जी हां प्रदेश में एक के बाद एक कई घटनाएं सुर्खियो में है, इन सब में एक बात कॉमन है यानि एक सी है वो है क्या है वो है कानून व्यवस्था और हर मामले में खतरे में दिखा पुलिस का इकबाल, यानि की इँसाफ के लिए हम सब सबसे पहले कहां जाते हैं पुलिस के पास। अगर वहीं से आपको धुत्कार मिले तो आप क्या करेंगे क्यों एक किसान को दुनिया अलविदा कहने को मजबूर कर दिया हमारे सिस्टम ने और उसी जा चुकी जिंदगी हो रहा सियासी विलाप क्यों कह दिया और कसने कह दिया कि ये आत्महत्या नहीं ये तो बताउंगा आपको पूरी खबर। दोस्तो “किसान टूटा, सिस्टम खामोश रहा और मौत बोल गई, एक किसान की मौत और व्यवस्था कटघरे में दोस्तो काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या ने उत्तराखंड की सत्ता और पुलिस व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि सिस्टम की बेरुखी और सत्ता के अहंकार का नतीजा है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने इसे सरकार के नैतिक पतन का खतरनाक संकेत बताया है। अब सवाल ये है—क्या न्याय की बंद होती राह ने एक किसान की जान ले ली?
दोस्तो किसान सुखवंत सिंह की मौत मामले में विपक्ष लगातारब बीजेपी सरकार पर हमलावार हो रखा है। इस मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य का भी बड़ा बयान आया है। उन्होंने किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या को व्यवस्था के नैतिक पतन का जीवंत प्रमाण बताया है। दोस्तो यशपाल आर्य ने कांग्रेस प्रदेश मुख्यालय देहरादून पहुंचे थे, जहां उन्होंने किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या का लेकर अपना दिया। यशपाल आर्य ने कहा कि यह केवल आत्महत्या नहीं, बल्कि पुलिस-प्रशासन की प्रताड़ना और सत्ता के अहंकार का प्रमाण है। एक मजबूर किसान को अपनी जान देनी पड़ गई…दोस्तो उन्होंने कहा कि नौ जवान किसान ने आत्महत्या जैसा कदम उठाने से पूर्व वीडियो के माध्यम से अपनी पीड़ा और दर्द को साझा किया था. वीडियो में साफ तौर पर कहा कि उधम सिंह नगर जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से लेकर थाना इंचार्ज तक ने उनकी फरियाद नहीं सुनी, जिन लोगों ने मुझे लगातार प्रताड़ित करने का काम किया, उन लोगों के साथ मिलीभगत करके पुलिस ने उनके शिकायती पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं की, जिसकी वजह से मुझे बेबस होकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। दोस्तो यहां कांग्रेस का कहना ये कि समझा जा सकता है कि किसान कितना लाचार और बेबस रहा होगा, जब उसके सामने पुलिस ने न्याय के सारे दरवाजे बंद कर दिए तो उसने इस तरह का कदम उठाया।
यह स्पष्ट हो गया है कि अब भू-माफियाओं के साथ सरकार का नापाक गठजोड़ बन चुका है। पुलिस भी अपने दायित्वों से हटकर भू-माफियाओं व शराब माफियाओं के हाथों में खेल रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने इस मामले को गंभीरता से लिया है, समूची कांग्रेस इस दु:ख की घड़ी में पूरी मजबूती के साथ किसान के परिवार के साथ खड़ी है मुख्यमंत्री धामी ने किसान आत्महत्या मामले में कमिश्नर कुमाऊं को मजिस्ट्रेट जांच के निर्देश दिए हैं, लेकिन यह महज लीपापोती है, दरअसल सरकार अपने अधिकारियों को बचाना चाहती है, लेकिन सच सबके सामने है। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और वहां के थाना इंचार्ज का इंवॉल्वमेंट, इसमें सम्मिलित होना या जाहिर करता है कि किसान की आत्महत्या की वजह क्या रही है। उन्होंने इस पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने और दोषी पुलिस अधिकारियों पर हत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज किए जाने की मांग उठाई है। बता दें कि उधम सिंह नगर जिले के काशीपुर के रहने वाले किसान सुखवंत सिंह अपनी पत्नी और बेटा के साथ नैनीताल जिले के काठगोदाम क्षेत्र में घूमने गए थे. तीनों एक होटल में रूके हुए थे। पत्नी और बेटा कुछ काम से जैसी होटल से बाहर गए सुखवंत सिंह ने कमरे में आत्महत्या कर दी। सुखवंत सिंह ने आत्महत्या से पहले एक वीडियो भी बनाया था। वीडियो में सुखवंत सिंह ने आत्महत्या की वजह बताई थी। इस मामले में सुखवंत सिंह के पिता तेजा सिंह का भी बयान आया है।
पिता तेजा सिंह ने बताया कि उनकी जमीन थी, जो किसी फैक्ट्री के प्रोजेक्ट में गई थी, जिसकी एवज में उन्हें चार करोड़ 70 लाख रुपए मिले थे। इस पैसे के बदले उन्होंने सात एकड़ जमीन लेने की सोची थी और इसी के नाम पर प्रॉपर्टी डीलरों ने उनके साथ धोखाधड़ी कर दी। तेजा सिंह का आरोप है कि प्रॉपर्टी डीलरों ने उनके नाम पर फर्जी बेनामा कर दिया और उनका सारा पैसा डूब गया। तेजा सिंह का कहना है कि उन्होंने पुलिस से भी मामले की शिकायत की, लेकिन पुलिस ने उनके मामले को गंभीरता से नहीं लिया। आखिर में उनके बेटे ने सुसाइड कर दिया। उनका बेटा, बहू और नाती नैनीताल घूमने गए थे, जहां पर उनके बेटे ने सुसाइड कर लिया। बता दें कि इस मामले के सामने आने के बाद जहां कुछ पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किया है। वहीं कुल 26 लोगों पर मुकदमा भी दर्ज हुआ है। एक किसान चला गया पीछे छोड़ गया सवालों की फसल।”क्या सिस्टम की चुप्पी ने एक परिवार को उजाड़ दिया? क्या जिम्मेदार अफसरों पर सच में कार्रवाई होगी या जांच के नाम पर वक्त गुज़रेगा? सुखवंत सिंह की मौत सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि इंसाफ की कसौटी है—जिसका जवाब अब सरकार और प्रशासन को देना होगा।