Dehradun Sahaspur सीट पर भयंकर ‘कुरुक्षेत्र’! | Harak Singh Rawat | Congress | Uttarakhand News

Spread the love

दोस्तो, 2027 के चुनाव से पहले सहसपुर की सियासत में ऐसा संग्राम छिड़ गया है, जिसने कांग्रेस के भीतर ही घमासान बढ़ा दिया है! एक तरफ हैं चार बार के अजेय हरक सिंह रावत, जो अब सहसपुर से मैदान में उतरने का खुला दावा ठोक रहे हैं। तो दूसरी तरफ मौजूदा विधायक आर्येन्द्र शर्मा!सवाल सीधा है—क्या हरक सिंह के सहसपुर पहुंचते ही कांग्रेस के टिकट का समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा? क्या हाईकमान के सामने अब सहसपुर की सीट सबसे बड़ा सियासी कुरुक्षेत्र बनने जा रही है? और आखिर इस टक्कर में किसका कटेगा पत्ता? दोस्तो तो क्या उत्तराखंड कांग्रेस में अब लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा जा रहा है, जहां पार्टी हाईकमान के मुहर लगाने से पहले ही नेता खुद को विधायक घोषित कर रहे हैं? सहसपुर विधानसभा सीट पर टिकटों के औपचारिक ऐलान से पहले ही पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत की मौजूदगी में ‘सहसपुर का विधायक कैसा हो, हरक सिंह रावत जैसा हो’ के नारों ने सूबे की सियासत में भूचाल ला दिया है!

जब ये नारे लग रहे थे, तब ‘शेर-ए-गढ़वाल’ कहे जाने वाले हरक सिंह रावत चुपचाप मुस्कुरा रहे थे। यह सिर्फ एक नारेबाजी नहीं है, यह कांग्रेस के भीतर चल रही भयंकर गुटबाजी और आलाकमान को दी गई सीधी चुनौती है! आज इस आक्रामक और खोजी रिपोर्ट में हम चीर-फाड़ करेंगे हरक सिंह रावत के उस सियासी इतिहास की, जिसने उन्हें उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा पाला-बदलू और अजेय क्षत्रप बनाया है, और बताएंगे कि सहसपुर की जमीन पर इस बार कितना बड़ा धमाका होने वाला है! क्योंकि हरक सिंह रावत का बयान भी इस ओर बड़ा इशारा कर रहा है। हरक सिंह रावत वैसे दोस्तो जब हरक सिंह रावत का चुनावी इतिहास देखा जाय तो वो जहां लड़े, वहां गाड़े झंडे! दोस्तो पहले इस नेता के उस सियासी रसूख को समझिए जिसके दम पर यह पार्टी के नियमों को ठेंगे पर रखता है। हरक सिंह रावत उत्तराखंड की राजनीति के वो इकलौते बाहुबली हैं, जो राज्य बनने के बाद से लगातार 4 बार अलग-अलग सीटों से विधायक चुने गए और कभी चुनाव नहीं हारे! 1991 और 1993 (पौड़ी सीट – उत्तर प्रदेश)

