उत्तराखंड में होगा सियासी बदलाव? | Uttarakhand News | CM Dhami | Dehradun News|

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उत्तराखंड की जनता पूछ रही है सवाल और जवाब आ रहा है RTI से! जिस सांसद निधि से पहाड़ों का विकास होना था, वो पहुंच गई उत्तर प्रदेश और हरियाणा! उत्तराखंड छोड़, दूसरे राज्यों में क्यों बंट रही है सांसद निधि? इस बड़े खुलासे का पर्दाफ़ाश, मेरी इस रिपोर्ट के जरिए देखिए। दोस्तो उत्तराखंड का हाल क्या है, क्या अब उत्तराखंड में किसी भी सासंद नीधी की जरूरत नहीं, अपने उत्तराखंड का दूसरे राज्यों को क्यों। वैसे अपने उत्तराखंड की हालत किसी से छिपी नहीं है, राज्य को 25 साल हो जाने के बाद भी कई सवाल शोर करते सुनाई देते हैं, कई क्षेत्रों में हम बहुत ज्यादा पिछड़ते जा रहे हैं। ऐसे में जब आपको ये खबर मिले की, आपके यहां से आपके द्वारा चुने गए सांसद अपनी सांसद नीधि उत्तराखंड के लोगों के लिए नहीं बल्की दूसरे राज्यों यानि यूपी हरियाणा के लिए खर्च कर रहे हैं तो आप क्या कहेंगे, एक सासंसद के बारे में बताने जा रहा हूं कि किसने कहां किया कितना खर्च दोस्तो उत्तराखंड की सांसद निधि का बड़ा हिस्सा यूपी और हरियाणा के विकास में खर्च हुआ है। आरटीआई से मिले दस्तावेजों के अनुसार सांसदों ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में ट्यूबवेल लगवाने, स्कूल व सामुदायिक भवन निर्माण और जल निकासी जैसे कार्यों के लिए 1.28 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। तो गजब हो रहा है, नेता उत्तराखंड के वोट उत्तराखंड का नाम उत्तराखंड का और काम दूसरे राज्यों के लिए क्यों दूसरे राज्यों पर आखिर दरियादिली दिखाई हमारे माननीय सांसदों ने वो देखिए।

दोस्तो दूसरे राज्यों के विकास पर दरियादिली दिखाने में टिहरी गढ़वाल सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह सबसे आगे हैं। उन्होंने यूपी के आगरा जिले पर विशेष ध्यान दिया है। इस जिले के लिए उन्होंने वित्तीय वर्ष 2024-25 में कुल एक करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की। इसमें फुटपाथ, पैदल मार्ग, पेयजल से जुड़े कार्य शामिल थे। दोस्तो अक्सर उत्तराखंड से दंडी कंडी में मरीजों को ले जाते वीडियो हमें दिख जाते हैं। जर्जर स्कूल, टूटे रास्ते, बिना मशीनों के सीएचसी भी दिख जाते हैं, लेकिन शायद उत्तराखंड के सांसदों को नहीं दिखते आरटीआई से सामने आया है कि उत्तराखंड के कई गांव आज भी पानी और बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं, जबकि सांसद निधि का एक हिस्सा उत्तर प्रदेश और हरियाणा में कामों पर जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक कुल मिलाकर करीब 1.28 करोड़ रुपये दूसरे राज्यों में आवंटित किए गए हैं। इन पैसों से ट्यूबवेल, स्कूल और सामुदायिक भवन, नालियों जैसे काम कराए जा रहे हैं लेकिन दूसरे सांसद साहब को देखिए, राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने हरियाणा में स्कूल, कॉलेज, सामुदायिक भवनों के लिए 25 लाख आवंटित किए। हालांकि नए नियमों के अनुसार 25 लाख की धनराशि अब सांसद किसी भी राज्य में खर्च कर सकते हैं। दोस्तो रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 13 अगस्त 2024 को मंत्रालय के नियमों में बदलाव के बाद सांसद अब देश के किसी भी हिस्से में काम सुझा सकते हैं, हालांकि एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 50 लाख की सीमा का जिक्र है लेकिन इससे इतर अपने प्रदेश के सासंदों को ये बीमारी पूरानी है। पूर्व राज्यसभा सांसद तरुण विजय के कार्यकाल (2010-16) के दौरान स्वीकृत धनराशि 10 दिसंबर 2025 को आवंटित की गई। उन्होंने यूपी के गोरखपुर में जल निकासी, सड़कों आदि के लिए तीन लाख रुपये स्वीकृत किए थे। दोस्तो आरटीआई में इस बात का खुलासा होने पर लोग तमाम सवाल उठा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर टिहरी सांसद माला राजलक्ष्मी शाह का कहना है कि उत्तराखंड के लोग पूरे देश में रहते हैं। कुछ लोग अपनी जरूरतों के लिए मेरे पास आए थे तो कुछ कार्यों को मंजूरी दी गई है। कहा कि टिहरी का विकास उनकी प्राथमिकता है और सांसद निधि का अधिकांश हिस्सा यहीं खर्च होता है। दोस्तो अल्मोड़ा से लोकसभा सांसद अजय टम्टा ने अपने संसदीय क्षेत्र से इतर नैनीताल जिले पर दरियादिली दिखाई है। उन्होंने नैनीताल जिले में स्कूल व कॉलेजों में कमरों और हॉल के निर्माण लिए 27 जून 2025 को पांच लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की थी। दूसरी राज्यों में निधि खर्च करने की छूट नियमों में हुए बदलाव से संभव हुई है। केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के 13 अगस्त 2024 के पत्र के अनुसार, पीएम फंड खर्च में संशोधन किए गए हैं। अब सांसद देश में कहीं भी विकास कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं। लेकिन, एक वित्तीय वर्ष में इसकी अधिकतम सीमा 50 लाख है। अब इस पूरे मामले में विपक्षी दल बीजेपी को और संसदों को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। अब सवाल उठना भी लाजमी है यहां कुछ नियमों का हवाला जरूर दिया जा रहा है, दोस्तो नियमों में छूट हो सकती है, लेकिन सवाल अधिकार का नहीं, प्राथमिकता का है। जब अपने ही राज्य में लोग इलाज के लिए डोली पर जाते हों, स्कूल जर्जर हों और सीएचसी बिना संसाधनों के चल रहे हों, तब सांसद निधि का बाहर जाना लोगों को चुभता है, क्योंकि ये निधि कागज की नहीं, जनता की है। और जनता की जरूरतें सबसे पहले अपने घर में दिखती हैं।