Uttarkashi साहब हमारी कोई नहीं सुनता…! | CM Dhami | Rural Development | Uttarakhand News

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दोस्तों, उत्तराखंड में सरकारी दावे और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क साफ नजर आ रहा है! जब योजनाओं और वादों के बावजूद ग्रामीणों की आवाज़ दब रही है, तो उन्होंने खुद ही बीड़ा उठाया और अपनी समस्या का समाधान करने निकल पड़े। साहब, सुनने वाला कोई नही और ये देख कर आप भी दंग रह जाएंगे कि कैसे आम लोग सरकार सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं जमीनी हकीकत की पूरी कहानी बताउंगा आपको। दोस्तो जब ऐसी चौकाने वाली तस्वीरें मेरे सामने आती हैं तो मै ये सचता हूं कि वो दावे, वादे वो बारी भरकम महाबजट जो अभी अभी तो बताया गया था सदन को, को इस बार का बजट उत्तराखंड की तस्वीर और कदीर दोनों को बदलने वाला है और हां ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष फोकस किया गया था लेकिन उसके बाद भी तस्वीर ये निकल कर आती है जहां लोक बेचारे बन बैठे हैं। उत्तरकाशी दोस्तो पहाड़ों में ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ऐसा ही एक मामला मोरी विकासखंड के दूरस्थ गांव पवाणी के ग्रामीणों के सामने आया। यहां पवाणी गांव के ग्रामीणों का मुख्य मार्ग और विश्व प्रसिद्ध हरकीदून ट्रेक को जोड़ने वाला सूपिन नदी पर बना लकड़ी का पुल कई सालों से क्षतिग्रस्त स्थिति में था। इस पर ग्रामीण और ट्रेकर्स जान जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे थे जब प्रशासन और वन विभाग ने ग्रामीणों की नहीं सुनी, तो अब ग्रामीणों ने सूपिन नदी के तेज बहाव पर स्वयं ही पुलिया का निर्माण शुरू कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि इस संबंध में कई बार वन विभाग के कर्मचारियों को भी अवगत कराया गया था। लेकिन विभाग के अधिकारी सुनने को तैयार नहीं हुए। इसलिए उन्होंने स्वयं सूपिन नदी में पुलिया का निर्माण करना शुरू कर दिया।वैसे ये पहली ऐसी तस्वीर नहीं है जो दावों को मुंह चिढ़ाती, असल जमीनी हकीकत है ग्रामीण खुद बना रहे नदी पर अस्थाई पुलिया बनाने को मजबूर हैं।

