रामनगर के पुछड़ी में बुलडोजर चला तो सिर्फ स्कूल की इमारत नहीं टूटी, बल्कि 150 गरीब बच्चों की पढ़ाई पर भी संकट खड़ा हो गया! मजदूरों और कबाड़ी परिवारों के ये बच्चे अब खुले आसमान के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं। स्कूल के चारों तरफ कंटीले तार लगा दिए गए हैं, लेकिन शिक्षकों ने हार नहीं मानी। आखिर इन बच्चों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं हुई? पूरी खबर देखिए दंग रह जाएंगे आप, दोस्तो विकास का कैसा पैमाना और कानून का कैसा डंडा? क्या प्रशासन की कार्रवाई इतनी अंधी हो चुकी है कि उसे मासूम बच्चों का भविष्य भी दिखाई नहीं दे रहा? जी हां, उत्तराखंड के रामनगर में अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर जो हुआ है, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया है! दोस्तो एक तरफ सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘सब पढ़े, सब बढ़े’ के बड़े-बड़े नारे लगाती है, तो दूसरी तरफ रामनगर के पुछड़ी में एक ऐसे स्कूल पर बुलडोजर चला दिया जाता है जो मजदूर और कबाड़ बीनने वाले गरीब परिवारों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहा था! आज ज्योतिबा फुले सांध्यकालीन स्कूल की छत छीन ली गई है, चारों तरफ कंटीले तार बिछा दिए गए हैं, लेकिन सलाम है उन शिक्षकों के जज्बे को, जिन्होंने हार नहीं मानी! कड़कड़ाती ठंड और खुले आसमान के नीचे आज भी कक्षाएं चल रही हैं। आखिर गरीब बच्चों की पढ़ाई से ये कैसी दुश्मनी? क्या इन मासूमों का कसूर सिर्फ इतना है कि ये गरीब घरों में पैदा हुए हैं? दोस्तो अतिक्रमण पर चला प्रशासन का पीला पंजा आज 150 से ज्यादा मासूम बच्चों के भविष्य पर कालिख पोत चुका है।
रामनगर के पुछड़ी इलाके में हाल ही में चलाए गए अतिक्रमण विरोधी अभियान की जद में वो ज्योतिबा फुले सांध्यकालीन स्कूल भी आ गया, जो समाज के सबसे पिछड़े तबके के बच्चों के लिए उम्मीद की इकलौती किरण था। प्रशासन ने कथित तौर पर वन भूमि से कब्जा हटाने के नाम पर कार्रवाई तो कर दी, लेकिन इसके मलबे में दब गया उन बच्चों का सपना जो पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहते थे। दोस्तो इस स्कूल की नींव 26 नवंबर 2020 को रखी गई थी। शिक्षक नवेंदु माथपाल और ‘रचनात्मक शिक्षक मंडल’ के उनके सहयोगियों ने मिलकर एक बेहद पावन मुहिम की शुरुआत की थी। इस सांध्यकालीन स्कूल का मकसद था—मजदूरों और कबाड़ बीनने वाले परिवारों के बच्चों तक मुफ्त शिक्षा पहुंचाना। पिछले 6 सालों से यह स्कूल निरंतर इन बच्चों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैला रहा था। करीब 150 बच्चे इस स्कूल से जुड़कर एक सुरक्षित माहौल में अपना भविष्य संवार रहे थे, लेकिन एक झटके में सबकुछ मलबे में तब्दील कर दिया गया.. दोस्तो प्रशासन ने जमीन खाली कराई, स्कूल तोड़ दिया और परिसर के चारों तरफ लोहे के कटीले तार लगा दिए ताकि कोई अंदर कदम न रख सके। लेकिन वो कहते हैं ना कि हौसलों की उड़ान को कोई सरहद या तार नहीं रोक सकते! स्कूल की छत छिनी है, शिक्षकों का हौसला नहीं।
नवेंदु माथपाल और उनके साथी शिक्षकों ने हार मानने से साफ इनकार कर दिया है। अब कंटीले तारों के ठीक बाहर, धूल और धूप के बीच खुले आसमान के नीचे ही क्लास लगाई जा रही है। इस लड़ाई में स्थानीय महिलाएं भी ढाल बनकर खड़ी हो गई हैं, जो यह सुनिश्चित कर रही हैं कि बच्चों की पढ़ाई किसी भी कीमत पर न रुके। दोस्तो मगर सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक? खुले आसमान के नीचे बैठना इन बच्चों की मजबूरी हो सकती है, लेकिन क्या यह कोई स्थाई समाधान है? जैसे-जैसे मौसम बदलेगा, कड़कड़ाती ठंड, चुभती धूप और बारिश के बीच ये मासूम बच्चे असुरक्षित माहौल में कैसे पढ़ेंगे? प्रशासन को वन भूमि खाली करानी थी, कानून का पालन करना था—यह सही हो सकता है, लेकिन क्या इन बच्चों के पुनर्वास या इनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सरकार और जिला प्रशासन की नहीं थी? दोस्तो ज्योतिबा फुले सांध्यकालीन स्कूल के शिक्षक अपनी जिद पर अड़े हैं कि वो बच्चों को अनपढ़ नहीं रहने देंगे। लेकिन इन बच्चों को सिर्फ खुले आसमान के नीचे एक ब्लैकबोर्ड नहीं चाहिए। इन्हें चाहिए पढ़ने के लिए एक सुरक्षित छत, बुनियादी सुविधाएं और एक ऐसा माहौल जहां वो बिना किसी डर के पढ़ सकें। यह रिपोर्ट सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सोए हुए सिस्टम को जगाने की एक कोशिश है। क्या रामनगर का प्रशासन इन बच्चों की सुध लेगा।