हरक सिंह रावत ने अपने करियर की शुरुआत बीजेपी से की। अविभाजित उत्तर प्रदेश में पौड़ी सीट से लगातार दो बार चुनाव जीता और कल्याण सिंह सरकार में सबसे कम उम्र के पर्यटन मंत्री बने। 1998 (पौड़ी सीट – बसपा) टिकट कटने से नाराज होकर हरक सिंह ने पाला बदला और बसपा (BSP) के टिकट पर पौड़ी से लड़े, लेकिन यहां उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।2002 और 2007 (लैंसडौन सीट – कांग्रेस) उत्तराखंड राज्य बनने के बाद हरक सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने लैंसडौन सीट से लगातार दो बार (2002 और 2007) चुनाव जीता और एनडी तिवारी सरकार में कद्दावर मंत्री रहे। 2012 (रुद्रप्रयाग सीट – कांग्रेस) एक बार फिर सीट बदलते हुए हरक सिंह रुद्रप्रयाग पहुंचे और बीजेपी के मातबर सिंह कंडारी को पटखनी देकर फिर से विधानसभा पहुंचे। 2014 (गढ़वाल लोकसभा सीट – कांग्रेस) इन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन मोदी लहर में बीजेपी के भुवन चंद्र खंडूरी से चुनाव हार गए। 2017 (कोटद्वार सीट – बीजेपी) 2016 में हरीश रावत सरकार के खिलाफ बगावत कर हरक सिंह बीजेपी में आ गए। 2017 में उन्होंने चौथी बार सीट बदली और कोटद्वार से भारी मतों से जीतकर त्रिवेंद्र और धामी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। 2022 से अब तक, 2022 के चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने उन्हें निष्कासित किया, जिसके बाद वे वापस कांग्रेस में लौट आए और अब वे सहसपुर की जमीन पर अपनी नई सियासी गोटियां सेट कर रहे हैं।

दोस्तो अब आपको सहसपुर की सियासत का पूरा सच बताता हूं समझिए आखिर क्यों मची है खींचतान? दोस्तो देहरादून जिले की उस सहसपुर विधानसभा सीट की, जिस पर हरक सिंह रावत की नजरें गड़ी हैं। सहसपुर की सियासत का इतिहास बेहद पेचीदा रहा है ये BJP का मजबूत गढ़, पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) से इस सीट पर बीजेपी के सहदेव सिंह पुंडीर का एकछत्र राज है। 2022 के चुनाव में सहदेव सिंह पुंडीर ने 64,008 वोट (51.31%) पाकर बंपर जीत दर्ज की थी। वहीं दोस्तो दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर गृहयुद्ध, सहसपुर सीट पर कांग्रेस की तरफ से आर्येन्द्र शर्मा पिछले लंबे समय से जमीन पर पसीना बहा रहे हैं। 2022 में आर्येन्द्र शर्मा कांग्रेस के टिकट पर लड़े और रनर-अप रहे। इससे पहले 2017 में कांग्रेस ने किशोर उपाध्याय को उतारा था, तब आर्येन्द्र शर्मा बागी होकर लड़े थे। वहीं दोस्तो जातीय और क्षेत्रीय समीकरण को देखते हैं तो सहसपुर ग्रामीण बाहुल्य (91.35%) इलाका है, जहां ठाकुर मतदाताओं के साथ-साथ मुस्लिम और दलित (SC/ST) वोटर्स की बड़ी तादाद है।

दोस्तो हरक सिंह रावत को लगता है कि उनकी आक्रामक छवि और जातिगत समीकरणों पर पकड़ इस सीट को बीजेपी से छीन सकती है।”लेकिन पेंच यहीं फंसा है! आर्येन्द्र शर्मा का गुट इस वक्त गुस्से से लाल है। उनका साफ कहना है कि जो नेता हर 5 साल में अपनी सीट बदल लेता है, उसे सहसपुर के स्थानीय कार्यकर्ताओं पर थोपा नहीं जा सकता! हरक सिंह रावत की इस ‘एडवांस नारेबाजी’ ने पार्टी के भीतर बगावत की चिंगारी सुलगा दी है। दोस्तो हरक सिंह रावत वो नेता हैं जिन्हें उत्तराखंड की राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है… वो बिना सोचे-समझे कोई कदम नहीं उठाते। सहसपुर में उनके सामने लगे ये नारे कांग्रेस हाईकमान के लिए एक खुली चेतावनी हैं कि या तो सहसपुर से उन्हें टिकट दो, या फिर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो! अब देखना यह होगा कि क्या हरीश रावत और प्रदेश आलाकमान हरक सिंह के इस दबाव के आगे घुटने टेकता है, या फिर सहसपुर में कांग्रेस का यह अंदरूनी बारूद पूरी पार्टी को ले डूबता है! इस सियासी दंगल पर आपकी क्या राय है? क्या हरक सिंह को सहसपुर से टिकट मिलना चाहिए? कमेंट करके जरूर बताएं