उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गई है। उत्तराखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गणेश गोदयाल के नेतृत्व में देहरादून के गांधी पार्क में शुरू हुआ मौन उपवास और राजभवन कूच ने धामी सरकार के खिलाफ माहौल को गरमा दिया है। इस बार आक्रोश की वजह संदिग्ध ‘VIP’ की सिक्किम के राज्यपाल के रूप में नियुक्ति और सीबीआई (CBI) जांच की टाइमिंग को लेकर है। अंकिता भंडारी के माता-पिता ने पूर्व में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड के पूर्व प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम पर इस पूरे मामले से जुड़े उस ‘VIP’ होने का गंभीर आरोप लगाया था, जिसके लिए अंकिता पर दबाव बनाया जा रहा था। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। गणेश गोदयाल और कांग्रेस का आरोप है कि इस संवेदनशील मामले में निष्पक्ष जांच का सामना कराने के बजाय, संदिग्ध व्यक्ति को एक उच्च संवैधानिक पद सौंप दिया गया है। गौरतलब है कि संविधान के अनुसार, राज्यपाल के पद पर रहते हुए किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रखी जा सकती। अंकिता के परिजनों का कहना है कि यह उन्हें कानूनी सुरक्षा कवच देने की कोशिश है।
दुष्यंत कुमार गौतम की नियुक्ति के विरोध में अंकिता भंडारी के माता-पिता दिल्ली पहुंचे और इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गए। देर रात दिल्ली पुलिस द्वारा अंकिता के माता-पिता को हिरासत में लिए जाने और धरना स्थल से हटाए जाने की खबर जैसे ही उत्तराखंड पहुंची, राज्य में सियासी बवाल मच गया। गणेश गोदयाल और यूथ कांग्रेस ने पुलिस की इस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की है और इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी है। अंकिता भंडारी के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच शुरू होने के समय पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि: परिजनों द्वारा जनवरी 2026 में ही सीबीआई जांच की मांग की जा रही थी, लेकिन सरकार ने इसे जानबूझकर अक्टूबर 2026 में शुरू कराया। अंकिता के पिता का कहना है कि सरकार ने यह सोची-समझी रणनीति के तहत किया है ताकि 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले जांच पूरी न हो सके। सरकार केवल चुनाव में राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस समय जांच को आगे बढ़ा रही है।