दोस्तो पवाणी गांव के ग्रामीणओं के मुताबिक दोस्तो गांव की मुख्य खेती और गौशालाओं को जोड़ने के लिए वन विभाग की ओर से करीब दस साल पहले सूपिन नदी पर एक लकड़ी की पुलिया बनाई गई थी। इसी पुलिया से हर साल हजारों पर्यटक और ट्रेकर्स हरकीदून ट्रेक पर जाते हैं, लेकिन प्रशासन और वन विभाग की अनदेखी के कारण यह पुल कई वर्षों से जर्जर स्थिति में पड़ा हुआ था। सूपिन नदी के तेज बहाव से बचने के लिए ग्रामीण और ट्रेकर्स इस पर रस्सी बांध कर जान जोखिम में डालकर आवाजाही करते थे कई बार इस पुलिया के निर्माण की मांग की गई. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। दोस्तो ग्राम प्रधान के मुताबिक वन विभाग की ओर से ट्रेक पर जाने वाले ट्रेकर्स से शुल्क भी लिया जाता है, लेकिन फिर भी उनकी सुगम आवाजाही के लिए पुलिया का निर्माण नहीं किया गया। दोस्तो वो बताते हैं कि हर दिन ग्रामीण इस पुलिया से अपने खेतों और गोशालाओं में जाते हैं। हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। इसलिए अब ग्रामीणों ने स्वयं ही क्षतिग्रस्त पुलिया को तोड़कर नई पुलिया का निर्माण शुरू कर दिया है। अब पुलिया पर सुरक्षित आवाजाही हो पाएगी। वहीं, दोस्तो यहां आपको ये भी बता दूं कि इस संबंध में जब वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया गया तो उनका नंबर नहीं लगता। ग्रामीणों ने वन विभाग से जल्द ही स्थाई पुलिया का निर्माण करने की मांग की है. उन्होंने कहा कि यदि जल्द स्थाई निर्माण नहीं किया गया, तो वह संबंधित विभाग के खिलाफ आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। इसकी जिम्मेदारी विभाग की होगी लेकिन दोस्तो ये पहली तस्वीर नहीं उत्तरकाशी की उत्तरकाशी जनपद में आज भी कई गांवों के ग्रामीणों को आवाजाही के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इससे पहले स्यूंणा गांव के ग्रामीणों ने भागीरथी नदी पर स्थायी पुलिया बनाई थी। वहीं अब पुरोला विकासखंड के तलड़ा गांव के लोग कमल नदी पर लकड़ी का अस्थायी पुल बना रहे हैं। साल 2023 की आपदा में बही पुलिया आपदा के दो साल बाद भी नहीं बन पाई है, जिससे तलड़ा गांव के लोग कमल नदी पर लकड़ी की अस्थायी पुलिया बना कर जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे है। वहीं आश्वासन के बाद भी पुल ना बनने से लोगों में खासा रोष है और लोग सड़कों पर उतरने का मन बना रहे हैं। बिनगदेरा में तलड़ा के ग्रामीणों की सुरक्षित आवाजाही के लिए कमल नदी पर बनी आरसीसी पुलिया साल 2023 की आपदा में बह गई थी। ग्रामीण तभी से स्थायी पुलिया की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक भी पुलिया नहीं बन पाई है। पुलिया की मांग के लिए तलड़ा के ग्रामीणों ने पुरोला रोड़ पर जाम लगा कर धरना प्रदर्शन किया था। मौके पर पहुंचे पुरोला के तहसीलदार और लोनिवि ने आश्वासन देकर जाम खुलवाया था, लेकिन तीन माह बाद भी कोई प्रगति ना दिखने पर लोगों में फिर से आंदोलन का सुगबुगाहट है।

कमल नदी पर बनी पुलिया बह जाने से तलड़ा के लोग दो सालों से बरसात के समय जोखिम भरी आवाजाही कर रहे हैं। बरसात के समय काश्तकार नकदी फसलों को मंडी नहीं पहुंचा पा रहे हैं। ग्रामीण नदी पर अस्थायी पुलिया बना कर नदी पार करते हैं। जलस्तर बढ़ने से कई बार पुलिया बह जाती है। ऐसे समय पर ग्रामीण मानव श्रृंखला बना कर नदी पार करते हैं। महिलाएं फसलों को पीठ पर रखकर सुनारा छानी तक पहुंचाती हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर ग्रामीण सबसे ज्यादा चिंतित हैं. परिजनों को चिंता रहती है कि पुलिया पार करते समय कोई अप्रिय घटना ना घटित हो जाए। दोस्तों, उत्तराखंड की हकीकत आज भी वही है – सरकारी दावे जितने बड़े, जमीन पर उतनी ही चुनौतीपूर्ण परिस्थितियाँ। मोरी और पुरोला विकासखंड के ग्रामीणों ने सुपिन और कमल नदियों पर खुद पुलिया बनाकर अपनी आवाजाही और सुरक्षा सुनिश्चित की। उन्होंने प्रशासन की अनदेखी के बावजूद साहस और पहल दिखाई। ये तस्वीर हमें याद दिलाती है कि जब सरकार और सिस्टम नजरअंदाज करते हैं, तो जनता ही अपने हक और सुरक्षा के लिए आगे आती है। उत्तराखंड की पहाड़ी जनता ने साबित किया है कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी हों, मेहनत, साहस और एकजुटता से समाधान निकाला जा सकता है। हम उम्मीद करते हैं कि संबंधित विभाग जल्द ही स्थायी पुल और जरूरी सुविधाएँ सुनिश्चित करे, ताकि ग्रामीणों को जोखिम न उठाना पड़े।