्कृतिक पुल है, जो हमेशा यहां के इतिहास में सुनहरी लकीर की तरह दर्ज रहेगा। इस खूबसूरत मिलन की गूँज अभी भी पहाड़ियों में गूंज रही है और यही है अल्मोड़ा की अंतरराष्ट्रीय शान।