Dehradun जब सिस्टम हुआ फेल! DM आए तो बची जान | Uttrakashi DM | Dehradun DM | Uttarakhand News

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जब सिस्टम फेल हो जाए, तब इंसानियत ही सबसे बड़ा सहारा बनती है और उत्तराखंड में ऐसा ही एक मामला सामने आया है। एक नन्हीं जान अस्पताल के बाहर जिंदगी और मौत से जूझ रही थी, लेकिन दो जिलों के डीएम ने वक्त पर हस्तक्षेप कर उसे नई जिंदगी दे दी, जहां एक ओर सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं, वहीं इन अधिकारियों की संवेदनशीलता ने उम्मीद की नई किरण जगाई है। आखिर क्या है पूरा मामला और कैसे बची इस नन्हीं परी की जान, मेरी इस रिपोर्ट में पूरी खबर दोस्तो ये खबर बेहद ही संवेदनशील है, रुह कंपा देगी लेकिन बाद में जो हुआ उसको देख कर आप भी दंग रह जाएंगे। दोस्तो उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से एक बेहद चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां पीलिया से पीड़ित एक नवजात को देहरादून के एक निजी अस्पताल में आयुष्मान कार्ड के तहत इलाज देने से इनकार कर दिया गया। अस्पताल प्रबंधन ने इलाज शुरू करने से पहले परिजनों से 25 हजार रुपये जमा करने की मांग की, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई। दोस्तो जानकारी के अनुसार, नवजात का जन्म उत्तरकाशी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चिन्यालीसौड़ में हुआ था। जन्म के बाद बच्चे में पीलिया के लक्षण दिखाई दिए। परिजन पहले उसे जिला अस्पताल लेकर गए, लेकिन हालत में सुधार न होने पर उसे हायर सेंटर देहरादून रेफर किया गया। वहां एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज को लेकर यह विवाद सामने आया।

दोस्तो देहरादून के निजी अस्पताल ने आयुष्मान कार्ड को स्वीकार करने से इनकार करते हुए पहले 25 हजार रुपये जमा कराने की शर्त रख दी। गरीब परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे, जिसके चलते नवजात का इलाज शुरू नहीं हो पा रहा था। इस कारण बच्चे की जान पर संकट मंडराने लगा और परिजन असहाय नज़र आए। ऐसे में दोस्तो देकिए हुआ क्या, दोस्तो मामले की जानकारी मिलते ही उत्तरकाशी के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य और देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल ने तुरंत संज्ञान लिया। दोनों अधिकारियों ने मानवता का परिचय देते हुए अस्पताल को तत्काल इलाज शुरू करने के निर्देश दिए। प्रशासन की इस त्वरित कार्रवाई के बाद नवजात का इलाज शुरू हो सका और उसकी जान बचाई जा सकी। वहीं दोस्तो मुख्य चिकित्साधिकारी अनुसार, नवजात के जन्म के बाद परिजन निर्धारित अवधि तक अस्पताल में नहीं रुके और बिना पूरी निगरानी के बच्चे को घर ले गए।

इसके बाद जब बच्चे की तबीयत बिगड़ी, तो वे उसे लेकर अलग-अलग अस्पतालों में गए, लेकिन जरूरी दस्तावेज और डिस्चार्ज पेपर साथ नहीं होने के कारण भी इलाज में दिक्कतें आईं। दोस्तो इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था और आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार की महत्वाकांक्षी योजना होने के बावजूद अगर जरूरतमंदों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है, तो यह एक गंभीर चिंता का विषय है। उत्तरकाशी के इस मामले ने यह साफ कर दिया है कि जमीनी स्तर पर योजनाओं का सही क्रियान्वयन कितना जरूरी है। यदि समय रहते प्रशासन हस्तक्षेप न करता, तो एक मासूम की जान जा सकती थी। यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और जवाबदेही की सख्त जरूरत को दर्शाती है तो दोस्तों, यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सिस्टम की हकीकत और इंसानियत की मिसाल दोनों है। जहां एक तरफ इलाज के लिए जूझता गरीब परिवार और सवालों के घेरे में स्वास्थ्य व्यवस्था है, वहीं दूसरी तरफ दो जिलाधिकारियों की संवेदनशीलता ने एक नन्हीं जान को बचा लिया। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि योजनाएं तभी सफल हैं, जब उनका लाभ ज़मीन पर जरूरतमंद तक समय पर पहुंचे। अब जरूरत है जवाबदेही तय करने की, ताकि भविष्य में किसी मासूम की जिंदगी यूं दांव पर न लगे।