दोस्तो, रावण का कद हर साल ऊंचा हो रहा है, लेकिन क्या समाज में बुराइयां भी उसी रफ्तार से बढ़ रही हैं? दशहरे पर रावण के पुतलों की बढ़ती ऊंचाई को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ऐसा तंज कसा कि नई बहस छिड़ गई! उनका कहना है कि रावण की बढ़ती हाइट समाज में बढ़ते अनाचार और भ्रष्टाचार का प्रतीक है। लेकिन सवाल ये है— क्या यह सिर्फ एक वैचारिक संदेश है, या उत्सव में बढ़ती भव्यता पर सीधा सवाल? और क्या इस बयान के सियासी मायने भी निकाले जाएंगे? आखिर रावण का कद छोटा करने की नसीहत से त्रिवेंद्र क्या संदेश देना चाहते हैं? दोस्तो हर साल विजयादशमी यानी दशहरे पर हम असत्य पर सत्य की जीत का जश्न मनाते हैं और रावण के पुतले का दहन करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि हर गुजरते साल के साथ हमारे शहरों के मैदानों में खड़े होने वाले रावण की लंबाई लगातार बढ़ती जा रही है? कहीं 60 फीट, कहीं 80 फीट तो कहीं पूरे 100 फीट! द्सोत इसी रिकॉर्ड तोड़ती ऊंचाई को लेकर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक ऐसा विस्फोटक और दार्शनिक बयान दे दिया है, जिसने पूरे देश के भीतर एक नई सामाजिक बहस छेड़ दी है! त्रिवेंद्र सिंह रावत ने साफ शब्दों में कहा है कि रावण की यह बढ़ती हुई लंबाई कोई गर्व की बात नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि हमारे समाज में बुराई, अनाचार और भ्रष्टाचार किस कदर सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता जा रहा है! उन्होंने कमेटियों को नसीहत दी है कि जो बुराई का प्रतीक है, उसका कद छोटा होना चाहिए, बड़ा नहीं! आखिर इस बयान के पीछे का असली मर्म क्या है? पहले आप यहां बयान देखिए और समझिए, कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना ज्यादा लगता है।
दोस्तो देश भर में दशहरे का त्योहार धूमधाम से बीत चुका है, लेकिन पुतलों के मलबे से उठी एक सियासी और सामाजिक चिंगारी अब उत्तराखंड की राजनीति को गरमा रही है। हरिद्वार से भाजपा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने दशहरे की आयोजन कमेटियों की उस होड़ पर करारा प्रहार किया है, जिसमें हर साल रावण को और ऊंचा बनाने की प्रतिस्पर्धा चलती है। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि— “समाज में जैसे-जैसे बुराई, अनाचार और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, वैसे ही इंसानों ने रावण का कद भी बढ़ाना शुरू कर दिया है। रावण कोई आदर्श नहीं है, वह बुराई का प्रतीक है। जो बुराई का प्रतीक है, उसे समाज में कम करना चाहिए, उसका कद छोटा करना चाहिए, लेकिन हम उसे और बड़ा दिखाते जा रहे हैं। दोस्तो त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस बयान को अगर राजनीति और समाजशास्त्र के चश्मे से देखें, तो इसके मायने बेहद गहरे हैं। आज देश के कई हिस्सों में रावण के पुतले 100 से 120 फीट तक ऊंचे बनाए जा रहे हैं, जिस पर लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। त्रिवेंद्र रावत का तर्क है कि हम जिस अहंकार और वासना के पुतले को जला रहे हैं, उसे समाज में इतना भव्य रूप देकर हम अनजाने में उसी के आतंक को बड़ा दिखा रहे हैं। विश्लेषक इसे त्रिवेंद्र सिंह रावत का अपनी ही सरकार के सिस्टम और समाज के गिरते नैतिक मूल्यों पर एक ‘साइलेंट अटैक’ भी मान रहे हैं, जहां वे विकास के दावों के बीच पनप रहे अनाचार को रावण के पुतले के जरिए एक्सपोज कर रहे हैं। बहरहाल, दोस्तो रावण की लंबाई पर शुरू हुई यह बहस साफ करती है कि देवभूमि के राजनेता अब त्योहारों के बहाने ही सही, समाज की बुनियादी कमियों और व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाने से पीछे नहीं हट रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या अगले साल त्रिवेंद्र रावत की इस नसीहत का असर देहरादून के खेल मैदानों पर दिखता है और क्या रावण का कद वाकई छोटा होता है या नहीं। दोस्तो दशहरे के पटाखे फूट कर शांत हो चुके हैं, लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रावण की हाइट का जो मुद्दा उठाया है, वह हम सबको यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वाकई केवल प्रतीकों को बड़ा कर रहे हैं और असल जिंदगी में बुराई के सामने घुटने टेक रहे हैं? अनाचार और भ्रष्टाचार का यह बढ़ता हुआ रावण हमारे समाज को खोखला कर रहा है, और पूर्व सीएम की यह नसीहत आंखें खोलने वाली है। इस दिलचस्प और तीखे सामाजिक-राजनीतिक विवाद पर आपकी क्या राय है, हमें जरूर बताएं।