दोस्तो, कल्पना कीजिए, आप अपने पोते के साथ पार्क में टहल रहे हों और अचानक राष्ट्रपति का फोन आ जाए! आखिर उस फोन पर ऐसा क्या संदेश मिला, जिसने डॉ. ढाल सिंह बिसेन को सीधे उत्तराखंड के राजभवन तक पहुंचा दिया? मध्य प्रदेश से उत्तराखंड तक का ये सफर आखिर कैसे तय हुआ? चार बार विधायक, कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में 99 प्रतिशत हाजिरी का रिकॉर्ड, लेकिन पंच से राजभवन तक पहुंचने वाले डॉ. बिसेन की कहानी में ऐसा क्या खास है, जो आपको जानना चाहिए? दोस्तो क्या एक गांव का साधारण सा पंच, एक दिन देश के सबसे प्रतिष्ठित राज्यों में से एक का संवैधानिक मुखिया बन सकता है? जी हां! राजनीति के बंद कमरों में जब बड़े-बड़े सूरमा गोटियां सेट कर रहे थे, ठीक उसी वक्त राष्ट्रपति भवन से जारी एक आदेश ने पूरे उत्तराखंड और मध्य प्रदेश के सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया! मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता और पूर्व सांसद डॉ. ढाल सिंह बिसेन को उत्तराखंड का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है! वो डॉ. बिसेन जो एक दिन पहले तक अपने पोते की उंगली पकड़कर आम नागरिक की तरह पार्क में टहल रहे थे, आज वो देवभूमि के 9वें महामहिम बन चुके हैं! तो कौन हैं डॉ. ढाल सिंह बिसेन? आखिर दिल्ली दरबार ने पांच दशक पुराने इस जमीनी नेता पर इतना बड़ा दांव क्यों खेला है? कांग्रेस ने देहरादून से लेकर दिल्ली तक किसी को नहीं छोड़ा है, इसके मायने क्या है ये आप कमेंट कर बताना जरूर लेकिन मै आपको डॉ. ढाल सिंह बिसेन के बारे में बताता हूं। एक नेता की सादगी और उनके बैकग्राउंड को समझो। डॉ. ढाल सिंह बिसेन का जन्म 14 मई 1952 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के पिपरिया गांव में हुआ था। पेशे से वो एक डॉक्टर (चिकित्सक) और एक समर्पित किसान भी रहे हैं।
राजनीति में उनका कोई गॉडफादर नहीं था। डॉ. ढाल सिंह बिसेन अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत अपने ही गांव में एक निर्वाचित पंच के रूप में की थी! जमीनी राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वो सिवनी और बालाघाट क्षेत्र के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शुमार हो गए। उनका यह मध्य प्रदेश का तजुर्बा ही है, जो अब उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था को नई दिशा देने वाला है। दोस्तो अब बात करते हैं डॉ. बिसेन के उस बेदाग राजनीतिक रिकॉर्ड की, जिसे देखकर बड़े-बड़े क्षत्रप दंग रह जाते हैं। उनका चुनावी इतिहास बेहद शानदार रहा है। लगातार 4 बार विधानसभा फतह, डॉ. बिसेन ने वर्ष 1990, 1993, 1998 और 2003 में सिवनी जिले की बरघाट सीट से लगातार चार बार बीजेपी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता- कैबिनेट मंत्री का रसूख, साल 2003 से 2005 के दौरान मध्य प्रदेश की उमा भारती और बाबूलाल गौर सरकारों में वह कैबिनेट मंत्री रहे, जहां उन्होंने वन, परिवहन, खनिज, स्कूल शिक्षा और जेल जैसे भारी-भरकम विभागों को संभाला।
वित्त आयोग के अध्यक्ष, साल 2011 से 2013 के बीच उन्होंने मध्य प्रदेश के चौथे राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी बड़ी भूमिका निभाई। बालाघाट से सांसद: साल 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने उन्हें बालाघाट सीट से उतारा, जहां उन्होंने बंपर जीत दर्ज की और 2024 तक 17वीं लोकसभा के सक्रिय सदस्य रहे। दोस्तो राजनीति में अक्सर नेताओं पर गैर-जिम्मेदार होने के आरोप लगते हैं, लेकिन डॉ. ढाल सिंह बिसेन का रिकॉर्ड बिल्कुल जुदा है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च (PRS) के आंकड़ों के मुताबिक, जब वो लोकसभा सांसद थे, तब सदन में उनकी उपस्थिति (Attendance) पूरे 99 प्रतिशत थी! यही नहीं, उन्होंने अपने कार्यकाल में 73 बहसों में हिस्सा लिया और जनता से जुड़े 189 तीखे सवाल पूछे. कृषि, ग्रामीण विकास, सिंचाई और आदिवासी कल्याण उनके पसंदीदा विषय रहे हैं। दिल्ली आलाकमान ने उनके इसी अनुशासन, समर्पण और निष्पक्ष छवि को देखते हुए उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह की जगह राजभवन भेजने का फैसला किया है। दोस्तो उत्तराखंड में साल 2027 के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे नाजुक समय में एक बेहद अनुभवी, शांत और संगठन के माहिर खिलाड़ी को राज्यपाल बनाकर केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि उत्तराखंड की सत्ता और व्यवस्था में संतुलन कितना जरूरी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी नए राज्यपाल को बधाई देते हुए उम्मीद जताई है कि उनका लंबा सार्वजनिक अनुभव देवभूमि को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। अब देखना यह होगा कि मध्य प्रदेश की लाल मिट्टी से निकलकर उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचे महामहिम डॉ. ढाल सिंह बिसेन राजभवन की इस नई कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं! नए राज्यपाल की इस नियुक्ति पर आपकी क्या राय है?