दोस्तो, बार बार भयंकर सैलाब का आना, आखिर पहाड़ों पर क्या हो रहा है। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में फिर सैलाब की खबर ने चिंता बढ़ा दी है! आखिर पहाड़ों से अचानक पानी का इतना तेज बहाव क्यों आया? क्या इसकी वजह भूस्खलन है, ग्लेशियर या बदलता मौसम? पूरी खबर देखिए। जिस देश को दुनिया इसकी शांत वादियों और हिमालय की चोटियों के लिए जानती है, आज वही नेपाल कुदरत के क्रूरतम प्रलय का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है! 11 अक्टूबर को एक बार फिर नेपाल की बूढ़ी गंडकी नदी ने वो रौद्र रूप दिखाया, जिसने महज़ 50 दिन पुरानी अगस्त की उस खौफनाक त्रासदी की यादें ताज़ा कर दीं, जिसने 1400 से ज्यादा जिंदगियां निगल ली थीं! देखते ही देखते पुल ताश के पत्तों की तरह ढह गए, मकान मलबे में तब्दील हो गए और लोग जान बचाने के लिए पहाड़ों पर भागने लगे। लेकिन सवाल यह है कि आखिर नेपाल में बार-बार यह खूनी तांडव क्यों मचता है? क्यों हर दो महीने में यहाँ प्रलय लौट आती है? क्या यह महज़ आसमानी आफत है, या फिर हिमालय की कोख में छुपा कोई ऐसा राज़ जिसे इंसान समझ नहीं पा रहा? दोस्तो कुदरत का ऐसा कहर कि इंसान बेबस होकर अपनी आँखों के सामने सब कुछ तबाह होते देखने को मजबूर है। काठमांडू से लगभग 100 किलोमीटर दूर पश्चिमी गोरखा जिले में बूढ़ी गंडक नदी की एक सहायक नदी भूस्खलन के कारण पूरी तरह जाम हो गई थी।
पहाड़ का मलबा गिरा, नदी का रास्ता रुका और पानी की एक कृत्रिम झील बन गई। और जैसे ही मलबे की वो कमज़ोर दीवार टूटी, संकरी घाटियों में फ्लैश फ्लड यानी अचानक आई बाढ़ का ऐसा सैलाब उमड़ा कि सलेरी बाजार और जगत इलाके के 35 से ज्यादा मकान और तीन प्रमुख संपर्क पुल पल भर में जमींदोज़ हो गए। गनीमत रही कि समय रहते मोबाइल पर एसएमएस (SMS) अलर्ट चला गया था, जिससे कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई, लेकिन तबाही के निशान दिल दहलाने वाले हैं। दोस्तो यह मंज़र नया नहीं है, यह महज़ 50 दिन पुरानी उस खौफनाक याद का री-टेक है जिसने पूरे नेपाल का भूगोल हिला दिया था। बीती 26 अगस्त 2026 को नेपाल ने कलयुग की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक को झेला था। तब रसवा और धाडिंग जिलों में ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर सीधे घाटी में गिरा था, जिसके कारण मोटे कोशी और त्रिशूली नदी में मलबे की दीवार खड़ी हो गई थी। जब वो दीवार फटी, तो 1450 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। 2015 के भीषण भूकंप के बाद वह नेपाल की सबसे विनाशकारी आपदा थी। आज 50 दिन बाद इतिहास ने खुद को फिर दोहराया है और गंडक बराज से एक लाख क्यूसेक से ज़्यादा पानी छोड़े जाने के कारण अब भारत के बिहार में भी बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है। लेकिन दसोस्तो सबसे बड़ा वैज्ञानिक सवाल यही है कि आखिर नेपाल बार-बार इस नरसंहार का शिकार क्यों बनता है? भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसके पीछे तीन सबसे बड़े भौगोलिक कारण हैं। पहला कारण है—जमीन के नीचे मची उथल-पुथल।
नेपाल के ठीक नीचे भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें लगातार आपस में टकरा रही हैं, जिससे पूरा हिमालय क्षेत्र बेहद नाजुक और संवेदनशील बना हुआ है। दूसरा कारण है—ग्लेशियरों का फटना (GLOF – Glacial Lake Outburst Flood)। दोस्तो जलवायु परिवर्तन के कारण पहाड़ों का ‘परमाफ्रॉस्ट’ यानी सदियों से जमी बर्फ की पकड़ कमज़ोर हो रही है। इससे ग्लेशियर तेज़ी से पिघलकर पहाड़ों पर ही अस्थाई और खतरनाक झीलें बना लेते हैं, जो ज़रा से दबाव में फट जाती हैं और घाटियों को लील जाती हैं। इसी लिए ये तबाही नेपाल बार बार देख रहा है। दोस्तो प्रकृति तो अपना काम कर ही रही थी, लेकिन इंसानी लालच ने इस बारूद के ढेर में माचिस लगा दी है। नेपाल में बार-बार आने वाली बाढ़ के पीछे। तीसरा सबसे बड़ा कारण है—अंधाधुंध और अनियोजित निर्माण कार्य। संकरी घाटियों और नदियों के बहाव क्षेत्र के बिल्कुल करीब बड़े-बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स खड़े किए जा रहे हैं। पहाड़ों का सीना चीरकर सड़कें बनाई जा रही हैं। यही वजह है कि जब भी मामूली भूस्खलन होता है, तो नदियों का नेचुरल रास्ता ब्लॉक हो जाता है और जब वो डैम नुमा रुकावट फटती है, तो पानी का वेग बुलेट की रफ्तार से बस्तियों को तबाह कर देता है। यह आफत आसमानी कम और इंसानी गलतियों का नतीजा ज़्यादा है। दोस्तो 11 अक्टूबर की यह नई तबाही नेपाल और पूरी दुनिया के लिए एक अल्टीमेटम है। अगर समय रहते पर्यावरण के अनुकूल नीतियां नहीं बनाई गईं और पहाड़ों के इस अंधाधुंध कमर्शियलाइजेशन को नहीं रोका गया, तो नेपाल की ये नदियां यूँ ही ला’शें बहाती रहेंगी। कुदरत के इस भयंकर प्रकोप और नेपाल की इस बेबसी पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। इस बेहद जरूरी और आंखें खोल देने वाली वीडियो रिपोर्ट को शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें।