दोस्तो, जौनसार-बावर में एक दुल्हन शादी के जोड़े में 18 किलोमीटर पहाड़ी रास्ता पैदल तय करने को मजबूर हुई! सिर पर शादी की रस्में, सामने दुर्गम रास्ता और मन में गृह प्रवेश का मुहूर्त बचाने की चिंता। अपनी अनूठी जोजोड़ा परंपरा निभाने निकली शर्मिला ने आखिर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से सड़क बनवाने की गुहार क्यों लगाई? विकास के दावों के बीच उदांवा गांव की इस हकीकत पर सरकार कब ध्यान देगी? दोस्तो 21वीं सदी का भारत, डिजिटल उत्तराखंड, और चमचमाती सड़कों के दावों के बीच आज हम आपको देवभूमि की एक ऐसी हकीकत दिखाने जा रहे हैं, जो आपको हैरान भी करेगी और सिस्टम पर गुस्सा भी दिलाएगी।जौनसार-बावर की ऐतिहासिक ‘जोजोड़ा परंपरा’ के तहत एक दुल्हन बारात लेकर अपने दूल्हे के घर के लिए निकलती है। लाल जोड़ा, हाथों में मेहंदी, और भारी गहने, लेकिन आगे कोई गाड़ी नहीं, कोई डोली नहीं, बल्कि सिर्फ पत्थरों से भरा एक दुर्गम रास्ता था! दुल्हन शर्मिला को अपनी ससुराल पहुंचने के लिए करीब 18 किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ा। गृह प्रवेश का मुहूर्त न छूट जाए, इसके लिए वो शादी के जोड़े में पहाड़ों पर दौड़ती रही। थक-हारकर उसने रास्ते से ही सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पैगाम भेजा कि ‘धामी जी, सड़क बनवा दो’! दोस्तो उत्तराखंड का जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर अपनी अनूठी ‘जोजोड़ा’ संस्कृति के लिए जाना जाता है, जहां बेटियां समाज में बराबरी का हक पाते हुए खुद बारात लेकर दूल्हे के घर ब्याह रचाने जाती हैं। चकराता ब्लॉक के बुल्हाड़ गांव की रहने वाली शर्मिला का विवाह उदांवा गांव के रहने वाले अनिल चौहान के साथ तय हुआ था। मंगलवार को जब शर्मिला बारात लेकर निकली, तो रस्मों की खुशी तो थी, लेकिन रास्ते की बेबसी भारी पड़ गई। लोखंडी से लेकर उदांवा गांव तक का 18 किलोमीटर का सफर गाड़ियों का नहीं, बल्कि पथरीली पगडंडियों का था। वजह साफ़ थी— आज़ादी के इतने सालों बाद भी इस दुर्गम गांव तक पक्की सड़क का नामोनिशान नहीं है।
दोस्तो भारी-भरकम शादी के जोड़े और लहंगे में जहां समतल रास्तों पर चलना मुश्किल होता है, वहां शर्मिला को खड़े पहाड़ों पर ढाई से चार घंटे तक लगातार पैदल चलना पड़ा। पहाड़ की पगडंडियों पर चढ़ते-चढ़ते बारातियों और दुल्हन के पैर जवाब दे गए। सबसे बड़ी चुनौती थी गृह प्रवेश का शुभ मुहूर्त। मुहूर्त कहीं निकल न जाए, इस डर से नई-नवेली दुल्हन शर्मिला पहाड़ों पर भागती और दौड़ती हुई नजर आई। शादियों के आधुनिक दौर में जहां लोग महंगी गाड़ियों और हेलिकॉप्टरों से एंट्री करते हैं, वहां पहाड़ों की इस बेटी को अपनी किस्मत और बदहाल रास्तों पर दौड़ना पड़ रहा था। दोस्तो इस बेहद थका देने वाले सफर के बीच दुल्हन शर्मिला का दर्द छलक पड़ा। उसने राह चलते ही एक वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया और सीधे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से गुहार लगा दी। शर्मिला ने कहा, “लोखंडी से गांव तक बारात लेकर पैदल जाना पड़ रहा है। रास्ता पक्का नहीं होने से बहुत थकान हो गई है। धामी जी, उदांवा गांव तक सड़क बनवा दीजिए, ताकि भविष्य में किसी दूसरी बेटी या ग्रामीणों को इलाज या बारात के लिए इस तरह की भयानक परेशानी न उठानी पड़े।” यह गुहार सिर्फ शर्मिला की नहीं, बल्कि पहाड़ के उन सैकड़ों गांवों की है जहां आज भी बीमारों को अस्पताल ले जाने के लिए डोलियों का सहारा लेना पड़ता है। दोस्तो शर्मिला की इस अनोखी लेकिन दर्दभरी बारात ने उत्तराखंड में बुनियादी सुविधाओं के दावों के गुब्बारे की हवा निकाल दी है। नेता रैलियों में सड़कों का जाल बिछाने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि शादी-ब्याह हो या कोई मेडिकल इमरजेंसी, पहाड़ की जनता आज भी सिर्फ अपने पैरों के भरोसे है। शर्मिला ने तो हिम्मत दिखाकर अपनी आवाज मुख्यमंत्री तक पहुंचा दी, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या देहरादून में बैठा शासन और प्रशासन इस बेटी की पुकार सुनेगा? क्या उदांवा गांव को सच में सड़क मिलेगी या यह वीडियो भी सोशल मीडिया की रील्स में कहीं खो जाएगा? ये तस्वीर हैरान करने वाली है। दोस्तो शादी का दिन हर बेटी के लिए सबसे खास होता है, लेकिन शर्मिला के लिए यह दिन सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा गवाह बन गया। जौनसार की खूबसूरत परंपरा को विकास की बदहाली ने ढक दिया। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस नवविवाहित जोड़े और पूरे गांव को सड़क का तोहफा कब तक देते हैं, ताकि अगली बार किसी दुल्हन को शादी के जोड़े में 18 किलोमीटर की दौड़ न लगानी पड़े।