दोस्तो, क्या दुष्यंत गौतम की राज्यपाल पद पर नियुक्ति से उत्तराखंड की सियासत में भूचाल आ गया है? आखिर कांग्रेस 19 अक्टूबर को उत्तराखंड का काला दिन क्यों बता रही है? क्या अंकिता भंडारी केस को लेकर उठ रहे सवालों ने बीजेपी को नए सियासी घेरे में खड़ा कर दिया है? और जब बीजेपी प्रवक्ता शादाब शम्स कांग्रेस को अराजकता फैलाने वाली पार्टी बता रहे हैं, तो इस सियासी संग्राम में सच और आरोपों के बीच की तस्वीर क्या है? गरिमा दसौनी के तीखे हमले से लेकर बीजेपी के ओपन चैलेंज तक, आखिर इस सियासी टकराव का अगला मोड़ क्या होगा? दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड की वो अभागी बेटी, जिसकी चीखें आज भी ऋषिकेश के उस नहर से लेकर पौड़ी के पहाड़ों तक इंसाफ की भीख मांग रही हैं, उस अंकिता भंडारी के जख्मों पर एक ऐसा संवैधानिक नमक छिड़का गया है जिसने पूरे सूबे की सियासत में बारूद की तरह काम किया है! भाजपा के वरिष्ठ नेता दुष्यंत कुमार गौतम ने सिक्किम के नए राज्यपाल के रूप में शपथ तो ले ली, लेकिन उनकी इस ताजपोशी ने उत्तराखंड की राजनीति में भूचाल ला दिया है। दोस्तो उत्तराखंड की माटी आज रो रही है और विपक्ष सीधे सरकार के कलेजे पर वार करते हुए पूछ रहा है— ‘अंकिता को ऐसे कैसे मिलेगा न्याय?’ कांग्रेस ने 19 अक्टूबर को सूबे के इतिहास का सबसे ‘काला दिन’ करार दिया है। वहीं, सत्ताधारी भाजपा ने भी इस पर चुप न रहते हुए कांग्रेस को ‘लाशों पर राजनीति’ करने वाला बताया है और कॉल डिटेल्स का हवाला देकर खुली चुनौती ठोक दी है! दोस्तो सियासत जब जनभावनाओं को कुचलकर संवैधानिक पदों की रेवड़ियां बांटने लगे, तो जनता का सब्र का बांध टूट जाता है। उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी हत्याकांड में जिस ‘कथित वीआईपी’ का नाम पिछले कई सालों से हवा में तैर रहा है, जिसे लेकर पूरा पहाड़ आज भी सीबीआई जांच की मांग कर रहा है, उस नाम को लेकर छिड़ा विवाद अब दिल्ली के इंडिया गेट से लेकर सिक्किम के राजभवन तक पहुंच चुका है। दुष्यंत कुमार गौतम का सिक्किम का राज्यपाल बनना उत्तराखंड कांग्रेस के लिए एक ऐसी चिंगारी बन गया है, जिसने पूरे सूबे के भीतर बगावत की आग लगा दी है।
देहरादून से लेकर दिल्ली तक हर इंसाफ पसंद नागरिक आज एक ही सवाल पूछ रहा है— अगर मुख्य संदेहास्पद चेहरों को ऐसे ही पुरस्कृत किया जाता रहेगा, तो पहाड़ की बेटियों को ‘ऐसे कैसे मिलेगा न्याय’? दोस्तो जैसे ही दुष्यंत कुमार गौतम ने राज्यपाल पद की शपथ ली, वैसे ही उत्तराखंड कांग्रेस की फायरब्रांड प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने मोर्चा संभाल लिया। गरिमा दसौनी ने मीडिया के कैमरों के सामने आकर 19 अक्टूबर को उत्तराखंड की अस्मिता के लिए सबसे ‘काला दिन’ घोषित कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि दुष्यंत गौतम का उत्तराखंड बीजेपी प्रभारी रहते हुए पूरा कार्यकाल हमेशा से विवादों के घेरे में रहा है। जब इस संवेदनशील हत्याकांड में बार-बार ‘वीआईपी’ का नाम उछाला जा रहा था, तब उन्हें जांच के दायरे में लाने की बजाय देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक राजभवन