जी हां दोस्तो नवजात तो चली गई, लेकिन अमर हो गई। उत्तराखंड की दिल छू लेने वाली कहानी 9 दिन की बच्ची की देहदान से हर आंख हो गई नम, दिल को झकझोर देने वाली खबर आपको बताने के लिए आया हूं। दोस्तो उत्तराखंड से आई ये खबर यकीन मानिये आपके दिलों दिमाग को झकझोर देग। दोस्तो 9 दिन की एक नन्ही बच्ची, जिसे जिंदगी तो ज्यादा नहीं मिली, लेकिन जाते-जाते उसने इंसानियत को एक नई राह दिखा दी। जिस घर में कुछ दिन पहले किलकारियां गूंजी थीं, वहां मातम पसरा है, लेकिन इस गम के बीच माता-पिता ने ऐसा फैसला लिया, जिसने इस नन्ही जान को मरकर भी अमर बना दिया। ऋषिकेश से आई इस कहानी ने हर आंख को नम कर दिया है। दोस्तो गंभीर बीमारी के कारण 9 दिन की बच्ची को जीवन तो नहीं मिला, लेकिन वो मरकर भी अमर हो गई। जिस नवजात की किलकारी से पूरा परिवार चहक उठा था, 9 दिन बाद ही उस परिवार की खुशियां गम में बदल गई। हालांकि नवजात के माता-पिता ने बच्ची का देहदान कर मानव कल्याण में सहयोगी बने। उत्तराखंड के ऋषिकेश से यह मार्मिक घटना हर किसी की आंखें नम कर रहा है। दोस्तो, श्रीनगर में चमोली के एक दंपती की 9 दिन पहले बेटी हुई तो पूरा परिवार खुशियों में डूब गया। हालांकि यह क्षण भर की खुशी ही साबित हुई। इस नन्ही परी को जन्मजात महावृहदांत्र रोग था, जिसमें आंतों में तांत्रिक गुच्चो का अभाव था।
इस रोग से पीड़ित बच्ची को श्रीनगर से एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया था। जहां ऑपरेशन कर उसकी जान तो बचाई गई, लेकिन ऑपरेशन के 3 दिन बाद ही नवजात की रिफ्रैक्ट्री सेप्टिक शॉक के कारण मौत हो गई। दोस्तो बच्ची की मौत से दुखी परिजनों ने जब बीमार बच्ची के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के बारे में एम्स ऋषिकेश के सीनियर नर्सिंग ऑफिसर से जानकारी ली। उन्होंने पीड़ित दंपती की मदद के लिए मोहन फाऊंडेशन उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा को सूचित किया। इस दौरान संचित अरोड़ा ने दंपती को देहदान के महत्व के बारे में बताया और उन्हें मानव कल्याण में योगदान देने के लिए प्रेरित भी किया। दोस्तो दंपती को बताया कि यदि वे नन्ही परी का मृत देह दान करेंगे तो चिकित्सा शोध में कई कल्याणकारी कार्य हो सकेंगे। नन्ही बच्ची के माता-पिता इसके लिए ने अपनी सहमति दे दी। इसके बाद एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मुकेश मुकेश सिंगला और प्रोफेसर डॉक्टर रश्मि मल्होत्रा से संपर्क किया गया। दोस्तो तकनीकी सहायक अजय रावत द्वारा आवश्यक कार्यवाही कर नवजात की देह को विभाग को सौंपा गया। इस दौरान नवजात की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। पीड़ित दंपत्ति द्वारा मानव कल्याण के में दिए गए योगदान को भी सराहा गया। दोस्तो 9 दिन की नन्ही परी, लेकिन सोच इतनी बड़ी कि इंसानियत को नई दिशा दे गईॉ। इस परिवार ने अपने असहनीय दर्द को मानव कल्याण में बदलकर समाज को एक गहरी सीख दी है। यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं, बल्कि उस साहस और संवेदनशीलता की है, जो मुश्किल घड़ी में भी दूसरों के लिए उम्मीद बन जाती है। नन्ही परी भले ही इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन अपने दान से हमेशा जिंदा रहेगी।”