देश के लिए जान कुर्बान एक नहीं, दो शहादतें और ग़म में डूब गया पूरा प्रदेश, भारत माता का एक नहीं दो सपूत अपने फर्ज़ को निभाते हुए अमर हो गये जिस घर से तिरंगा लिपटकर आया पार्थिव शरीर,वहीं से उठी भारत माता की जय की गूंज आँखें नम है। Shaheed Gajendra Singh Bageshwar सीना गर्व से चौड़ा है क्योंकि ये शहादत सिर्फ़ एक या दो परिवार की नहीं,पूरे प्रदेश की है। आज में आपको बताने के लिए आया हूं देवभूमि के दो वीरों गाथा से रूबरू कराने के लिए जिन्होंने देश के लिए सब कुछ कर दियान्योछावर। जी हां दोस्तो वीरों की भूमि से दो जाबांज देश के लिए शहीद हो गए, दोस्तो खबर भी एक साथ आई और अंत्योत्थी भी एक साथ हुई। दोस्तो उत्तराखंड के लिए एक पल के दुख का पहाड़ टूट गया तो दूसरे ही पल सीना गर्व से चौड़ा भी हो गया। एक खबर जो रूद्रप्रयाग जिले के रहने वाले वाले 15 गढ़वाल राइफल्स के जवान हवलदार रविंद्र सिंह की आई अरुणाचल प्रदेश से और दूसरी खबर बागेश्वर जिले के कपकोट विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत गैनाड़ के बीथी-पन्याती गांव के निवासी हवलदार गजेन्द्र सिंह गढ़िया को लेकर जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले से आई जहां वो ड्यूटी के दौरान आतंकवादियों से हुई मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हो गए। दोस्तो इन दोनों दुखद खबर ने पूरे प्रदेश को गम में डूबोने का काम किया। समूचे प्रदेश दोस्तो एक एक कर दोनों जाबाजों के बारे में आपको बताता हूं। दोस्तो पहले बात करता हूं रुद्रप्रयाग जिले के लाल की सहादत की। दोस्तो 15 गढ़वाल राइफल्स के जवान हवलदार रविंद्र सिंह की अरुणाचल प्रदेश में ड्यूटी के दौरान जिंदगी चली गई।
घटना के बाद से शहीद जवान के परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है वहीं उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। दोस्तो रुद्रप्रयाग जिले के दशज्यूला पट्टी के आगर गांव के निवासी 36 वर्षीय रविंद्र सिंह राणा 15 गढ़वाल राइफल्स में हवलदार के पद पर तैनात थे। दरअसल रविंद्र सिंह राणा वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश के अलोंग में अपनी तैनाती दे रहे थे। वहीं बीते 18 जनवरी 2026 को ड्यूटी के दौरान उन्हे हार्ट अटैक आया जिसके कारण उनकी जिंदगी चली गई। घटना की जानकारी मिलते ही जवान के परिजनों में कोहराम मच गया वहीं पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया। दोस्तो यहां बता दूं कि शहादत को प्राप्त हुए जवान अपने पीछे एक बेटा और एक बेटी को रोता बिलखता छोड़ गए है। दोस्तो रविंद्र के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शनों के लिए उनके पैतृक गांव लाया गया, जहां पर अलकनंदा और मंदाकिनी संगम रुद्रप्रयाग में उन्हें पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। दोस्तो रविंद्र वर्ष 2008 में 15 गढ़वाल राइफल में भर्ती हुए थे जो बेहद सरल स्वभाव के थे.. जो हमारे बीत नहीं हैं अरुणाचल प्रदेश में मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए रुद्रप्रयाग के हवलदार रविंद्र सिंह को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। अलकनंदा–मंदाकिनी के संगम पर बड़े भाई दिगंबर राणा और छोटे भाई राहुल राणा ने उन्हें मुखाग्नि दी। हवलदार रविंद्र सिंह को विदाई देते वक्त जनसैलाब उमड़ पड़ा। इस दौरान पूरा गांव ‘भारत माता की जय’ और ‘शहीद रविंद्र सिंह अमर रहे’ के नारों से गूंज उठा। ग्रामीणों, रिश्तेदारों समेत तमाम लोगों ने नम आंखों से अपने वीर सपूत को अंतिम सलामी दी. इसके बाद जवान का अंतिम संस्कार रुद्रप्रयाग संगम पर पूरे सैन्य सम्मान के साथ संपन्न हुआ।
अब बात दूसरी शहादत की दोस्तो जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान कपकोट के वीर सपूत हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया ने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया। 43 वर्षीय गजेंद्र सिंह गढ़िया, , भारतीय सेना की टू-पैरा कमांडो यूनिट में तैनात थे। 18 जनवरी को श्रीपुरा क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में उनकी वीरगति की सूचना मिलते ही तहसील कपकोट के ग्राम गैंनाड़ (बीथी) में शोक की लहर दौड़ गई। हर आंख नम है और हर दिल अपने वीर बेटे पर गर्व के साथ गम से भरा हुआ है। बलिदानी गजेंद्र सिंह गढ़िया परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। घर की माली हालत पहले से ही ठीक नहीं थी। माता-पिता खेती-किसानी से जीवनयापन करते हैं, जबकि छोटा भाई एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक है, जहां से मिलने वाला मानदेय परिवार की जरूरतों के लिए नाकाफी है। बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए पत्नी लीला गढ़िया देहरादून में किराये के मकान में रह रही थीं। उनके दोनों पुत्र राहुल और धीरज कक्षा चार में पढ़ते हैं, जिन्हें अब पिता का साया हमेशा के लिए खोना पड़ा है। देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए बलिदान हुए वीर सपूत गजेंद्र सिंह गढ़िया का पार्थिव शरीर 20 जनवरी को हेलीकाप्टर से केदारेश्वर मैदान लाया लगा तो पूरा इलाका शोक में डूब गया। पंचतत्व में विलीन हुए हवलदार गजेंद्र सिंह, जम्मू कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए थे शहीद तो दोस्तों उत्तराखंड ने एक साथ दो वीर सपूतों को खोया है। एक ओर अरुणाचल की धरती पर कर्तव्य निभाते हुएल रुद्रप्रयाग के हवलदार रविंद्र सिंह अमर हो गए, तो दूसरी ओर जम्मू–कश्मीर के किश्तवाड़ में आतंकियों से लोहा लेते हुए कपकोट के वीर गजेंद्र सिंह गढ़िया ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी ये सिर्फ़ दो नाम नहीं है ये दो परिवारों का उजड़ा आंगन है, दो बच्चों के सिर से उठा पिता का साया है, और पूरे प्रदेश की आंखों में नम गर्व है। उत्तराखंड की वीर भूमि ने फिर साबित कर दिया कि यहां के लाल सरहदों पर नहीं, बल्कि इतिहास में अमर होते हैं। आज प्रदेश शोक में है, लेकिन सिर गर्व से ऊँचा है क्योंकि हवलदार रविंद्र सिंह और हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया जैसे वीर कभी मरते नहीं, वो भारत माता की जय में हमेशा अमर रहते हैं। शत-शत नमन वीर सपूतों को हमारा सलाम।