मिशन 27 पर BJP का फोकस! | CM Dhami | Mahendra Bhatt | Assembly Elections2027 | Uttarakhand News

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उत्तराखंड की सियासत में अब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ जोर पकड़ रही हैं। बीजेपी ने मिशन 27 को ध्यान में रखते हुए अपने विधायकों के कामकाज और लोकप्रियता का तीन स्तरीय गोपनीय सर्वे शुरू कर दिया है। इस सर्वे का मकसद सिर्फ कामकाज की समीक्षा नहीं, बल्कि कौन रहेगा टिकट पाने के काबिल—यह तय करना है।उत्तराखंड में मिशन 27 के लिए पार्टी किसे मौका देती है और किन विधायकों के कदम कांटे के होते दिख रहे हैं यह चर्चा अब राजनीतिक गलियारों में गूँजने लगी है।देखिए, बीजेपी की इस रणनीति से चुनावी मैदान में क्या असर पड़ सकता है। दोस्तो उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी लगभग एक साल का समय शेष है, लेकिन सियासी हलचल अभी से तेज हो गई है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने ‘मिशन 27’ के तहत अपनी चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी की ओर से साफ संकेत दिए गए हैं कि इस बार सिटिंग विधायकों की टिकट उनकी परफॉर्मेंस रिपोर्ट पर निर्भर करेगी। यानी 2027 के चुनाव से पहले हर विधायक को अपने क्षेत्र में सक्रियता, संगठनात्मक मजबूती और जनसंपर्क के आधार पर खुद को साबित करना होगा।

इधर खबर ये की बीजेपी तीन स्तरीय गोपनीय सर्वे करेगी और अपने विधायकों को टिकट को फिर फाइनल करेगी। दोस्तो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट इस कोर कमेटी को बेहद महत्वपूर्ण बता रहे हैं जिसका चार पाँच सालों में सरकार और संगठन को ख्याल भी नहीं आया। एक समय राज्यों में भाजपा की कोर कमेटी पर मीडिया और राजनीतिक विश्लेषको की नज़र रहती थी, लेकिन अब नहीं ! लेकिन यह देखना सबसे दिलचस्प होगा कि इस बार की कोर कमेटी में पूर्व सीएम और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष होंगे या फिर धामी और महेंद्र भट्ट की कमेटी कुछ अलग हटके होगी। हां इतना जरूर है कि इससे पहले ये बैठक कब हुई थी। 14 फरवरी को उत्तराखंड भाजपा कोर कमेटी की बैठक देहरादून में होगी। इससे पहले कोर कमेटी की पिछली बैठक कब हुई थी बीजेपी वाले खुद नहीं जानते या फिर बतना नहीं चाहते खेर ये मामला थोड़ा अलग लगता बात बीजेपी के विधायकों के काम काज के सवाल का है। आपको क्या लगता है आप कमेंट के जरिए बताइयेगा जरूर, लेकिन दोस्तो खबर क्या है वो मैं आपको बताता हूं। खबरों के मुताबिक दोस्तो बीजेपी ने राज्य में तीन स्तरीय गोपनीय सर्वे शुरू किया है। इन सर्वे में विधायकों के कामकाज, जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता, संगठन के साथ तालमेल, क्षेत्रीय विकास कार्यों की प्रगति और संभावित सत्ता विरोधी रुझान जैसे पैमानों को शामिल किया गया है। पार्टी किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही, खासकर तब जब बीते कुछ महीनों में पार्टी के भीतर ही कुछ नेताओं द्वारा सरकार और संगठन पर सवाल खड़े किए गए, जिससे असहज स्थिति बनी।

इसके अलावा दोस्तो बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट पहले ही संकेत दे चुके हैं कि भाजपा का मूल मंत्र ‘विनिंग एबिलिटी’ है और टिकट उसी को मिलेगा जिसकी जीत की संभावना सबसे अधिक होगी। वहीं कई विधायक कह ये कह रहे हैं कि पार्टी केवल एक सर्वे के आधार पर निर्णय नहीं लेती, बल्कि समय-समय पर विधायकों को फीडबैक देती है और संगठन के प्रति 100 प्रतिशत योगदान की अपेक्षा रखती है। ऐसे में जो रेड’ जोन में रहने वाले विधायक हैं उनके टिकट पर खतरा मंडराएगा वो कैसे। दोस्तो राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की यह रणनीति दोहरे मकसद से जुड़ी है। एक तरफ संभावित एंटी-इंकम्बेंसी को नियंत्रित करना और दूसरी तरफ संगठनात्मक अनुशासन को मजबूत रखना। दोस्तो उधर पार्टी सूत्र ये बताते हैं कि सर्वे रिपोर्ट में विधायकों को ‘ग्रीन’, ‘येलो’ और ‘रेड’ जोन में वर्गीकृत किया जा सकता है। माना जा रहा है कि जो विधायक ‘रेड जोन’ में पाए जाएंगे, उनकी टिकट पर खतरा मंडरा सकता है। इधर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस पूरी कवायद पर तंज कसना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने कहना शुरू कर दिया है कि बीजेपी ने अपने मंत्रियों और विधायकों को पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वे अपनी-अपनी विधानसभा में सक्रिय रहें, जिससे पार्टी के भीतर ही असमंजस की स्थिति बन गई है। कांग्रेस इसे भाजपा के भीतर असुरक्षा और संभावित हार के डर से जोड़कर देख रही है।

दोस्तो सियासी नजरिए से देखें तो 2027 का चुनाव केवल सत्ता की पुनरावृत्ति का सवाल नहीं, बल्कि संगठनात्मक पकड़ और नेतृत्व की स्वीकार्यता की परीक्षा भी होगा। भाजपा जहां सर्वे के जरिए उम्मीदवार चयन की वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाने का दावा कर रही है, वहीं विपक्ष इसे आंतरिक असंतोष का संकेत बता रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सर्वे की अंतिम रिपोर्ट में कितने विधायक ‘ग्रीन जोन’ में आते हैं और कितनों की राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आती है। तो दोस्तों, उत्तराखंड में मिशन 27 की तैयारी अब पूरी तरह सक्रिय हो गई है। बीजेपी ने अपने विधायकों की तीन स्तरीय गोपनीय सर्वे के जरिए कामकाज, संगठनात्मक सक्रियता और जनता में स्वीकार्यता को आंकना शुरू कर दिया है इस सर्वे के नतीजे तय करेंगे कि कौन विधायक ‘ग्रीन जोन’ में सुरक्षित है और किनकी टिकट पर खतरा मंडरा सकता है। सिर्फ चुनाव की रणनीति नहीं, बल्कि यह पार्टी के संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व की स्वीकार्यता की भी परीक्षा होगी। विपक्ष इसे पार्टी के भीतर असुरक्षा और संभावित मतभेद का संकेत बता रहा है, जबकि बीजेपी इसे वैज्ञानिक और निष्पक्ष प्रक्रिया बता रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि कौन विधायक चुनावी मैदान में मजबूत बने रहते हैं और कौन अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए लड़ाई लड़ेंगे। यानी 2027 से पहले उत्तराखंड की सियासत में बड़ी क्लियरेंस और बड़ी चालें देखने को मिलने वाली हैं।