तबाही के बीचे Nepal में चमत्कार या कुछ और? | Mahashaligram | Ayodhya | Uttarakhand News

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दोस्तो क्या नेपाल की पावन वादियों में साक्षात भगवान विष्णु का सबसे विशाल रूप प्रकट हो चुका है? सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि मुक्तिनाथ धाम के पास मिला है 17.5 करोड़ साल पुराना, 31 टन वजनी दुनिया का सबसे बड़ा शालिग्राम! दावा तो यह भी है कि इसी पत्थर से अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति बनी। लेकिन क्या ये दावा 100% सच है या इसके पीछे छिपा है कोई ऐसा राज, जिसे आपसे जानबूझकर छुपाया गया? आज इतिहास, विज्ञान और आस्था के इस सबसे बड़े सस्पेंस पर होगी बात। दोस्तो पिछले कुछ समय से इंटरनेट पर एक वीडियो और कुछ तस्वीरें आग की तरह फैल रही हैं। दावा किया जा रहा है कि नेपाल की पवित्र काली गंडकी नदी के पास, दुनिया का अब तक का सबसे विशाल शालिग्राम पत्थर मिला है। इसकी उम्र डायनासोर के काल यानी करीब साढ़े सत्रह करोड़ साल बताई जा रही है, लोग इसे कलयुग का सबसे बड़ा चमत्कार मान रहे हैं लेकिन ठहरिए! इंटरनेट की दुनिया में जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता।

दोस्तो जब हमारी टीम ने इस दावे की गहराई से पड़ताल की, तो सच कुछ और ही निकला। जिसे दुनिया ‘प्राकृतिक चमत्कार’ समझ रही है, वो असल में इंसानी कला का एक अद्भुत नमूना है, जी हां, नेपाल के मुस्तांग जिले के जोमसोम में, वहां के कलाकारों और ‘नेपाल ललित कला प्रज्ञा प्रतिष्ठान’ के मूर्तिकारों ने मिलकर एक विशाल प्राकृतिक चट्टान को तराशा है। उन्होंने इस चट्टान को हूबहू एक शालिग्राम का रूप दिया है, जिसकी ऊंचाई लगभग 22 फीट है। इसे वहां धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक स्मारक के रूप में बनाया गया है, न कि यह नदी से निकला कोई प्राकृतिक शालिग्राम है। दोस्तो अब सवाल उठता है कि इस कहानी में अयोध्या का नाम कहां से आया? दरअसल, लोग भ्रमित इसलिए हुए क्योंकि फरवरी 2023 में नेपाल की काली गंडकी नदी से ही दो बेहद विशाल और प्राचीन पत्थर, जिन्हें ‘देवशिला’ कहा गया, उन्हें उत्तर प्रदेश के अयोध्या लाया गया था। इनका वजन क्रमशः 26 टन और 14 टन था। दोस्तो माना जा रहा था कि इनसे भगवान राम और माता सीता की मूर्तियां बनेंगी। हालांकि, अयोध्या आई उन देवशिलाओं का, नेपाल के जोमसोम में बनी इस नई 22 फीट ऊंची कलाकृति से कोई सीधा संबंध नहीं है। दोनों अलग-अलग पत्थर हैं।

दोस्तो भले ही वायरल दावा भ्रामक हो, लेकिन शालिग्राम पत्थरों का इतिहास वाकई हैरान करने वाला है, धार्मिक रूप से शालिग्राम को भगवान विष्णु का साक्षात रूप माना जाता है। वहीं विज्ञान की भाषा में इन्हें ‘अमोनाइट’ (Ammonite) कहा जाता है। करोड़ों साल पहले, जहां आज हिमालय खड़ा है, वहां ‘टेथिस’ नाम का एक विशाल महासागर हुआ करता था। दोस्तो जब धरती की प्लेट्स आपस में टकराईं और हिमालय का निर्माण हुआ, तो उस समुद्र के जीव पहाड़ों में ही दफन हो गए और जीवाश्म (Fossils) बन गए। यही वजह है कि काली गंडकी नदी में मिलने वाले असली शालिग्राम पत्थरों की उम्र वाकई 14 से 17 करोड़ साल पुरानी होती है, जो जुरासिक काल का समय था। तो दोस्तो लब्बोलुआब यह है कि नेपाल में शालिग्राम की जो विशाल आकृति दिख रही है, वह आस्था और कला का एक बेहद खूबसूरत संगम तो है, लेकिन वह प्राकृतिक रूप से मिला पत्थर नहीं बल्कि इंसानी हाथों से तराशा गया एक गौरवशाली स्मारक है। आस्था अपनी जगह है, लेकिन अंधविश्वास और अफवाहों से बचना भी बेहद जरूरी है। अगर आपको यह प्रामाणिक जानकारी पसंद आई, तो इस वीडियो को लाइक करें, अपने दोस्तों के साथ शेयर करें