Babita Pandey के गयाब होने के पीछे की वजह! | Uttarkashi | Dayara Bugyal | | Uttarakhand News

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क्या उत्तराखंड के चर्चित बबिता केस की जांच में बड़ी लापरवाही हुई है? क्या जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कुर्सियां तोड़कर वेतन लेने तक सीमित रह गए हैं? आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक अहम सुराग माने जा रहे मोबाइल फोन को पुलिस और एसडीआरएफ की तमाम कोशिशों के बावजूद तलाशा नहीं जा सका? Babita Pandey Missing In Uttarkashi बताउंगा आपको कि कैसे उत्तरकाशी के लोग ही अब लगाने लगे हैं बड़े आरोप किसने कहा कुर्सी तोड़ वेतन ले रहे हैं कह कर एक स्थानीय युवा ने कर दिए ऐसे एसे खुलासे की आप देखेंगे तो दंग रह जाएंगे। कैसे पर्यटन अधिकारी से लेकर एसडीआईएफ को बताया जा रहा फेल। दोस्तो दयारा ट्रैक पर गई बबीता पांडे के लापता होने पर हमारी जांच एजेंसिया तो कुछ नहीं कह रही है लेकिन लोग अब खुल बोलने लगे हैं। सिस्टम की कारगुजारी पर सवाल करने लगे हैं। दोस्तो अब इस मामले में पर्यटन विभाग के एक अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब आधुनिक संसाधन और विशेषज्ञ टीमें मौजूद थीं, तो आखिर जांच में ऐसी कौन सी कमी रह गई? क्या किसी स्तर पर सच को सामने आने से रोकने की कोशिश हुई या फिर यह महज प्रशासनिक नाकामी है?

दोस्तो उत्तरकाशी में लापता नैनीताल की बेटी बबिता पांडे का मामला गरमाता जा रहा है। 7 दिन बीत चुके हैं, लेकिन प्रशासन के हाथ खाली हैं। अब इस पर सियासी और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। जी हां दोस्तो सवाल में जम लगता है। सबसे पहले पुलिस प्रशासन से कहना चाहता हूं – इतनी तकनीक होने के बावजूद उनका आईफोन हम क्यों रिकवर नहीं कर पाए? सारी तकनीक इस्तेमाल कर वो फोन बरामद करना होगा। सवाल सिर्फ पुलिस पर नहीं, पर्यटन विभाग पर भी उठे, आरोप है कि ट्रैकिंग परमिट में टेम्परिंग की गई। जिला पर्यटन अधिकारी पर गंभीर सवाल खड़े किए गए। डीएफओ पर भी निशाना साधा गया। कहा गया कि फोन नहीं उठाते, और बॉर्डर जिले में खुफिया तंत्र की नाकामी पर भी सवाल उठे। मांग की गई है कि बबिता को ढूंढने में तेजी लाई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई हो। तो बबिता पांडे के लापता होने का मामला अब सिर्फ एक खोज अभियान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जांच एजेंसियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सभी संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल किया जाता, तो शायद जांच किसी ठोस नतीजे तक पहुंच चुकी होती हालांकि इन आरोपों और सवालों पर संबंधित विभागों की ओर से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन एक बात साफ है कि सात दिन बाद भी बबिता का कोई सुराग न मिलना लोगों की चिंता और आक्रोश दोनों को बढ़ा रहा है। अब सबकी निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई और इस बात पर टिकी हैं कि आखिर बबिता पांडे कहां हैं और उन्हें खोजने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।