का रास्ता दिखाना, देवभूमि की नारी शक्ति और अंकिता के रोते हुए माता-पिता के आंसुओं का सरेआम मजाक उड़ाना है। दोस्तो कांग्रेस के इस परमाणु बम जैसे हमले के बाद भारतीय जनता पार्टी ने भी डैमेज कंट्रोल के लिए अपने सबसे आक्रामक चेहरे को मैदान में उतार दिया। उत्तराखंड भाजपा के फायरब्रांड प्रवक्ता शादाब शम्स ने कैमरे के सामने आकर कांग्रेस के इन सारे आरोपों की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। शादाब शम्स ने कांग्रेस पर सीधे-सीधे ‘झूठ और अराजकता’ फैलाने का आरोप मढ़ा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन खो चुकी है, इसलिए वह देवभूमि में हो रही हर संवैधानिक प्रक्रिया और अच्छी चीजों पर केवल रोड़ा अटकाने और लाशों पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का काम कर रही है।
इधर दोस्तो शादाब शम्स ने अंकिता भंडारी केस का जिक्र करते हुए कांग्रेस के रणनीतिकारों को एक ऐसी खुली चुनौती दे डाली, जो कांग्रेस को हजम नहीं होने वाली। भाजपा का दावा है कि दुष्यंत गौतम पर लगाए जा रहे सारे आरोप पूरी तरह से मनगढ़ंत और बेबुनियाद हैं, क्योंकि वे पहले ही अपने तीन दिवसीय प्रवास की एक-एक मिनट की जानकारी और अपनी कॉल डिटेल्स तक सार्वजनिक कर चुके हैं। दोस्तो बीजेपी ने गरजते हुए कहा कि धामी सरकार ने बिना एक सेकंड गंवाए मुख्य आरोपियों को तुरंत सलाखों के पीछे भेजा। खुद अंकिता के माता-पिता सीबीआई के आला अधिकारियों से मिलकर जांच की प्रगति पर पूरी संतुष्टि जता चुके हैं। शम्स ने चुनौती दी कि अगर कांग्रेस को जरा भी शक है, तो वो जाकर जेल में बंद कातिलों से सीधे बात कर ले, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। दोस्तो सिक्किम में राजभवन की इस शपथ ने उत्तराखंड की सर्दियों की शुरुआत से पहले ही सियासी पारे को जून की गर्मी जैसा तपा दिया है। 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और कांग्रेस जानती है कि अंकिता भंडारी केस पहाड़ के स्वाभिमान और महिला सुरक्षा का वो सबसे बड़ा मुद्दा है जो सरकार की जड़ें हिला सकता है। इसीलिए इस लड़ाई को अब देशव्यापी आंदोलन में बदलने की चेतावनी दी जा रही है। वहीं दूसरी तरफ, बीजेपी इसे संवैधानिक नियुक्तियों पर विपक्षी कीचड़ उछालने की साजिश बता रही है। बहरहाल, सियासत की इस आक्रामक जुबानी जंग और आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच, देवभूमि का आम जनमानस आज भी उसी एक यक्ष प्रश्न के साथ खड़ा है— ‘अंकिता को ऐसे कैसे मिलेगा न्याय?’ देखना होगा कि यह सियासी चिंगारी 2027 के रण में क्या नया रंग दिखाती है। दोस्तो सियासत में जब आरोप इतने गंभीर हों और मामला किसी बेटी की अस्मिता और उसकी जान से जुड़ा हो, तो राजभवन की नियुक्तियों पर भी सवाल उठना लाजमी हो जाता है। गरिमा दसौनी ने इसे काला दिन बताकर कांग्रेस के इरादे साफ कर दिए हैं, तो शादाब शम्स के तीखे पलटवार ने यह बता दिया है कि बीजेपी बैकफुट पर आने वाली नहीं है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक दंगल के बीच, अंकिता के परिवार को इंसाफ की वो मुकम्मल सुबह कब दिखेगी, इसका इंतजार पूरे उत्तराखंड को है।