पहाड़ की इस पीड़ा क्या है इंतजाम?| Uttarakhand News | CM Dhami | Viral Video

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जी हां दोस्तो पहाड़ की इस पीड़ा का क्या होगा इँतजाम जिसका जवाब दशकों से पहाड़ के लोग खोज रहे हैं। अब तो उत्तराखंड में पलायन की मार ऐसी पड़ रही है, कि जो जिंदा हैं वो तो हैं ही तख्लीफ में, लेकिन मरने के बाद भी चार कंधों का नहीं हो रहा है इंतजाम। कैसे एक महिला का सेना ने किया अंतिम संस्कार बताउँगा आपको पूरी खबर। The impact of migration in Uttarakhand जी हां दोस्तो अपना पहाड, जो दूर से देखने में बेहद खूबसूरत लगता है, लेकिन इसी खूबसूरती के पीछे छुपा है एक ऐसा सच,जो दिल को झकझोर देता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में आज हालात ऐसे हो चुके हैंकि ज़िंदगी तो दूर, मौत के वक्त भी अपनों का साथ नसीब नहीं हो पा रहा। एक गांव में एक मां की अंतिम यात्रा के लिए चार कंधे तक नहीं मिल पाए और तब, इंसानियत की मिसाल बने सीमा पर तैनात SSB के जवान। ये सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं, ये पलायन से जूझते पहाड़ की पीड़ा है। ये खबर अंदर तक झकझोर देने वाली है। दोस्तो, पहाड़ में आज ऐसे कई सारे गांव मौजूद है ,जहां से भारी संख्या में पलायन हो चुका है इतना ही नहीं बल्कि उत्तराखंड में मौजूद गांव के गांव तक खाली हो चुके हैं। ऐसी ही कुछ कहानी है पिथौरागढ़ जिले की जहां एक बुजुर्ग महिला की मौत पर उसे कंधा देने के लिए गांव में चार लोग भी नहीं मिले।

दोस्तो, पिथौरागढ़ जिले से 25 किलोमीटर दूर मूनाकोट ब्लॉक के तडीगांव की निवासी 100 वर्षीय झूपा देवी का निधन हो गया। जिसके बाद बुजुर्ग महिला को अंत्येष्टि के लिए गांव से करीब ढाई किलोमीटर दूर काली नदी के तट तक ले जाया जाना था, लेकिन दोस्तो हैरानी की बात तो यह है कि महिला की अंतिम यात्रा के लिए पर्याप्त लोग गांव में मौजूद ही नहीं थे जो उनकी अर्थी को कंधा दे सकते। गांव के पूर्व प्रधान ने कहते हैं कि, शव यात्रा के लिए गांव में सिर्फ चार-पांच लोग मिले वह भी उम्रदराज ऐसे में जो हुआ वो और चौकाने वाला था। वो ये कि विकट परिस्थिति को देखते हुए नेपाल सीमा पर तैनात SSB के जवानों से मदद मांगी गई जिस पर SSB के चार जवान और दो अधिकारी मदद के लिए पहुंचे। जवानों की सहायता से शव को काली नदी के तट पर ले जाया गया। SSB के जवान महिला की अंतिम संस्कार के लिए पहले लकडियां लेकर गए और फिर महिला का अंतिम संस्कार किया गया ,जहां 65 वर्षीय रमेश चंद ने अपनी मां की चिता को मुखाग्नि दी। यहां दोस्तो आपको ये भी बता दूं कि इस गांव में पलायन का प्रमुख कारण सड़क निर्माण में देरी और वन्य जीवों की दहशत है। वर्ष 2019 में पंचायत की बनवाई गई कच्ची सड़क अब तक पक्की होनी बाकी है। इधर दोस्तो जंगली सूअर खेती को नष्ट कर रहे हैं इसके साथ ही वहां पर गुलदार और भालू की दहशत भी बनी रहती। इधर इससे पहले की बात करूं तो इस गांव में 20 साल पहले 37 परिवार रहते थे लेकिन अब 13 परिवार ही गांव में रह रहे हैं जिनमें अधिकतर बुजुर्ग ही है।

दोस्तो वैसे कई गांव होंगे। आप ये कह सकते हैं कि वीरान होते उत्तराखंड के गांव, दोस्तो पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में करीब 3.8 लाख लोग पहाड़ों से अपने गांव छोड़ चुके हैं। औसतन हर दिन लगभग 138 लोग रोज़गार की तलाश में पहाड़ से पलायन कर रहे हैं। दोस्तो रोजगार नहीं गांव में खेती बची नहीं शिक्षा स्वास्थ्य का हाल बेहाल फिर हो तो हो कैसे समाधान इसका नतीजा ये निकल रहा है कि, उत्तराखंड में 700 से अधिक गांव पूरी तरह वीरान होकर “घोस्ट विलेज” बन चुके हैं। दोस्तो कारण कोजने निकलेंगे तो एक नहीं कई मिलेंगे रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पलायन की सबसे बड़ी वजह बन रही है, लेकिन यह केवल लोगों का जाना नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, परंपराओं और पहाड़ी पहचान के टूटने का दर्दनाक सच भी है। सूने आंगन, बंद स्कूल और उजड़े खेत हमारी नीतियों की असफलता को साफ उजागर करते हैं। सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार तो खूब होता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका असर कहीं दिखाई नहीं देता। गांव-केंद्रित विकास की बातों के बावजूद हकीकत में गांव लगातार खाली होते जा रहे हैं। अगर अब भी ठोस नीति और ईमानदार अमल नहीं हुआ, तो उत्तराखंड के पहाड़ नक्शे पर तो रहेंगे, लेकिन उनके गांव सिर्फ यादों और कहानियों में सिमट कर रह जाएंगे।