Gopeshwar पहुंची बाबा रुद्रनाथ की डोली! । Chardham । Panchkedar । Bhole Baba ।Uttarakhand News

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दोस्तो, चमोली के गोपेश्वर में हर-हर महादेव के जयकारों के बीच बाबा रुद्रनाथ की डोली पहुंची, तो पूरा माहौल शिवमय हो उठा! ढोल-दमाऊ की थाप, भक्तों का पारंपरिक नृत्य और बाबा के स्वागत में उमड़ा आस्था का सैलाब— आखिर क्यों खास है भगवान रुद्रनाथ का यह शीतकालीन प्रवास? 17 अक्टूबर को कपाट बंद होने के बाद बाबा की डोली देवलधार के ज्वाला मंदिर में रात्रि विश्राम कर गोपीनाथ मंदिर पहुंची। अब अगले छह महीने यहीं शीतकालीन पूजा-अर्चना होगी। आखिर क्या है चतुर्थ केदार की इस परंपरा का महत्व? दोस्तो उत्तराखंड की महान सनातन संस्कृति और अटूट परंपरा का वो सबसे अलौकिक और भव्य क्षण आज सामने आया है, जिसे देखकर हर आंख भक्ति रस से सजल हो उठी है! चतुर्थ केदार भगवान श्री रुद्रनाथ जी की पावन उत्सव डोली अपने शीतकालीन प्रवास स्थल— गोपेश्वर के ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर में विधि-विधान के साथ विराजमान हो गई है!शनिवार रात को उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित रुद्रनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद होने के बाद, बाबा की डोली बेहद दुर्गम रास्तों और बर्फबारी के बीच नीचे की ओर बढ़ी। और जैसे ही इस डोली ने गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर परिसर में प्रवेश किया, पूरा वातावरण ‘हर-हर महादेव’ और ‘बोलो-बोलो रुद्रनाथ’ के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा! अगले छह महीनों तक बाबा यहीं पर भक्तों को दर्शन देंगे। आखिर कैसा रहा बाबा का यह दिव्य स्वागत और क्या है इस शीतकालीन गद्दीस्थल का महत्व? दोस्तो ढोल-दमाऊ की मंगल ध्वनि, हवा में उड़ते अबीर-गुलाल और भगवान शिव के जयकारों से गुंजायमान यह पवित्र दृश्य गवाह है उस अगाध श्रद्धा का जो केवल देवभूमि की माटी में ही देखने को मिल सकती है। चमोली जिले के पौराणिक गोपीनाथ मंदिर में जैसे ही चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली पहुंची, पूरा परिसर भक्ति के एक अलौकिक रंग में डूब गया। उच्च हिमालयी क्षेत्र में कड़ाके की ठंड और बदलते मौसम के बीच शनिवार, 17 अक्टूबर की देर रात भगवान रुद्रनाथ मंदिर के कपाट विधि-विधान के साथ बंद किए गए थे, जिसके बाद से ही बाबा अपनी प्रजा को तारने और उनके बीच छह महीने बिताने नीचे गद्दीस्थल की ओर निकल पड़े थे।

दोस्तो रुद्रनाथ धाम को पंचकेदारों में सबसे कठिन पैदल ट्रैक वाला मंदिर माना जाता है। कपाट बंदी के बाद मुख्य पुजारी हरीश भट्ट और हक-हकधारियों की टोली बाबा के विग्रह को डोली में सजाकर नंगे पैर नीचे की ओर बढ़े। यह यात्रा पुलिस सुरक्षा के बीच रविवार, 18 अक्टूबर को देवलधार स्थित ज्वाला मंदिर पहुंची, जहां रात्रि प्रवास के बाद सोमवार, 19 अक्टूबर को डोली ने जैसे ही गोपेश्वर नगर की सीमा में प्रवेश किया, श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा। महिलाओं ने अपने घरों की छतों से मंगल गीत गाए और आरती उतारकर बाबा की अगवानी की। दोस्तो गोपीनाथ मंदिर के गर्भगृह में डोली के विराजमान होते ही वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शीतकालीन पूजा की परंपरा विधिवत शुरू हो गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगले छह महीने तक भगवान रुद्रनाथ की नित्य पूजा-अर्चना और भोग इसी गोपीनाथ मंदिर में संपन्न होंगे। यह मंदिर अपने आप में ऐतिहासिक है, जहां भगवान शिव का एक अति प्राचीन धातु का त्रिशूल स्थापित है, जिसके बारे में मान्यता है कि एक सच्चा भक्त यदि इसे अपनी उंगली से छुए, तो इसमें कंपन होने लगता है। जो श्रद्धालु ऊंचे पहाड़ों की दुर्गम चढ़ाई नहीं चढ़ पाते, वे शीतकाल के दौरान यहीं आकर बाबा रुद्रनाथ के मुखाकृति स्वरूप के दर्शन कर पुण्य लाभ कमाते हैं। दोस्तो कपाट बंद होने के बाद भले ही उच्च हिमालय के बुग्याल सूने हो गए हों, लेकिन गोपेश्वर की यह घाटी अब शिवभक्ति के रस से सराबोर हो चुकी है। अब आगामी ग्रीष्मकाल में कपाट दोबारा खुलने तक भगवान गोपीनाथ का यह प्रांगण ही देश-दुनिया के शिवभक्तों की आस्था का मुख्य केंद्र बना रहेगा। दोस्तो वाकई, देवभूमि की ये परंपराएं और उत्सव हमें यह एहसास दिलाते हैं कि ईश्वर और भक्तों का रिश्ता कितना अटूट है। कड़ाके की ठंड और बर्फबारी के बीच भी हक-हकधारी जिस निष्ठा के साथ बाबा की डोली को कंधे पर उठाकर गोपेश्वर लाए हैं, वह सराहनीय है। अब अगले छह महीनों तक बाबा रुद्रनाथ यहीं गोपीनाथ मंदिर में विराजमान रहेंगे। अगर आप भी बाबा का आशीर्वाद लेना चाहते हैं, तो शीतकाल में गोपेश्वर आकर दर्शन कर सकते हैं।