उत्तराखंड की पूरी तस्वीर को देखें तो पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी और चमोली जिलों के अलावा प्रदेश के हर जिले की सरकार में हिस्सेदारी है। जातीय लिहाज से देखें तो मुख्यमंत्री समेत 5 विधायक ठाकुर समुदाय से हैं, जबकि 3 विधायक ब्राह्मण समुदाय से हैं। अनुसूचित जाति से दो विधायक सरकार का हिस्सा हैं और एक विधायक पंजाबी समाज से है, लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सीएम धामी का मास्टरस्ट्रोक है। अगर है तो कैसे और क्या है उत्तराखंड सरकार का चुनावी ब्लूप्रिंट बताउंगा आपको पूरी खबर अपनी इस रिपोर्ट के जरिए। दोस्तो मंत्रिमंडल विस्तार हुआ तो सवाल ये उठा की इन जिन विधायकों को मंत्री बनाया गया है। इसके पीछे वजह क्या है क्योकि बीते कुछ वक्त में बहुत कुछ उत्तराखंड ने देखा। बीजेपी के ही कई मौजूदा विधायक यहां तक कि पूर्व मंत्री भी अपने आप को मंत्रिमंडल में देख रहे थे, लेकिन आखिर अचानक से ऐसा क्या हुआ कि जिन नामों की चर्चा मंत्री बनने की ज्यादा थी, वो देखते रह गए और जिनके नाम कहीं थे ही नहीं वो मंत्री बन गए। कहने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि एक दिन पहले तक इन नए मंत्रियों को तक पता नहीं था कि वो मंत्री बनने वाले हैं। लेकिन मंत्री बन गए तो सवाल वो ही क्योंकि बीजेपी ने अपने बहुत से विधायकों में से इन पांच नाम को चुना वो बताता हूं।
दोस्तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा संदेश देते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कैबिनेट विस्तार किया है। पांच नए चेहरों खजान दास, भरत चौधरी, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक और प्रदीप बत्रा को राज्यपाल गुरमीत सिंह ने मंत्री पद की शपथ दिलाई। इस विस्तार में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधने की साफ कोशिश दिखी है, दोस्तो जहां कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। हरिद्वार जैसे अहम जिले को पहली बार जगह मिली, जबकि कुछ पहाड़ी जिले अब भी बाहर हैं। सामाजिक समीकरणों में ठाकुर, ब्राह्मण, अनुसूचित जाति और पंजाबी समाज को साधने की रणनीति भी साफ नजर आती है। दोस्तो मैदान और पहाड़ के बीच संतुलन बनाकर सरकार ने चुनावी संदेश देने की कोशिश की है। इस कैबिनेट विस्तार में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को तरजीह दी गई है। दरअसल, उत्तराखंड में दो मंडल हैं कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों के हिसाब से देखें तो कुमाऊं मंडल में आने वाले नैनीताल जिले से राम सिंह कैड़ा सरकार में पहली बार मंत्री बन रहे हैं। वहीं पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले से कोई मंत्री नहीं है। बेशक दोस्तो सीएम पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं मंडल से हैं। सीएम चंपावत जिले की चंपावत विधानसभा को रिप्रेजेंट करते हैं। उधम सिंह नगर से सौरभ बहुगुणा सरकार में पहले से ही मंत्री हैं। वहीं अल्मोड़ा जिले से रेखा आर्य कैबिनेट में मंत्री हैं। इस तरह कैबिनेट विस्तार के बाद कुमाऊं मंडल से मुख्यमंत्री के अलावा तीन अन्य मंत्री कैबिनेट का हिस्सा रहेंगे।
दोस्तो मै आपको ये बताने की कोशिश कर रहा हूं कि कैसे पहाड़ और मैदान को साधने की कोशिश की गई है और कौन कौन से वो जिले हैं जिसे मंत्रीमंडल से दूर रखा गया है। यहां देहरादून जिले से खजान दास को मंत्रिमंडल में जगह मिली है. खजान दास देहरादून शहर की राजपुर विधानसभा सीट को रिप्रेजेंट करते हैं. देहरादून जिले की मसूरी विधानसभा से गणेश जोशी पहले ही सरकार में शामिल हैं. हरिद्वार जिले को अभी तक कैबिनेट में कोई जगह नहीं मिल पाई थी, लेकिन अब हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक और वहीं इसी जिले से दूसरे विधायक प्रदीप बत्रा दोनों सरकार में मंत्री बन गए हैं। गढ़वाल मंडल के पहाड़ी जिलों की बात करें तो उत्तरकाशी चमोली रुद्रप्रयाग यह जिले अभी तक बिना रिप्रेजेंटेशन के थे, लेकिन अब कैबिनेट में रुद्रप्रयाग जिले से भरत सिंह चौधरी को जगह मिली है। दोस्तो उत्तराखंड की पूरी तस्वीर को देखें तो पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी और चमोली जिलों के अलावा प्रदेश के हर जिले की सरकार में हिस्सेदारी है। जातीय लिहाज से देखें तो मुख्यमंत्री समेत 5 विधायक ठाकुर समुदाय से हैं, जबकि 4 विधायक ब्राह्मण समुदाय से हैं। अनुसूचित जाति से दो विधायक सरकार का हिस्सा हैं और एक विधायक पंजाबी समाज से है। इसके अलावा दोस्तो कैबिनेट में मैदान और पहाड़ के बीच के संतुलन को भी बनाए रखने की कोशिश है। मदन कौशिक, प्रदीप बत्रा, सौरभ बहुगुणा मैदानी जिलों से हैं तो सीएम समेत बाकी सभी विधायक पहाड़ी जिलों से आते हैं तो दोस्तों, तस्वीर उत्तराखंड के नए मंत्रिमंडल विस्तार की, देखिए कैसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने क्षेत्रीय और जातीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए चुनावी संदेश देने की रणनीति बनाई। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों के प्रतिनिधित्व, मैदान और पहाड़ का संतुलन, साथ ही ठाकुर, ब्राह्मण, अनुसूचित जाति और पंजाबी समाज—इन सभी फैक्टरों ने इस कैबिनेट विस्तार को सिर्फ प्रशासनिक कदम ही नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीति का भी बड़ा संदेश बना दिया है। भले ही कुछ नाम अचानक शामिल हुए और कुछ उम्मीदवारी पर रह गए, लेकिन ये विस्तार साफ तौर पर एक रणनीतिक खेल है। ये खेल आगे क्या रंग दिखाएगा ये देखना भी बेहद दिलचस्प होने वाला है।