संघर्ष जारी है जी हां दोस्तो एक ऐसी तस्वीर पर बात करने के लिए आया हूं जो बताने के लिए काफी है कि वादों और दावों की जमीनी हकिकत असल में क्या है। थराली वाली आपदा तो आपको याद होगी ना, वहीं की बात करने आया हूं एक तस्वीर के साथ जहां रास्ते बदहाल, स्वास्थ्य सेवाएं ठप दिखाई दे रही हैं। Uttarkashi Dharali Disaster दगड़ियो अपने उत्तराखंड में आपदा को एक महीना बीत चुका है, लेकिन हालात अब भी जस के तस हैं बल ये मै नहीं कह रहा हूं। खासकर चमोली जिले का थराली ब्लॉक — जहां आज भी बदहाल रास्ते, टूटी पुलियाएं और ठप पड़ी स्वास्थ्य सेवाएं लोगों की तकलीफों की कहानी बयां कर रही हैं। पहाड़ों पर जख्म गहरे हैं और मरहम की उम्मीदें कमजोर दिखाई दे रही हैं। दोस्तो लोग आज भी जान जोखिम में डालकर इलाज के लिए मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं, बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पा रहे, और गांव-के-गांव अब भी बेसहारा महसूस कर रहे हैं। आखिर क्यों नहीं पहुंच रही मदद? और कब तक ये संघर्ष यूं ही जारी रहेगा?दोस्तो एक तरफ आज सभी लोग चमोली जिले में आई आपदा की तस्वीरों को देख कर दर्द में कि क्या हुआ होगा बल यहां पर वो लापता लोग कहां गए होंगे, जिनकी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है।
दोस्तो आसमानी आफत से जिंदगियां तहस- नहस, सैलाब में बहते गांव के गांव, टूटी सड़कें और स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह से ठप्प। उत्तराखंड की नियति में मानो आफत ही लिखी है। 22 अगस्त को चमोली जिले के थराली और आसपास के क्षेत्रों में भारी तबाही देखने को मिली थी, जिसके बाद यहां के रास्ते बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। यहां आज भी मरीजों को अस्पताल पहुँचाने के लिए डंडी–कंडी का सहारा लेना पड़ रहा है। मुरझाया चेहरा, चेहरे पर पीलापन और पैरों की सूजन के साथ चलने में असमर्थ बुजुर्ग बीमार महिला को बारिश के बीच ग्रामीणों ने कंधे पर लेकर अस्पताल तक पहुंचाया। सांस की बीमारी से पीड़ित बुजुर्ग महिला और परिजनों के लिए आपदा के बाद भी यह असुविधाएं न भरने वाले जख्मों की तरह है। दोस्तो थराली आपदा को लगभग महीनाभर होने वाला है, लेकिन बरसात, भूस्खलन, टूटे रास्ते और असुविधाओं के चलते यहां के लोगों का जीवन कठिन हो गया है। यहां स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक है. ग्राम पंचायत कुनी पार्था की रहने वाली एक बुजुर्ग महिला सांस की मरीज है, जिन्हें अचानक दिक्कत होने लगी तो उन्हें परिजनों के साथ ही गांव वालों ने 17 किलोमीटर तक डंडी–कंडी के सहारे बारिश के बीच खराब कच्चे रास्तों से गुजरते हुए अस्पताल पहुँचाया।
दगड़ियो लोग कहते हैं कि आसपास कोई स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं है, न कोई मेडिकल कैम्प है और रास्ते टूटे होने के साथ ही बंद होने के कारण मरीजों को इसी तरह खतरनाक रास्तों से कंधे पर खाट पर या डंडी–कंडीलाना पड़ता है। कई मीलों पथरीले ढाल वाले कच्चे रास्तों से पैदल यात्रा के बाद बुजुर्ग महिला को थराली तक पहुँचाया गया। दोस्तो यहां मै आपको बता दूं कि 22 अगस्त को आई तबाही में थराली का सीएचसी यानी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी तबाह हो गया था, हलांकि दूसरे स्थान पर अस्थायी रूप से इसे संचालित किया जा रहा है लेकिन वहां की स्वास्थ्य सुविधाएं भी बदहाल हैं। यहां न तो पर्याप्त दवाएं उपलब्ध हैं और न ही डॉक्टर्स और स्टाफ हैं, इसलिए मजबूरन लोगों को देहरादून या श्रीनगर जैसे शहरों का रुख करना पड़ता है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि थराली विधायक भूपाल राम टम्टा को हमने हमारी परेशानियों को बताया था लेकिन विधायक की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए हैं, तो करनी और कथनी में फर्क है क्या…दोस्तो थराली में हालात अब भी बदले नहीं है। लोग जूझ रहे हैं — हर दिन, हर मोड़ पर सड़कों की हालत सवाल पूछ रही है, और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी चिंता बढ़ा रही है, आपदा के बाद राहत की बातें तो बहुत हुईं, लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी बदहाल है। सवाल ये नहीं कि मदद कब आई — सवाल ये है कि क्या वो मदद ज़रूरतमंदों तक पहुँची? और अगर नहीं पहुँची, तो जिम्मेदार कौन? सरकार से लेकर सिस्टम तक।