Nanda Rajjat क्यों खत्म हुई कुमाऊं की भागीदारी? | Nainital Uttarakhand News | Nanda Rajjat

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उत्तराखंड की पहचान मानी जाने वाली नंदा राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और इतिहास का अनोखा संगम है। हर 12 साल में निकलने वाली यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं की साझा लोक आस्था को जोड़ती है, जिसमें समय के साथ आए बदलाव भी अपनी कहानी कहते हैं। Chamoli Nanda Devi Raj Jat Yatra जी हां दोस्तो उत्तराखंड की पावन धरती पर जब भी ‘नंदा राजजात यात्रा’ का नाम लिया जाता है, तो आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम हमारे सामने जीवंत हो उठता है। हर बार 12 वर्षों में होने वाली यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि पहाड़ की लोक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। आज हम आपको ले चलेंगे इस यात्रा के कठिन हिमालयी रास्तों, भावनात्मक जुड़ाव और उत्तराखंड की साझा आस्था की कहानी में। दोस्तो उत्तराखंड की धरती पर जब भी नंदा राजजात यात्रा का नाम आता है, तो आस्था, परंपरा और संस्कृति का संगम अपने आप सामने आ जाता है। हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाली यह यात्रा राज्य की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की लोक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। पहाड़ों में मां नंदा को बेटी के रूप में पूजा जाता है। नंदा राजजात यात्रा को उनकी मायके से ससुराल तक की विदाई से जोड़ा जाता है। इसी भावनात्मक जुड़ाव के कारण यह यात्रा श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास मानी जाती है।

दोस्तो नंदा राजजात यात्रा का मुख्य मार्ग गढ़वाल क्षेत्र के चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होता है। यहां से यात्रा कठिन हिमालयी रास्तों से गुजरते हुए रूपकुंड और होमकुंड तक पहुंचती है। बर्फीले दर्रे, ऊंचे पहाड़ और चुनौतीपूर्ण रास्ते इस यात्रा को और भी विशेष बना देते हैं। परंपरा के अनुसार इस यात्रा में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों के दल शामिल होते रहे हैं। इसी वजह से नंदा राजजात यात्रा पूरे उत्तराखंड की साझा आस्था का प्रतीक मानी जाती है, लेकिन यहां एक सवाल यहां सबके जहन में बार-बार आता है कि इस यात्रा में कुमाऊं की भागीदारी का 1925 ऐसा क्या हुआ कि कुमांऊ की भागीदारी पर असर हुआ। दोस्तो अल्मोड़ा नंदा देवी मंदिर समिति के अध्यक्ष के अनुसार, वर्ष 1925 के बाद नंदा राजजात यात्रा में कुमाऊं क्षेत्र की भागीदारी लगभग समाप्त हो गई थी। इसके पीछे एक ऐतिहासिक कारण रहा। दोस्तो उस समय इस यात्रा का नेतृत्व चंद वंश के राजा आनंद सिंह किया करते थे। राजा आनंद सिंह कुमाऊं क्षेत्र से यात्रा का प्रतिनिधित्व करते थे लेकिन स्वास्थ्य कारणों से उनके निधन के बाद कुमाऊं से कोई संगठित नेतृत्व सामने नहीं आ सका। इसके चलते धीरे-धीरे कुमाऊं की सक्रिय भूमिका इस यात्रा से खत्म हो गई। उस दौर में यातायात और संचार के साधनों की भारी कमी थी. इसके साथ ही ब्रिटिश शासन का प्रभाव भी रहा। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों से लोगों का एकजुट होकर यात्रा में शामिल होना बेहद कठिन हो गया। इन सभी कारणों से 1925 के बाद नंदा राजजात यात्रा मुख्य रूप से गढ़वाल क्षेत्र तक सीमित होकर रह गई। अब यहां नया मोड़ तब इस यात्रा में आया जबू वर्ष 2000 में फिर जुड़ी कुमाऊं की कड़ी।

जी हां दोस्तो वर्ष 2000 में एक बार फिर नंदा राजजात यात्रा में कुमाऊं की सहभागिता शुरू हुई। अल्मोड़ा नंदा देवी परिसर समिति के अनुसार, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली जोशी के आदेश पर कुमाऊं से एक प्रतिनिधिमंडल यात्रा में शामिल हुआ. यह कुमाऊं के लिए एक ऐतिहासिक पल था। इससे वर्षों पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करने का रास्ता खुला और दोनों क्षेत्रों की साझा आस्था को नई मजबूती मिली। दोस्तो आज नंदा राजजात यात्रा लाखों श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और परंपरा का प्रतीक बनी हुई है। कठिन पहाड़ी रास्तों और प्राकृतिक चुनौतियों के बावजूद श्रद्धालु पूरे समर्पण के साथ इस यात्रा में शामिल होते हैं। नंदा राजजात यात्रा उत्तराखंड के लोगों के लिए सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि मां नंदा के प्रति श्रद्धा, सांस्कृतिक एकता और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का जीवंत स्वरूप है। “यकीनन, नंदा राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, आस्था और परंपरा का जीवंत प्रतीक है। कठिन पहाड़ों और प्राकृतिक चुनौतियों के बावजूद, लाखों श्रद्धालु अपने समर्पण और श्रद्धा के साथ इस यात्रा में शामिल होते हैं, और इसे पीढ़ियों तक जीवित रखते हैं। यही नंदा राजजात की असली महिमा है — एक यात्रा, जो हमें हमारी सांस्कृतिक एकता और मातृभूमि के प्रति प्रेम की याद दिलाती है।