12 साल बाद मां नंदा चलीं कैलाश! । Nanda Devi । Nanda Devi Yatra । Uttarakhand News

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दोस्तो एक बेटी, जो 12 साल बाद अपने मायके आई थी, आज वो रोते हुए अपने पति के घर यानी कैलाश पर्वत के लिए विदा हो रही है। चमोली की वादियों में हर आंख नम है, क्योंकि इष्ट देवी, ‘मां नंदा’ की ऐतिहासिक ‘बड़ी जात यात्रा’ आज दोपहर 3 बजे कुरुड़ के सिद्धपीठ से शुरू होने जा रही है, लेकिन इस यात्रा का सबसे बड़ा रहस्य इंसान नहीं, बल्कि चार सींगों वाला एक अनोखा जीव है, जिसे ‘चौसिंग्या खाडू’ कहते हैं। आखिर क्यों ये रहस्यमयी भेड़ इस बेहद कठिन 280 किलोमीटर की यात्रा का मार्गदर्शक बनता है? और क्यों होमकुंड पहुंचने के बाद ये खुद-ब-खुद पहाड़ों में गायब हो जाता है? चलिए आपको बताता हूं अपनी इस रिपर्ट के जरिए। दोस्तो उत्तराखंड की अटूट आस्था और संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक, मां नंदा की बड़ी जात यात्रा आज (5 सितंबर) से शुरू हो रही है। चमोली जिले के नंदानगर स्थित नंदा सिद्धपीठ कुरुड़ से आज ठीक दोपहर 3 बजे मां नंदा की डोली कैलाश पर्वत के लिए प्रस्थान करेगी। पूरे 12 साल बाद आए इस पावन अवसर को लेकर देवभूमि के लोगों में गजब का उत्साह है। हर कोई अपनी लाडली बेटी नंदा को विदा करने के लिए कुरुड़ में उमड़ पड़ा है।

दोस्तो इस ऐतिहासिक पदयात्रा की सबसे अनोखी और चमत्कारी बात है— चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला मेढ़ा)। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ये कोई साधारण भेड़ नहीं बल्कि मां नंदा का ‘देव रथ’ और संदेशवाहक है। ये अद्भुत जीव पूरी यात्रा के दौरान सबसे आगे चलता है और दुर्गम रास्तों पर मां की डोली का मार्गदर्शक बनता है। इसकी पीठ पर एक विशेष थैला रखा जाता है, जिसमें श्रद्धालु मां नंदा के लिए आभूषण, श्रृंगार सामग्री और कलेवा (सौगात) रखते हैं। दोस्तो इस यात्रा की सबसे रहस्यमयी परंपरा इसके आखिरी पड़ाव पर देखने को मिलती है, जब ये यात्रा अत्यंत कठिन बर्फीले रास्तों से होते हुए ‘होमकुंड’ पहुंचती है, तो वहां मां नंदा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद, चौसिंग्या खाडू की पीठ से सामान उतारकर उसे अकेले ही आगे बर्फ से ढके त्रिशूल पर्वत और कैलाश की ओर विदा कर दिया जाता है। लोक मान्यता है कि इसके बाद यह खाडू इंसानों को कभी दोबारा नहीं दिखता और सीधे भगवान शिव के धाम कैलाश में प्रवेश कर जाता है।

दोस्तो आज से शुरू होने वाली ये पावन यात्रा बेहद कठिन और दुर्गम पड़ावों से होकर गुजरेगी। मां की सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए एसडीआरएफ (SDRF) और पुलिस की टीमें चप्पे-चप्पे पर तैनात हैं। 20 सितंबर को होमकुंड में खाडू की विदाई के बाद मां की उत्सव डोली वापस लौटना शुरू करेगी और 30 सितंबर को कुरुड़ मंदिर पहुंचने के साथ ही इस महायात्रा का भव्य समापन होगा तो दोस्तों, मां नंदा की ये यात्रा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पहाड़ की आस्था, संस्कृति और भावनाओं का वो अद्भुत संगम है, जिसे देखने के लिए हर किसी की निगाहें होमकुंड पर टिकी हैं। 12 साल बाद अपनी मायके की धरती से कैलाश के लिए निकली मां नंदा के साथ चल रहा चौसिंग्या खाडू इस यात्रा को और भी रहस्यमयी बना देता है। अब देखना होगा कि कठिन पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए ये यात्रा किस तरह अपने अंतिम पड़ाव होमकुंड तक पहुंचती है।