दोस्तो उत्तराखंड में बीते 25 सालों में बहुत कुछ बदलता आप क्या देखते हैं क्या है जो बदल गया क्या है ऐसा जो बदलने का दावा था और बदल नहीं पाया लेकिन मै एक बदलाव को लेकर बात करने के लिए आया हूं। अपनी इस यूकेडी की कहानी के जरिए। दोस्तो आखिर क्यों हाशिए पर चली गई बल उत्तराखंड आंदोलन वाली ये यूकेडी ये सवाल क्या आपके जहन में आता है मैरे तो आता है। जहां मैं झारखंड को देखता हूं तो उसका जन्म भी अपने उत्तराखंड के साथ ही हूआ था। वहां पर कैसे एक क्षेत्रीय पार्टी ने राष्ट्रीयपार्टियों की नांक दम कर रखा है। अपनी बोली भाषा अपनी वाली राजनीति यहां एक क्षेत्रिय दल करता आया है सालों से लेकिन उत्तराखंड में क्यों हालत खराब हो गई। एक मात्र मजबूत क्षेत्रीय दल की उस पर बात करूंगा, लेकिन उससे पहले जो मुझे आड दिखाई दे रहा है वो एक चिंगारी कहीं ना कहीं सुलगती दिख रही है। जहां कुछ नये युवाओं ने फिर से अलख जगाने का काम किया है। कई तस्वीरें ऐसी भी आई जहां यूकेडी का कुनबा बढता दिखाई दिया लेकिन वोट नहीं मिला मिला भी तो उतना नहीं कि सरकार बना पाएं आखिर क्यो। दोस्तो राज्य आंदोलन की जननी कही जाने वाली राजनीतिक पार्टी ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ (यूकेडी) फिर से अपने अस्तित्व और भूमिका पर मंथन कर रही है। दोस्तो पार्टी का मानना है कि राज्य के गठन के पीछे जिन मूल मुद्दों का सपना था, वे आज भी अधूरे हैं। यूकेडी अब एक बार फिर उसी जनाधार को जगाने और नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में है।
दोस्तो जरा गौर कीजिए तब अब कहा खड़़ा है आपका एक ही क्षेत्रीय दल। दोस्तो, उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना 1979 में हुई थी, जब राज्य आंदोलन की मांग संगठित रूप ले रही थी. पहाड़ों की भौगोलिक और सामाजिक उपेक्षा के खिलाफ यह पहला क्षेत्रीय राजनीतिक मंच बना जिसने अलग उत्तराखंड राज्य का सपना जनता के बीच पहुंचाया। 2000 में राज्य गठन के बाद यूकेडी को सत्ता में अपनी जगह बनाने का अवसर मिला, लेकिन आंतरिक मतभेदों और नेतृत्व संकट के कारण दल कमजोर पड़ा। अब वाला सवाल कि सियासी सीन में यूकेडी आखिर हाशिए क्यों है? दोस्तो आज यूकेडी के पास विधानसभा में कोई सीट नहीं है, पर पार्टी अब भी अपने मूल मुद्दों, स्थायी राजधानी, मूलनिवास कानून, पलायन, शिक्षा और रोजगार को लेकर सक्रिय है। उत्तराखंड के सियासी सीन में यूकेडी आखिर हाशिए क्यों है? पार्टी के लोगों का मानना है कि सत्ता तक पहुंचने का रास्ता फिर से जनता के बीच से होकर ही जाएगा। क्या पार्टी अपने मूल एजेंडे से भटक गई है, दोस्तो यूकेडी आज भी उन तमाम मुद्दों को लेकर सड़कों पर आंदोलित है जैसे कि शुरुआती दौर में थी। जब राज्य की धारणा थी, तब उत्तराखंड क्रांति दल ने मूलभूत समस्याओं को रखा था। चाहे वो भू-कानून हो, स्थायी राजधानी हो, रोजगार या शिक्षा और पलायन जैसे तमाम बिंदु हों। दोस्तो इन्हीं मुद्दों को लेकर उत्तराखंड की नींव रखी गई थी। उत्तर प्रदेश का पहाड़ी इलाका विकास की अवधारणा में पिछड़ रहा था। लखनऊ से उस विकास की योजना पूरी तरह लागू नहीं हो पा रही थी। इसलिए अलग राज्य की मांग रखी गई। अब दोस्तो यहां एक बात बार-बार सामने आती है कि लोगों की नाराजगी है। नाराजगी इसलिए भी है कि राज्य बनने के बाद पार्टी के कुछ विधायक तो आए, लेकिन वो संगठित नहीं रह पाए. जनता का नाराज होना स्वाभाविक था. जिस दल ने राज्य बनाया, उसे सत्ता तक पहुंचना था लेकिन वहां तक नहीं पहुंच सका. आंतरिक मतभेदों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने संगठन को कमजोर किया फिर भी जनता का भावनात्मक लगाव आज भी उत्तराखंड क्रांति दल के साथ दिखता है। क्या अब धीरे-धीरे नाराजगी खत्म हो रही है, क्या अब आने वाले चुनाव बलदने के बाद यूकेडी का वक्त बी बदलेगा।
दोस्तो एक हकीकत ये भी कि छोटा से प्रदेश पर 2 राजधानियों का बोझ है। मूल निवासी युवाओं को रोजगार में भी प्राथमिकता नहीं मिल रही है, बाहर के लोगों को अधिक अवसर मिल रहे हैं। इन सब मुद्दों को लेकर आज उत्तराखंड क्रांति दल पहले से ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है। हाल के विशेष सत्र में जो मुद्दे उठे, वो वही हैं जिन पर यूकेडी शुरू से आवाज उठाती रही है। यही कारण है कि अब राष्ट्रीय दलों को भी डर है कि यूकेडी फिर से एक प्रभावशाली रूप में लौट सकती है। अब दोस्तो वो सवाल कि क्या यूकेडी फिर से जन आंदोलन के रास्ते पर लौटेगी क्योंकि सत्ता का रास्ता जन आंदोलन से ही शुरू होता है। बीजेपी का उदाहरण सबके सामने है. 1990 के दशक में जब आडवाणी जी ने रथ यात्रा शुरू की, तो वही से उसका उदय हुआ था। लेकिन यूकेडी क्या कुछ ऐसा कर पाएगी। सियासी जानकार कहते हैं कि जनता के बीच जाना होगा, उनकी समस्याएं सुननी होंगी, समाधान के रास्ते तलाशने होंगे. जैसे उत्तराखंड राज्य की नींव जनता के संघर्ष से रखी गई थी, वैसे ही अब जब पार्टी जनता के बीच जाएगी, उनकी बात करेगी, तो जनता खुद जुड़ जाएगी और सत्ता का रास्ता भी वहीं से निकलेगा क्या सच में निकलेगा। आपको क्या लगता है कैसे निकलेगा।