दोस्तो, नवरात्र के पावन दिनों में देवभूमि से आई एक खबर ने भक्तों को झकझोर दिया है! मां भगवती का ऐतिहासिक धाम आग की लपटों में घिरा और सदियों पुरानी काष्ठकला जलकर राख हो गई! आखिर हिमालय की इस पौराणिक भूमि पर आग कैसे लगी? कैसे खाक हुआ आस्था का ये प्राचीन धाम? दोस्तो देख रहे हैं कितना खुबसूर और ऐतिहासिक मंदिर नवरात्रों में सजा धजा सा लग रहा है या हूं कहूं खिलखिला रहा है और दोस्तो वहीं दूसरी तस्वीर इस खूबसूरत इतिहास का राख में तब्दील हेने की है। दोस्तो ये तब है जब पूरा देश इस वक्त शक्ति की भक्ति में डूबा है, नवरात्र के पावन दीये जल रहे हैं। लेकिन इसी मंगल बेला के बीच देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों से एक ऐसी दुखद और झकझोर देने वाली खबर आई है, जिसने हर श्रद्धालु की आंखें नम कर दी हैं! बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील के सुदूर बदियाकोट में स्थित मां आदिबद्री भगवती के ऐतिहासिक मंदिर में भीषण आग लग गई है! देखते ही देखते, देवभूमि की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और देवदार की लकड़ियों पर उकेरी गई सदियों पुरानी बारीक काष्ठकला आग की लपटों में विलीन हो गई। यह सिर्फ एक इमारत का जलना नहीं है, यह पहाड़ की आत्मा और करोड़ों भक्तों की आस्था पर बहुत गहरी चोट है! कैसे हुआ यह हादसा और क्यों सुदूर हिमालय की गोद में बनी यह अनमोल धरोहर समय रहते बचाई नहीं जा सकी? दोस्तो इस तस्वीर के बाद वाली जो तस्वीर आई उसने हजारों हजार भक्तों की आंखे नम कर दी। दोस्तो तारीख 16 अक्टूबर 2026, शारदीय नवरात्र का पावन समय। बागेश्वर जिले के कपकोट से करीब 50 किलोमीटर दूर उच्च हिमालयी क्षेत्र में बसे बदियाकोट गांव में सुबह-सुबह अचानक हड़कंप मच गया। मां आदिबद्री भगवती मंदिर परिसर से धुएं का गुबार और आग की ऊंची लपटें उठने लगीं। चूंकि यह मुख्य मंदिर पूर्ण रूप से पारंपरिक देवदार की लकड़ी और काष्ठकला से बना हुआ था, इसलिए आग ने पल भर में विकराल रूप धारण कर लिया।
स्थानीय लोग और श्रद्धालु अपनी आंखों के सामने अपनी आराध्य देवी के धाम को जलते देख बिलख पड़े। जब तक लोग कुछ समझ पाते, मुख्य मंदिर के ढांचे को बहुत भारी नुकसान पहुंच चुका था। दोस्तो ये मंदिर जल रहा है ना ये ऐतिहासिक मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं था, बल्कि यह कुमाऊं क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्य कला और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल प्रतीक था। मंदिर की लकड़ियों पर स्थानीय शिल्पकारों द्वारा की गई बारीक और खूबसूरत नक्काशी इसकी अनूठी पहचान थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां आदिशक्ति ने इसी पवित्र स्थान पर दैत्य निशुंभ का वध किया था, जिसके कारण पुराणों में इस पूरे क्षेत्र को ‘वध कोट’ या बदियाकोट के रूप में वर्णित किया गया है। यहाँ नंदा अष्टमी के अवसर पर पारंपरिक रूप से विशेष पूजा और विशाल जातियों का आयोजन होता रहा है, जिसमें तिब्बतियों के हूण देवता और लाटू देवता की पूजा की भी अनोखी परंपरा शामिल है। दोस्तो इस दुखद हादसे ने एक बार फिर पहाड़ों के दुर्गम इलाकों में सुरक्षा और संसाधनों की कमी के कड़े सच को उजागर कर दिया है। कपकोट तहसील मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर इस सुदूर हिमालयी क्षेत्र में अग्निशमन (फायर फाइटिंग) सेवाओं की कोई उपलब्धता नहीं है।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जब तक जिला मुख्यालय या मैदानी इलाकों से कोई मदद पहुंच पाती, तब तक लकड़ी का पूरा ढांचा जल चुका था। दोस्तो स्थानीय निवासियों के मुताबिक, मंदिर में बिजली की व्यवस्था थी और नवरात्र के कारण अखंड ज्योति व पूजा के दीपक भी निरंतर जल रहे थे। ऐसे में शुरुआती तौर पर आग लगने की वजह शॉर्ट सर्किट या जलते हुए दीये को माना जा रहा है, हालांकि इसकी वास्तविक पुष्टि जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी, लेकिन जो भी वो बेहद तख्लीफ देने वाला था। दोस्तो इस भीषण अग्नितांडव के बाद पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी सोशल मीडिया पर इस घटना को अत्यंत पीड़ादायक बताते हुए मां भगवती से सबकी रक्षा की प्रार्थना की है। अब उम्मीद यही है कि सरकार और प्रशासन इस पौराणिक धरोहर के भव्य पुनरुद्धार और जीर्णोद्धार के लिए जल्द ही कदम उठाएंगे, ताकि बदियाकोट का यह वैभव फिर से लौट सके। नवरात्र के बीच हुए इस दुखद हादसे पर आपकी क्या संवेदनाएं हैं, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। देवभूमि की इस बड़ी और भावुक खबर को शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। जय मां भगवती!