जी हां दोस्तो, क्या उत्तराखंड की सरकार ने सच में हजारों कर्मचारियों को झांसा दिया? उपनल कर्मी एग्रीमेंट को लेकर भड़के हैं और आरोप है कि अफसरों ने अदालतों के आदेशों की अनदेखी की! क्या है इस विवाद की असल वजह और कर्मचारियों की नाराजगी कितनी गहरी है। दोस्तो प्रदेश की सरकार का उपनल कर्मियों के लिए तैयार किया गया एग्रीमेंट इन्हें भड़काने वाला साबित हुआ। स्थिति ये रही कि उपनल कर्मी इस अनुबंध के बिनाह पर समान कार्य के लिए समान वेतन का लाभ भी नहीं लेना चाहते। आखिरकार ऐसा क्या है इस एग्रीमेंट में और हाईकोर्ट के 8 साल पुराने आदेश का ये कर्मी क्यों बार बार कर रहे जिक्र। मै आपको बताउंगा कैसे एक महीने भी नहीं टिकी उपनल कर्मियों की खुशी। दोस्तो उत्तराखंड में करीब 25 हजार उपनल कर्मचारी पिछले कई वर्षों से अपने भविष्य को सुरक्षित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। लंबे संघर्ष के बाद पिछले महीने हुई राज्य कैबिनेट बैठक में समान कार्य के बदले समान वेतन देने का निर्णय लिया गया था. इस फैसले के सामने आते ही उपनल कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। जगह-जगह कर्मचारियों ने इस फैसले का स्वागत किया और मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल का आभार जताया। ऐसा लग रहा था कि वर्षों पुरानी मांग अब पूरी होने जा रही है और कर्मचारियों को राहत मिलेगी, लेकिन दोस्तो यह खुशी ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी।
अब राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए नए अनुबंध प्रारूप ने एक बार फिर कर्मचारियों के बीच असंतोष और आक्रोश को जन्म दे दिया है. आरोप है कि समान कार्य के बदले समान वेतन लागू करने से पहले सरकार ने कर्मचारियों के सामने जो अनुबंध रखा है, उसमें कई ऐसी शर्तें जोड़ी गई हैं, जो उनके अधिकारों को सीमित करती हैं। दोस्तो कर्मचारियों का कहना है कि इस अनुबंध में यह शर्त शामिल की गई है कि वे भविष्य में कभी भी नियमितीकरण की मांग नहीं करेंगे। इसके अलावा अनुबंध में मेडिकल सुविधा, बोनस, सामाजिक सुरक्षा और अन्य जरूरी लाभों का भी स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है. ऐसे में कर्मचारियों को आशंका है कि वे लंबे समय तक अस्थायी स्थिति में ही काम करने को मजबूर रहेंगे। दरअसल दोस्तो यह पूरा मामला नया नहीं है. साल 2018 में उच्च न्यायालय ने उपनल कर्मचारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके पक्ष में फैसला दिया था दोस्तो अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया तैयार की जाए और तब तक उन्हें समान कार्य के बदले समान वेतन दिया जाए। लेकिन दोस्तो राज्य सरकार ने इस आदेश को लागू करने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। कई वर्षों तक मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित रहा, लेकिन आखिरकार सरकार की याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद सरकार के लिए कर्मचारियों के हित में निर्णय लेना अनिवार्य हो गया।
इसी क्रम में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया गया, जिसकी सिफारिशों के आधार पर समान कार्य के बदले समान वेतन का निर्णय लिया गया। अब जो अब कैसे अनुबंध की शर्तों ने बिगाड़ा दिया पूरा मामला वो भी हताउंगा दोस्तो जहां अदालत ने स्पष्ट रूप से नियमितीकरण के निर्देश भी दिए थे, लेकिन सरकार ने फिलहाल केवल समान वेतन लागू करने का निर्णय लिया. इसके बावजूद कर्मचारी इस फैसले से संतुष्ट नजर आए थे, लेकिन अब अनुबंध की शर्तों ने पूरे मामले को फिर से विवादों में ला खड़ा किया है। उपनल कर्मचारी संगठन ने 2 अप्रैल 2026 को जारी शासनादेश का कड़ा विरोध किया है. संगठन का कहना है कि- अनुबंध की शर्तें न्यायालयों की भावना और आदेशों के विपरीत हैं. उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय और श्रम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से समान वेतन के साथ-साथ नियमितीकरण के भी निर्देश दिए हैं, लेकिन कुछ अधिकारी जानबूझकर इन आदेशों की अनदेखी कर रहे हैं। इसके अलावा दोस्तो संगठन ने ये भी कहा कि प्रस्तावित अनुबंध श्रम कानूनों, ईएसआई अधिनियम, ईपीएफ अधिनियम और बोनस अधिनियम का उल्लंघन करता है। कर्मचारियों के अनुसार, यह अनुबंध उन्हें बंधुआ मजदूरी जैसी स्थिति की ओर धकेलता है और सामाजिक सुरक्षा के अधिकारों से वंचित करता है। ऐसे में संगठन ने इस शासनादेश को तत्काल निरस्त करने की मांग की है। कर्मचारी संगठन ने साफ किया है कि वे इस मुद्दे पर कानूनी सलाह लेंगे और जरूरत पड़ने पर सड़कों पर उतरकर आंदोलन भी करेंगे। दोस्तो संगठन की प्रमुख मांगों में यह भी शामिल है कि
जिन कर्मचारियों ने 10 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें विनियमितीकरण नियमावली-2025 के तहत नियमित किया जाए. साथ ही, उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए जो कथित तौर पर न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं। इधर दोस्तो इस मामले में एक बार फिर उच्च न्यायालय भी सक्रिय होता नजर आ रहा है। कोर्ट ने कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर सरकार से जवाब मांगा है, जिससे आने वाले दिनों में इस विवाद पर न्यायिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है। राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा तूल पकड़ने लगा है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि- शुरुआत से ही उपनल कर्मचारियों के साथ धोखा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब अदालत इस मामले में स्पष्ट आदेश दे चुकी है, तब भी सरकार निर्णय लेने से बच रही है। वहीं सरकार की ओर से सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी का कहना है कि-यदि कर्मचारी अनुबंध से असंतुष्ट हैं, तो सरकार उनसे बातचीत के लिए तैयार है। हम उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि सरकार पहले भी कर्मचारियों के हित में काम करती रही है और आगे भी संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जाएगा। दोस्तो फिलहाल समान कार्य के बदले समान वेतन का फैसला, जो कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया था, अब अनुबंध की शर्तों के कारण नए विवाद में घिर गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और कर्मचारियों के बीच बातचीत से कोई समाधान निकलता है या फिर यह मामला एक बार फिर अदालत और सड़क दोनों पर लंबी लड़ाई का रूप लेता है।