Chamoli पहाड़ का दर्द! क्यों नहीं लगा मरहम? | Subodh Uniyal | CM Dhami | Uttarakhand News

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दोस्तो पहाड़ का एक ऐसा दर्द इसका इस पर बीते 25 साल में कोई भी मरहम नहीं लगा पाया। दोस्तो फिर उत्तराखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था का सच सामने आया। घायल महिला को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा और डोली का सहारा लेना पड़ा। पहाड़ का दर्द वहीं है, जहां समय पर मदद नहीं मिलती। जहां हाईटेक स्वास्थ्य सुविधाएं हैं उत्तराखंड को बेमिशाल बता रही है। वहीं हकीकत दावों को जोर का तमाचा मार रही है। दोस्तो दर्द बेहद पूराना है, लेकिन समामधान के नाम पर इस पर दावे होते हैं। दोस्तो क्या लगता है आपको इस तस्वीर को देख कर वाकई बेमिशाली वाली तस्वीर होगी बल ये वैसे तो हर दूसरे दिन ऐसी तस्वीरें मेरी आंखों से गूजरती हैं, लेकिन लेकिन समाधान तो होता नहीं दिखता। दोस्तो पहाड़ों में आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां विकास सिर्फ कागजों तक सीमित है और बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों को रोज संघर्ष करना पड़ता है। सड़क, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी जरूरी सुविधाओं के अभाव में यहां की जिंदगी आज भी कठिनाइयों से भरी हुई है। इसी तरह जनपद Chamoli के मौली हडूंगा गांव में आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा नहीं पहुंच पाई है। सरकारी विकास के बड़े-बड़े दावों के बावजूद यहां की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर आपातकालीन परिस्थितियों तक के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है।

दोस्तो जानकारी के अनुसार चमोली जिले विकासखंड स्थित निजमुला घाटी के मौली हडूंगा गांव की रहने वाली गुड्डी देवी (पत्नी वीरेंद्र सिंह) रोज की तरह जंगल में चारा लेने गई थीं, लेकिन इस दौरान वह पेड़ से फिसलकर गंभीर रूप से घायल हो गईं। घटना की सूचना मिलते ही परिजन और ग्रामीण मौके पर पहुंचे, लेकिन सड़क सुविधा न होने के कारण उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन गया। दोस्तो महिला की गंभीर हालत को देखते हुए ग्रामीणों ने एकजुटता दिखाई और डंडी-कंडी (पालकी) का सहारा लिया। इसके बाद करीब 10 किलोमीटर लंबे दुर्गम और खतरनाक पहाड़ी रास्ते को पैदल तय करते हुए घायल महिला को सड़क तक पहुंचाया गया। वहां से उन्हें Gopeshwar के जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज किया गया। दौस्तो मौली हडूंगा गांव के लोगों के लिए ये स्थिति कोई नई नहीं है, यहां बीमार और गर्भवती महिलाओं को अक्सर डंडी-कंडी के सहारे ही अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। जरूरी सामान लाने के लिए भी ग्रामीणों को कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। आज भी लोगों को 8 से 10 किलोमीटर तक का कठिन पैदल सफर करना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर सरकारे और प्रशासन ये दावा कर रहा है कि लोगों को वापस उत्तराखंड लाने के लिए तमाम तरह के प्रवासी सम्मेलन होते हैं। उनको तमाम और तरह की योजनाओं का प्रलोभन दिया जाता है तो क्या दोस्तो इस तस्वीर को देखर कर कोई यहां वापस आना चाहेगा– फिर वो योजनाएं कैसे परवान चढेंगी, जो हर रोज देहरादून में होती बैठकों में बनती है फिर एक फाइल और तैयार हो जाती है।

दोस्तो हां अकर गांव के लोगों और ग्रामप्रधान का ये कहना होता है कि सड़क सहित बुनियादी सुविधाओं का गंभीर अभाव है और वो कई बार प्रशासन से सड़क निर्माण की मांग की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे ग्रामीणों की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। दोस्तो  यह घटना न केवल सिस्टम की विफलता को उजागर करती है, बल्कि विकास के दावों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क न होने के कारण आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता, जिससे कई बार उनकी जान तक खतरे में पड़ जाती है। ग्रामीणों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि मौली हडूंगा गांव को जल्द से जल्द सड़क मार्ग से जोड़ा जाए और स्वास्थ्य तथा परिवहन सुविधाओं को बेहतर बनाया जाए, ताकि भविष्य में किसी को ऐसी कठिन परिस्थितियों का सामना न करना पड़े। मौली हडूंगा गांव की यह घटना साफ दर्शाती है कि आज भी पहाड़ के कई गांव विकास से कोसों दूर हैं। जब तक यहां सड़क और बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचतीं, तब तक ग्रामीणों को इसी तरह जीवन और मौत के बीच संघर्ष करते रहना पड़ेगा। वैसे तो दोस्तो ऐसे काई गांव होंगे बल अपने प्रदेश में जहां सड़क नहीं है, अस्पताल नहीं हैं। अस्पताल हैं तो डॉक्टर नहीं मशीने और तमाम तरह की असुविधाओं के बीच गांवों में बचेकुचे लोगों की जिंदगी किसी बड़े संकट में दिखाई देती है।