दोस्तो, दिल्ली के इंडिया गेट पर आधी रात को ऐसा क्या हुआ कि अंकिता भंडारी के माता-पिता के आंसू और आक्रोश फिर सुर्खियों में आ गए? जिस मां की बेटी को इंसाफ दिलाने की मांग पूरे उत्तराखंड में गूंज रही है, उसी मां के साथ पुलिस के कथित सलूक पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?आखिर इंसाफ मांगने वाले माता-पिता को हिरासत में लेने की नौबत क्यों आई? राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के समर्थन के बाद क्या इस मुद्दे ने सियासी तूल पकड़ लिया है? और सबसे बड़ा सवाल—अंकिता को न्याय दिलाने की मांग का जवाब कार्रवाई से मिलेगा या जवाबदेही से?दिल्ली से देहरादून तक उठ रहे इन सवालों के बीच, आखिर इस पूरे घटनाक्रम में क्या हुआ? दोस्तो “कहते हैं कि जब सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों का ज़मीर मर जाता है, तो देश की बेटियों को इंसाफ नहीं, सिर्फ और सिर्फ तारीखें और पुलिस की लाठियां मिलती हैं! शास्त्रों में लिखा है—’विनाशकाले विपरीत बुद्धि’, यानी जब किसी का बुरा वक़्त आता है, तो उसकी बुद्धि सबसे पहले भ्रष्ट हो जाती है! आज दिल्ली के इंडिया गेट पर जो हुआ, उसने पूरे देश को शर्मसार और लहूलुहान कर दिया है! अपनी मासूम बेटी अंकिता भंडारी की बेरहम हत्या के बाद पूरे 4 साल से इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे एक बूढ़े बाप और एक लाचार मां को दिल्ली पुलिस ने अपराधियों की तरह जबरन उठाकर हिरासत में ले लिया है! आरोप है कि अंकिता के गुनहगारों के आकाओं को राजभवन का सुख दिया जा रहा है और इंसाफ मांगने वाली बूढ़ी मां को सड़क पर घसीटा जा रहा है! सत्ता का यह कैसा अंधा अहंकार है? “यह देश के उस लोकतंत्र की सबसे कड़वी और डरावनी तस्वीर है, जहाँ इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति के साए में बैठी एक मां को पुलिस ज़बरदस्ती घसीटकर गाड़ी में ठूंस रही है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड के पीड़ित माता-पिता बुधवार से दिल्ली के इंडिया गेट पर शांतिपूर्ण धरने पर बैठे थे। उनकी आँखों में केवल अपनी बेटी को खोने का गम और व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा था। लेकिन आधी रात को भारी पुलिस बल ने आकर धरना स्थल को छावनी में तब्दील कर दिया और अंकिता के बुजुर्ग माता-पिता को हिरासत में लेकर वहाँ से हटा दिया। जो हाथ अपराधियों की धरपकड़ के लिए उठने चाहिए थे, वो हाथ आज एक बेबस माँ की आंसुओं से भीगी आस्तीन को खींचने में लगे थे। दोस्तो इस पूरे जन-आंदोलन का मुख्य एंगल और मांग बेहद सीधी और तीखी है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि जब तक अंकिता भंडारी हत्याकांड की निष्पक्ष और पूरी सीबीआई (CBI) जांच मुकम्मल नहीं हो जाती, तब तक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने पर तुरंत रोक लगाई जाए! अंकिता के पिता ने रोते हुए सीधे सवाल पूछा है कि आखिर जिन चेहरों पर अंकिता को वीआईपी सर्विस के लिए मजबूर करने और वीआईपी का नाम छिपाने के संगीन आरोप लग रहे हैं, उन्हें देश के सर्वोच्च पदों और राजभवनों की मलाईदार कुर्सियों से क्यों नवाजा जा रहा है? इसे व्यवस्था की ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे, जहाँ आरोपों से घिरे चेहरों को ‘शाही सम्मान’ मिल रहा है और अपनी बेटी का शव उठाने वाले मां-बाप को ‘घोर अपमान’ झेलना पड़ रहा है! बुधवार शाम की तस्वीरें जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी इंडिया गेट पहुँचे थे। अंकिता की मां का हाथ थामे प्रियंका गांधी और बात करते राहुल गांधी।
दोस्तो पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई से ठीक कुछ घंटे पहले, इस न्याय युद्ध ने उस वक्त देशव्यापी रुख अख्तियार कर लिया जब बुधवार की शाम देश के दो बड़े नेता—लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस की फायरब्रांड नेता प्रियंका गांधी सीधे इंडिया गेट के फुटपाथ पर जा पहुँचे। उन्होंने ज़मीन पर बैठकर अंकिता के माता-पिता का दर्द सुना, अंकिता की मां के आंसू पोंछे और इस आंदोलन को कांग्रेस का पूर्ण राष्ट्रीय समर्थन देने का वादा किया। राहुल गांधी ने साफ़ कहा कि इस देश की बेटी के हत्यारों को बचाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी काम कर रही है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि विपक्ष के इस भारी और सीधा प्रहार के बाद दिल्ली के हुक्मरान इस कदर बौखला गए कि उन्होंने आधी रात को पुलिस का डंडा चलाकर बुजुर्गों को जेल के मुहाने पर खड़ा कर दिया। दोस्तो उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की वो 19 साल की बेटी, जो एक रिजॉर्ट में अपनी ईमानदारी की नौकरी कर रही थी, उसे सिर्फ इसलिए नहर में धकेल दिया गया क्योंकि उसने किसी वीआईपी को ‘स्पेशल सर्विस’ देने से इनकार कर दिया था। उस बेटी की चीख आज भी देवभूमि से लेकर दिल्ली के आसमान तक गूंज रही है। पुलिस का दावा है कि इंडिया गेट एक हाई-सिक्योरिटी ज़ोन है जहाँ प्रदर्शन की अनुमति नहीं है, इसलिए कानूनन कार्रवाई की गई है। लेकिन कानून की यह दलील उस वक़्त खोखली हो जाती है जब देश के करोड़ों युवाओं को यह साफ़ दिखता है कि रसूखदारों के लिए कानून के दरवाजे चौबीसों घंटे खुले रहते हैं और एक गरीब पहाड़ी मां को न्याय मांगने के लिए तिहाड़ और थानों की धूल फाँकनी पड़ती है। दोस्तो अंकिता के माता-पिता को भले ही इंडिया गेट से हटा दिया गया हो, लेकिन इंसाफ की जो चिंगारी दिल्ली की सड़कों पर सुलग चुकी है, वो अब दावानल बनने वाली है। हुक्मरान याद रखें कि जब माताओं के आंसू सड़कों पर गिरते हैं, तो बड़े-बड़े सिंहासन ढह जाते हैं। अंकिता के माता-पिता के साथ हुए इस व्यवहार और व्यवस्था की इस ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में बेबाकी से बताएं। इस वीडियो को इतना शेयर करें कि हर सोई हुई आंख जाग जाए।