3 मुख्यमंत्री… 12 साल और सिर्फ धोखा! | Chamoli | Simli Hospital | CM Dhami | Uttarakhand News

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दोस्तो, तीन मुख्यमंत्री आए और चले गए, 12 साल गुजर गए, लेकिन सिमली को अस्पताल के नाम पर आज भी इंतजार ही मिला! आखिर पहाड़ की जनता को कब तक सिर्फ आश्वासन मिलते रहेंगे? अब ग्रामीणों ने भी आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है! करीब 200 किलोमीटर पैदल चलकर देहरादून पहुंचेंगे और 20 अक्टूबर को CM आवास का घेराव करेंगे! सवाल सीधा है—जब कागजों में अस्पताल की बात होती रही, तो धरातल पर इलाज की सुविधा क्यों नहीं मिली? क्या अब सरकार सुनेगी पहाड़ की पुकार, या इस बार भी ग्रामीणों को खाली हाथ लौटना पड़ेगा? दोस्तो क्या उत्तराखंड के पहाड़ों में इंसानी जान की कीमत नेताओं के झूठे वादों से भी कम हो चुकी है? क्या इस देवभूमि में एक अदद अस्पताल के लिए जनता को 200 किलोमीटर तक पैरों में छाले डलवाकर पैदल चलना पड़ेगा? चमोली जनपद के सिमली से शुरू हुई यह आक्रोशित पदयात्रा इस वक्त पूरे उत्तराखंड की सियासत में भूचाल ला चुकी है! शर्म आनी चाहिए हमारे सिस्टम को कि तीन-तीन मुख्यमंत्रियों की घोषणाओं के बावजूद सिमली में आज तक एक बेस अस्पताल नहीं बन पाया! विजय बहुगुणा ने वादा किया, हरीश रावत ने आश्वासन दिया और साल 2024 में वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी ऐलान कर दिया, लेकिन धरातल पर क्या मिला? सिर्फ ढाक के तीन पात! आज सूबे की जनता हुक्मरानों से सीधा सवाल पूछ रही है कि जब पहाड़ की मां-बहनें और बुजुर्ग इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं, तब आपकी ये बड़ी-बड़ी घोषणाएं किस तिजोरी में बंद रहती हैं?

दोस्तो यह सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, यह पहाड़ की लाचारी और उस लाचारी से पैदा हुए भयंकर आक्रोश की कहानी है। सिमली बेस अस्पताल संघर्ष समिति के बैनर तले ग्रामीणों ने नवरात्रि के पहले ही दिन इस ऐतिहासिक पदयात्रा का शंखनाद किया था। सोमवार शाम को जब ये आंदोलनकारी रुद्रप्रयाग पहुंचे, तो स्थानीय जनता ने भी इनके संघर्ष को सलाम किया और अपना पूरा समर्थन दिया। दोस्तो अब इनका अगला पड़ाव श्रीनगर गढ़वाल होने वाला है, और इसके बाद यह कारवां सीधे देहरादून कूच करेगा। आगामी 20 अक्टूबर को देहरादून में मुख्यमंत्री आवास का घेराव कर ये ग्रामीण सरकार को उसके पुराने वादे याद दिलाएंगे। ग्रामीणों का साफ कहना है कि अब कागजों का पेट भरना बंद करो, हमें जमीन पर ईंट और पत्थर चाहिए, हमें अस्पताल चाहिए! दोस्तो आखिर यह मामला अटका कहां? इस इनसाइड स्टोरी को भी जरा ध्यान से सुनिए। संघर्ष समिति का आरोप है कि साल 2012 में तत्कालीन विधायकों के बीच आपसी नूराकुश्ती और राजनीतिक खींचतान के चलते इस अस्पताल की फाइल को दबा दिया गया था। नेताओं को अपनी चौधर चमकाने की फिक्र थी, जनता की सेहत की नहीं! दोस्तो एक महीना पहले हुई महापंचायत में सरकार को अल्टीमेटम दिया गया था कि कार्रवाई शुरू करो, लेकिन पूरा एक महीना बीत जाने के बाद भी शासन की ढीठता में कोई कमी नहीं आई। नतीजा आज आपके सामने है— जनता सड़कों पर है! दूरस्थ क्षेत्रों के हजारों लोग आज भी गंभीर बीमारी, सड़क दुर्घटना या डिलीवरी के समय सही इलाज न मिलने की भारी कीमत चुका रहे हैं.. समय पर इलाज न मिलने से कई लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं, लेकिन देहरादून में बैठे नीति-नियंताओं के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती!

दोस्तो लेकिन इस बार पहाड़ की जनता आर-पार के मूड में है। संघर्ष समिति ने सरकार को हिला देने वाली दो टूक चेतावनी दे दी है। उन्होंने साफ कह दिया है कि अगर अब भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आगामी विधानसभा चुनाव का पूर्ण बहिष्कार किया जाएगा! इतना ही नहीं, क्षेत्र में किसी भी पार्टी के विधायक या नेता को घुसने नहीं दिया जाएगा और उनका पुरजोर विरोध होगा। दोस्तो जब वोट बैंक पर चोट लगती है, तभी नेताओं की नींद टूटती है और ग्रामीणों का यह पैंतरा राजनीतिक दलों के पसीने छुड़ाने के लिए काफी है। स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत के लिए अगर आजादी के इतने सालों बाद भी 200 किलोमीटर पैदल चलना पड़े, तो यह पूरे उत्तराखंड के सिस्टम पर एक बड़ा और काला कलंक है! दोस्तो चुनाव आते हैं, घोषणाओं की झड़ी लग जाती है, मुख्यमंत्री बदलते हैं, नए पत्थर लगा दिए जाते हैं, लेकिन पहाड़ का दर्द जस का तस रहता है। सिमली का यह आंदोलन अब सिर्फ एक अस्पताल की मांग नहीं है, बल्कि यह देहरादून की सत्ता के खिलाफ पहाड़ की उपेक्षा का एक बड़ा जनआंदोलन बन चुका है। अब देखना यह है कि 20 अक्टूबर को जब ये ग्रामीण मुख्यमंत्री आवास का घेराव करेंगे, तो धामी सरकार के पास क्या जवाब होगा? क्या सरकार कोई ठोस फैसला लेगी या फिर एक और खोखला आश्वासन देकर आंदोलन को और उग्र होने के लिए मजबूर करेगी! इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं!